सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४० सर्वार्थसिद्धौ [ १।८ § ९१ -
पेक्षया सर्वः कालः । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्त्तः । उत्कर्षेण पूर्वकोटी देशोना । प्रमत्ता-
प्रमत्तयोर्नानाजीवापेक्षया सर्वकालः । एकजीवं प्रति जघन्येनैकः समयः । उत्कर्षेणान्तर्मुहूर्त्तः ।
चतुर्णांमुपशमकानां नानाजीवापेक्षया एकजीवापेक्षया च जघन्येनैकः समयः । उत्कर्षेणान्तर्मुहूर्त्तः ।
चतुर्णां क्षपकाणामयोगकेवलिनां च नानाजीवापेक्षया एकजीवापेक्षया च जघन्यश्चोत्कृष्टश्चान्त-
मुहूर्त्तः । सयोगकेवलिनां नानाजीवापेक्षया सर्वकालः । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्त्तः ।
उत्कर्षेण पूर्वकोटी देशोना ।
§ ९१. विशेषेण गत्यनुवादेन नरकगतौ नारकेषु सप्तसु पृथिवीषु मिथ्यादृष्टेर्नानाजीवा-
पेक्षया सर्वकालः । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्त्तः । उत्कर्षेण यथासंख्यं एक-त्रि-सप्त-दश-सप्तदश-
द्वाविंशति-त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाणि । सासादनसम्यग्दृष्टेः सम्यग्मिथ्यादृष्टेश्च सामान्योक्तः कालः ।
असंयतसम्यग्दृष्टेर्नानाजीवापेक्षया सर्वकालः एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्त्तः । उत्कर्षेण उक्त
एवोत्कृष्टो देशोनः ।
§ ९२. तिर्यग्गतौ तिरश्चां मिथ्यादृष्टीनां नानाजीवापेक्षया सर्वकालः । एकजीवं प्रति
जघन्येनान्तर्मुहूर्त्तः । उत्कर्षेणानन्तः कालोऽसंख्येयाः पुद्गलपरिवर्त्ताः । सासादनसम्यग्दृष्टिसम्य-
ग्मिथ्यादृष्टिसंयतासंयतानां सामान्योक्तः कालः । असंयतसम्यग्दृष्टेर्नानाजीवापेक्षया सर्वकालः ।
एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण त्रीणि पल्योपमानि ।
नाना जीवोंकी अपेक्षा सब काल है और एक जीवकी अपेक्षा जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट
काल कुछ कम एक १पूर्वकोटि है। प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयतका नाना जीवोंकी अपेक्षा सब
काल है और एक जीवकी अपेक्षा जघन्य काल एक समय२ और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है। चारों
उपशमकोंका नाना जीव और एक जीवकी अपेक्षा जघन्य काल एक समय३ है और उत्कृष्ट काल
अन्तर्मुहूर्त है। चारों क्षपक और अयोगकेवलियोंका नाना जीव और एक जोवकी अपेक्षा जघन्य
और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है। सयोगकेवलियोंका नाना जीवोंकी अपेक्षा सब काल है। एक
जीवकी अपेक्षा जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट काल कुछ कम एक पूर्व कोटि है।
§ ९१. विशेषकी अपेक्षा गति मार्गणाके अनुवादसे नरक गतिमें नारकियोंमें सातों पृथिवियों
में मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा सब काल है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त
है और उत्कृष्ट काल क्रमशः एक, तीन, सात, दस, सत्रह, बाईस और तेतीस सागर है। सासादन-
सम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टिका काल ओघके समान है। असंयतसम्यग्दृष्टिका नाना जोवोंकी
अपेक्षा सब काल है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट काल कुछ४ कम
अपनी अपनी उत्कृष्ट स्थितिप्रमाण है।
§ ९२. तिर्यंचगतिमें मिथ्यादृष्टि तिर्यंचोंका नानाजीवोंकी अपेक्षा सब काल है। एक जीवकी
अपेक्षा जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अनन्त काल है जो असंख्यात५ पुद्गल परिवर्तन-
प्रमाण है। सासादनसम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि और संयतासंयत तिर्यंचोंका सामान्योक्ति काल है।
असंयतसम्यग्दृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा सब काल है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य काल
१. पूर्वकोटिकी आयु वाला जो सम्मूर्च्छिम तिर्यंच उत्पन्न होनेके अन्तर्मुहूर्त बाद वेदक सम्यक्त्वके साथ
संयमासंयमको प्राप्त करता है संयमासंयमका उत्कृष्ट काल प्राप्त होता है। यह काल अन्तर्मुहूर्त कम एक
पूर्वकोटि है। २. जघन्य काल एक समय मरणकी अपेक्षाबतलाया है। ३. जघन्य काल एक समय मरणकी
अपेक्षा बतलाया है। ४. अन्तर्मुहूर्त कम। इतनी विशेषता है कि प्रारम्भके छह नरकोंमें मिथ्यात्वके साथ
उत्पन्न करावे फिर अन्तर्मुहूर्त बाद सम्यक्त्वको उत्पन्न कराकर जीवन-भर सम्यक्त्वके साथ रखकर उत्कृष्ट
काल प्राप्त करे। परन्तु सातवें नरकमें प्रवेश और निर्गम दोनों ही मिथ्यात्वके साथ करावे। ५. यहाँ
असंख्यातसे आवलिका असंख्यातवाँ भाग लिया गया है।