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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 153, कुल 558 में से

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पृष्ठ 153
  • ११८ § ९५ ] प्रथमोऽध्यायः ४१
    § ९३. मनुष्यगतौ मनुष्येषु मिथ्यादृष्टेर्नानाजीवापेक्षया सर्वकालः । एकजीवं प्रति
    जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण त्रीणि पल्योपमानि पूर्वकोटिपृथक्त्वैरभ्यधिकानि । सासादनसम्य-
    ग्दृष्टेर्नानाजीवापेक्षया जघन्येनैकः समयः । उत्कर्षेणान्तर्मुहूर्तः । एकजीवं प्रति जघन्येनैकः समयः ।
    उत्कर्षेण षडावलिकाः । सम्यग्मिथ्यादृष्टेर्नानाजीवापेक्षया एकजीवापेक्षया च जघन्यञ्चोत्कृष्ट-
    श्चान्तर्मुहूर्तः । असंयतसम्यग्दृष्टेर्नानाजीवापेक्षया सर्वकालः । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । ५
    उत्कर्षेण त्रीणि पल्योपमानि सातिरेकाणि । शेषाणां सामान्योक्तः कालः ।
    § ९४. देवगतौ देवेषु मिथ्यादृष्टेर्नानाजीवापेक्षया सर्वकालः । एकजीवं प्रति जघन्येनान्त-
    र्मुहूर्तः । उत्कर्षेणैकत्रिंशत्सागरोपमाणि । सासादनसम्यग्दृष्टेः सम्यग्मिथ्यादृष्टेश्च सामान्योक्तः
    कालः । असंयतसम्यग्दृष्टेर्नानाजीवापेक्षया सर्वकालः । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः ।
    उत्कर्षेण त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाणि । १०
    § ९५. इन्द्रियानुवादेन एकेन्द्रियाणां नानाजीवापेक्षया सर्वकालः । एकजीवं प्रति जघन्येन
    क्षुद्रभवग्रहणम् । उत्कर्षेणानन्तः कालोऽसंख्येयाः पुद्गलपरिवर्त्ताः । विकलेन्द्रियाणां नानाजीवापेक्षया
    सर्वः कालः । एकजीवं प्रति जघन्येन क्षुद्रभवग्रहणम् । उत्कर्षेण संख्येयानि वर्षसहस्राणि । पञ्चे-
    अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट काल तीन पल्य हैं ।
    § ९३. मनुष्यगतिमें मनुष्योंमें मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा सब काल है । एक १५
    जीवकी अपेक्षा जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट काल पूर्वकोटि १पृथक्त्वसे अधिक तीन पल्य
    है । सासादनसम्यग्दृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल
    अन्तर्मुहूर्त है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल छह आवली है ।
    सम्यग्मिथ्यादृष्टिका नाना जीव और एक जीवकी अपेक्षा जघन्य और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त
    है । असंयतसम्यग्दृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा सब काल है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य काल २०
    अन्तर्मुहूर्त है और २ उत्कृष्ट काल साधिक तीन पल्य है । तथा संयतासंयत आदि शेषका काल
    ओघके समान है ।
    § ९४. देवगतिमें देवोंमें मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा सब काल है । एक जीवको
    अपेक्षा जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट काल इकतीस सागर है । सासादनसम्यग्दृष्टि और
    सम्यग्मिथ्यादृष्टिका काल ओघके समान है । असंयत सम्यग्दृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा सब २५
    काल है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट काल तेतीस सागर है ।
    § ९५. इन्द्रिय मार्गणाके अनुवादसे एकेन्द्रियोंका नाना जीवोंकी अपेक्षा सब काल है । एक
    जीवकी अपेक्षा जघन्य काल क्षुद्रभवग्रहण प्रमाण है और उत्कृष्ट अनन्त काल है जिसका प्रमाण
    असंख्यात पुद्गल परिवर्तन है । विकलेन्द्रियोंका नाना जीवोंकी अपेक्षा सब काल है । एक जीवकी
    अपेक्षा जघन्य काल क्षुद्रभवग्रहण प्रमाण है और उत्कृष्ट काल संख्यात ३ हजार वर्ष है । पंचेन्द्रियों- ३०
    १. यहाँ पूर्वकोटि पृथक्त्वसे संतालीस पूर्वकोटियोंका ग्रहण किया है । यद्यपि पृथक्त्व यह तीनसे ऊपर और
    नौसे नीचेकी संख्याका द्योतक है तथापि यहाँ बाहुल्यकी अपेक्षा पृथक्त्व पदसे संतालीसका ग्रहण किया है ।
    २. यहाँ साधिक पदसे कुछ कम पूर्वकोटिका त्रिभाग लिया गया है । उदाहरणार्थ—एक पूर्वकोटिके आयुवाले
    जिस मनुष्यने त्रिभागमें मनुष्यायुका बन्ध किया । फिर अन्तर्मुहूर्तमें सम्यक्त्वपूर्वक क्षायिकसम्यग्दर्शनको
    प्राप्त किया और आयुके अन्तमें मरकर तीन पल्यकी आयुके साथ उत्तम भोगभूमिमें पैदा हुआ उसके अविरत ३५
    सम्यग्दृष्टिका उत्कृष्ट काल प्राप्त होता है । ३. लगातार दोइन्द्रिय तेइन्द्रिय या चौइन्द्रिय होनेका उत्कृष्ट काल
    संख्यात हजार वर्ष है । इसलिए इनका उत्कृष्ट काल उक्त प्रमाण कहा है ।
    ६
    CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri