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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 151, कुल 558 में से

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पृष्ठ 151

सयोगकेवलिनां लोकस्यासंख्येयभागः । अनाहारकेषु मिथ्यादृष्टिभिः सर्वलोकः स्पृष्टः । सासादन-
सम्यग्दृष्टिभिर्लोकस्यासंख्येयभागः एकादश चतुर्दशभागा वा देशोनाः । असंयतसम्यग्दृष्टिभिः
लोकस्यासंख्येयभागः षट् चतुर्दश भागा वा देशोनाः । सयोगकेवलिनां लोकस्यासंख्येयभागाः सर्व-
लोको वा । अयोगकेवलिनां लोकस्यासंख्येयभागः । स्पर्शनं व्याख्यातम् ।
§ ९०. कालः प्रस्तूयते । स द्विविधः सामान्येन विशेषेण च । सामान्येन तावद् मिथ्यादृष्टे- ५
र्नानाजीवापेक्षया सर्वकालः । एकजीवापेक्षया त्रयो भङ्गाः । अनादिरपर्यवसानः अनादिः सपर्यव-
सानः सादिः सपर्यवसानश्चेति । तत्र सादिः सपर्यवसानो जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षणार्धपुद्गल-
परिवर्तो देशोनः । सासादनसम्यग्दृष्टेर्नानाजीवापेक्षया जघन्येनैकः समयः । उत्कर्षेण पल्योपमा-
संख्येयभागः । एकजीवं प्रति जघन्येनैकः समयः । उत्कर्षेण षडावलिकाः । सम्यङ्मिथ्यादृष्टे-
र्नानाजीवापेक्षया । जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण पल्योपमासंख्येयभागः । एकजीवं प्रति १०
जघन्यः उत्कृष्टश्चान्तर्मुहूर्तः । असंयतसम्यग्दृष्टेर्नानाजीवापेक्षया सर्वकालः । एकजीवं प्रति
जघन्येनान्तर्मुहूर्तः¹ । उत्कर्षेण त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाणि सातिरेकाणि । संयतासंयतस्य नानाजीवा-
स्पर्श ओघके समान है । तथा सयोगकेवलियोंका स्पर्श लोकका असंख्यातवां भाग है । अनाहारकों-
में मिथ्यादृष्टियोंने सब लोकका स्पर्श किया है । सासादनसम्यग्दृष्टियोंने लोकके असंख्यातवें भाग
क्षेत्रका और लोकनाडीके चौदह भागोंमें-से कुछ कम ग्यारह² भाग क्षेत्रका स्पर्श किया है । १५
असंयतसम्यग्दृष्टियोंने लोकके असंख्यातवें भाग क्षेत्रका और लोकनाडीके चौदह भागोंमें-से कुछ
कम छह³ भाग क्षेत्रका स्पर्श किया है । सयोगकेवलियोंने लोकके असंख्यात बहु भाग क्षेत्रका और
सब लोकका स्पर्श किया है । तथा अयोगकेवलियोंने लोकके असंख्यातवें भाग क्षेत्रका स्पर्श किया
है । इस प्रकार स्पर्शनका व्याख्यान किया ।
§ ९०. अब कालका कथन करते हैं । सामान्य और विशेषकी अपेक्षा वह दो प्रकारका है । २०
सामान्यकी अपेक्षा मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा सब काल है अर्थात् मिथ्यादृष्टि जीव सदा
पाये जाते हैं । एक जीवकी अपेक्षा तीन भंग हैं—अनादि-अनन्त, अनादि-सान्त और सादि-सान्त ।
इनमें-से सादि-सान्त मिथ्यादृष्टिका जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट काल कुछ कम अर्ध-
पुद्गल परिवर्तन है । सासादनसम्यग्दृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्यकाल एक समय है और
उत्कृष्ट काल पल्यके असंख्यातवें भागप्रमाण है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य काल एक समय है २५
और उत्कृष्ट काल छह आवलि है । सम्यग्मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्य काल
अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट काल पल्यका असंख्यातवां भाग है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य और
उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है । असंयतसम्यग्दृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा सब काल है । एक जीवको
अपेक्षा जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट काल साधिक तेतीस४ सागर है । संयतासंयतका
१. -हूर्तः । तिण्णि सहस्सा सत्त य सदाणि तेहत्तरिं च उस्सासा । एसो हवइ मुहुत्तो सव्वेसिं चेव मणुयाणं ॥' ३०
उत्क- सू० । २. मेरु तलसे नीचे कुछ कम पाँच राजु और ऊपर छह राजु । यह स्पर्श उपपाद पदकी अपेक्षा
प्राप्त होता है । ३. अच्युत कल्प तक ऊपर कुछ कम छह राजु । तिर्यंच असंयत सम्यग्दृष्टि जीव मर कर
अच्युत कल्प तक उत्पन्न होते हैं इसलिए उपपाद पदकी अपेक्षा यह स्पर्श बन जाता है । ४. जो उपशम
श्रेणिवाला जीव मर कर एक समय कम तेतीस सागरकी आयु लेकर अनुत्तर विमानमें पैदा होता है ।
फिर पूर्वकोटिकी आयुवाले मनुष्योंमें पैदा होकर जीवनभर असंयमके साथ रहा है । केवल जीवनमें ३५
अन्तर्मुहूर्त काल शेष रहनेपर संयमको प्राप्त होकर सिद्ध होता है । उसके असंयत सम्यग्दृष्टिका उत्कृष्ट
काल प्राप्त होता है । यह काल अन्तर्मुहूर्त कम एक पूर्वकोटि अधिक एक समय कम तेतीस सागर है ।