सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८ सर्वार्थसिद्धौ [ १।८ § ८६ -
पञ्च चतुर्दशभागा वा देशोनाः । प्रमत्ताप्रमत्तैर्लोकस्यासंख्येयभागः । शुक्ललेश्यैर्मिथ्यादृष्ट्यादि-
संयतासंयतान्तैर्लोकस्यासंख्येयभागः षट् चतुर्दशभागा वा देशोनाः । प्रमत्तादिसयोगकेवल्यन्तानां
अलेश्यानां च सामान्योकं स्पर्शनम् ।
§ ८६. भव्यानुवादेन भव्यानां मिथ्यादृष्ट्याद्ययोगकेवल्यन्तानां सामान्योकं स्पर्शनम् ।
अभव्यैः सर्वलोकः स्पृष्टः ।
§ ८७. सम्यक्त्वानुवादेन क्षायिकसम्यग्दृष्टीनामसंयतसम्यग्दृष्ट्याद्ययोगकेवल्यन्तानां सामा-
न्योक्तम् । किंतु संयतासंयतानां लोकस्यासंख्येयभागः । क्षायोपशमिकसम्यग्दृष्टीनां सामान्योकम् ।
औपशमिकसम्यक्त्यानामसंयतसम्यग्दृष्टीनां सामान्योकम् । शेषाणां लोकस्यासंख्येयभागः । सासा-
दनसम्यग्दृष्टिसम्यग्मिथ्यादृष्टिमियादृष्टीनां सामान्योकम् ।
§ ८८. संज्ञानुवादेन संज्ञिनां चक्षुर्दर्शनिवत् । असंज्ञिभिः सर्वलोकः स्पृष्टः । तदुभयव्यपदेश-
रहितानां सामान्योकम् ।
§ ८९. आहारानुवादेन आहारकाणां मिथ्यादृष्ट्यादिक्षीणकषायान्तानां सामान्योकम् ।
स्पर्श किया है । संयतासंयतोंने लोकके असंख्यातवें भाग क्षेत्रका और लोकनाड़ीके चौदह भागोंमें-
से कुछ कम १ पाँच भाग क्षेत्रका स्पर्श किया है । तथा प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयतोंने लोकके
असंख्यातवें भाग क्षेत्रका स्पर्श किया है। मिथ्यादृष्टियोंसे लेकर संयतासंयतों तकके शुक्ललेश्या-
वाले जीवों ने लोकके असंख्यातवें भाग क्षेत्रका और लोकनाडीके चौदह भागोंमें-से कुछ कम छह २
भाग क्षेत्रका स्पर्श किया है । प्रमत्तसंयत आदि सयोगकेवली तकके शुक्ललेश्यावालोंका और
लेश्यारहित जीवोंका स्पर्श ओघके समान है।
§ ८६. भव्य मार्गणाके अनुवादसे मिथ्यादृष्टियोंसे लेकर अयोगकेवली तकके भव्योंका
स्पर्श ओघके समान है । अभव्योंने सब लोकका स्पर्श किया है ।
§ ८७. सम्यक्त्व मार्गणाके अनुवादसे असंयतसम्यग्दृष्टियोंसे लेकर अयोगकेवली तकके
क्षायिकसम्यग्दृष्टियोंका स्पर्श ओघके समान है । किन्तु संयतासंयतोंका स्पर्श लोकका असंख्यातवाँ
भाग है । क्षायोपशमिक सम्यग्दृष्टियोंका स्पर्श ओघके समान है । असंयतसम्यग्दृष्टि औपशमिक
सम्यग्दृष्टियोंका स्पर्श ओघके समान है । तथा शेष औपशमिक सम्यग्दृष्टियोंका स्पर्श लोकका
असंख्यातवाँ भाग है। सासादनसम्यग्दृष्टि सम्यग्मिथ्यादृष्टि और मिथ्यादृष्टियोंका स्पर्श
सामान्योक्त है।
§ ८८. संज्ञा मार्गणाके अनुवादसे संज्ञियोंका स्पर्श चक्षुदर्शनवाले जीवोंके समान है।
असंज्ञियोंने सब लोकका स्पर्श किया है । और इन दोनों व्यवहारोंसे रहित जीवोंका स्पर्श ओघके
समान है।
§ ८९. आहार मार्गणाके अनुवादसे मिथ्यादृष्टियोंसे लेकर क्षीणकषाय तकके आहारकोंका
१. यह स्पर्श मारणान्तिक पदकी अपेक्षा प्राप्त होता है, क्योंकि पद्म लेश्यावाले संयतासंयत ऊपर कुछ कम
पाँच राजु क्षेत्रमें मारणान्तिक समुद्घात करते हुए पाये जाते हैं। २. विहार, वेदना, कषाय, वैक्रियिक
और मारणान्तिक पदोंकी अपेक्षा यह स्पर्शन प्राप्त होता है। सो भी मिथ्यादृष्टि आदि चार गुणस्थानोंकी
अपेक्षा यह कथन किया है। संयतासंयत शुक्ल लेश्यावालोंके तो विहार, वेदना, कषाय और वैक्रियिक
पदोंकी अपेक्षा लोकके असंख्यातवें भाग प्रमाण ही स्पर्शन प्राप्त होता है। उपपादपदकी अपेक्षा मिथ्यादृष्टि
और सासादनसम्यग्दृष्टि शुक्ल लेश्यावालोंका स्पर्शन लोकके असंख्यातवें भाग प्रमाण है। अविरतसम्यग्दृष्टि
शुक्ललेश्यावालोंका स्पर्श कुछ कम छह राजु है। संयतासंयतोंके उपपादपद नहीं होता। फिर भी इनके
मारणान्तिक समुद्घातकी अपेक्षा कुछ कम छह राजु स्पर्श बन जाता है।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri