सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें– ११८ § १०० ] प्रथमोऽध्यायः ४३
§ ९८. वेदानुवादेन स्त्रीवेदेषु मिथ्यादृष्टेर्नानाजीवापेक्षया सर्वकालः । एकजीवं प्रति जघन्ये-
नान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण पल्योपमशतपृथक्त्वम् । सासादनसम्यग्दृष्ट्याद्यनिवृत्तिबादरान्तानां
सामान्योक्तः कालः । किं तु असंयतसम्यग्दृष्टेर्नानाजीवापेक्षया सर्वकालः । एकजीवं प्रति जघन्येनान्त-
मुहूर्तः । उत्कर्षेण पञ्चपञ्चाशत्पल्योपमानि देशोनानि । पुंवेदेषु मिथ्यादृष्टेर्नानाजीवापेक्षया सर्वः
कालः । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण सागरोपमशतपृथक्त्वम् । सासादनसम्यग्दृष्ट्या- ५
द्यनिवृत्तिबादरान्तानां सामान्योक्तः कालः । नपुंसकवेदेषु मिथ्यादृष्टेर्नानाजीवापेक्षया सर्वः कालः ।
एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेणानन्तः कालोऽसंख्येयाः पुद्गलपरिवर्ताः । सासादनसम्य-
ग्दृष्ट्याद्यनिवृत्तिबादरान्तानां सामान्यवत् । किं त्वसंयतसम्यग्दृष्टेर्नानाजीवापेक्षया सर्वः कालः ।
एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाणि देशोनानि । अपगतवेदानां
सामान्यवत् । १०
§ ९९. कषायानुवादेन चतुष्कषायाणां मिथ्यादृष्ट्याद्यप्रमत्तान्तानां मनोयोगिवत् । द्वयोरुप-
शमकयोर्द्वयोः क्षपकयोः केवललोभस्य च अकषायाणां च सामान्योक्तः कालः ।
§ १००. ज्ञानानुवादेन मत्यज्ञानिश्रुताज्ञानिषु मिथ्यादृष्टिसासादनसम्यग्दृष्ट्योः सामान्यवत् ।
विभङ्गज्ञानिषु मिथ्यादृष्टेर्नानाजीवापेक्षया सर्वः कालः । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः ।
उत्कर्षेण त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाणि देशोनानि । सासादनसम्यग्दृष्टेः सामान्योक्तः कालः । आभिनि- १५
बोधिकश्रुतावधिमनःपर्ययकेवलज्ञानिनां च सामान्योक्तः ।
शेषका काल मनोयोगियोंके समान है । तथा योगरहित जीवोंका काल ओघके समान है।
§ ९८. वेद मार्गणाके अनुवादसे स्त्रीवेदवालोंमें मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा सब
काल है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट काल सौ पल्यपृथक्त्व है।
सासादन सम्यग्दृष्टिसे लेकर अनिवृत्तिबादर तक प्रत्येकका सामान्योक्त काल है। किन्तु असंयत २०
सम्यग्दृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा सब काल है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त है
और उत्कृष्ट काल कुछ कम ¹पचपन पल्य है। पुरुषवेदवालोंमें मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा
सब काल है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट काल सौ ²सागर पृथक्त्व
है। तथा सासादनसम्यग्दृष्टिसे लेकर अनिवृत्तिबादर तक प्रत्येकका सामान्योक्त काल है। नपुंसक-
वेदवालोंमें मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा सब काल है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य काल २५
अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट ³अनन्त काल है जिसका प्रमाण असंख्यात पुद्गल परिवर्तन है। तथा
सासादनसम्यग्दृष्टिसे लेकर अनिवृत्तिबादर तक प्रत्येकका सामान्योक्त काल है। किन्तु असंयत-
सम्यग्दृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा सब काल है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त है
और उत्कृष्ट काल कुछ कम तेतीस ⁴सागर है। तथा वेदरहित जीवोंका काल ओघके समान है।
§ ९९. कषाय मार्गणाके अनुवादसे मिथ्यादृष्टिसे लेकर अप्रमत्तसंयत तक चारों कषायोंका ३०
काल मनोयोगियोंके समान है। तथा दोनों उपशमक, दोनों क्षपक, केवल लोभवाले और कषाय
रहित जीवोंका सामान्योक्त काल है।
§ १००. ज्ञान मार्गणाके अनुवादसे मत्यज्ञानी और श्रुताज्ञानियोंमें मिथ्यादृष्टि और सासा-
दनसम्यग्दृष्टिका काल ओघके समान है। विभंगज्ञानियोंमें मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा
सब काल है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट काल कुछ कम तेतीस ३५
१. देवीकी उत्कृष्ट आयु पचपन पल्य है। इसमें-से प्रारम्भका अन्तर्मुहूर्त काल कम कर देनेपर स्त्रीवेदमें
असंयतसम्यग्दृष्टिका उत्कृष्ट काल कुछ कम पचपन पल्य प्राप्त हो जाता है। २. तीन सौ सागरसे ऊपर और
नौ सौ सागरके नीचे । ३. यह सादि सान्त कालका निर्देश है। ४. सातवें नरकमें असंयत सम्यग्दृष्टिका
जो उत्कृष्ट काल है वही यहाँ नपुंसक वेदमें असंयत सम्यग्दृष्टिका उत्कृष्ट काल कहा है।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri