सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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- ११८ § ८५ ] प्रथमोऽध्यायः ३७
§ ८४. दर्शनानुवादेन चक्षुद्दर्शनानां मिथ्यादृष्ट्यादिक्षीणकषायान्तानां पञ्चेन्द्रियवत् ।
अचक्षुद्दर्शनानां मिथ्यादृष्ट्यादिक्षीणकषायान्तानामधिकेवलदर्शनानां च सामान्योक्तं स्पर्शनम् ।
§ ८५. लेश्यानुवादेन कृष्णनीलकापोतलेश्यैर्मिथ्यादृष्टिभिः सर्वलोकः स्पृष्टः । सासादन-
सम्यग्दृष्टिभिर्लोकस्यासंख्येयभागः पञ्च चत्वारो द्वौ चतुर्दशभागा वा १ देशोनाः । सम्यङ्मिथ्या-
दृष्ट्यसंयतसम्यग्दृष्टिभिर्लोकस्यासंख्येयभागः । तेजोलेश्यैर्मिथ्यादृष्टिसासादनसम्यग्दृष्टिभिर्लोक-
स्यासंख्येयभागः अष्टौ नव चतुर्दशभागा वा देशोनाः । सम्यङ्मिथ्यादृष्ट्यसंयतसम्यग्दृष्टिभि-
र्लोकस्यासंख्येयभागः अष्टौ चतुर्दशभागा वा देशोनाः । संयतासंयतैर्लोकस्यासंख्येयभागः अध्यर्धचतु-
र्दशभागा वा देशोनाः । प्रमत्ताप्रमत्तैर्लोकस्यासंख्येयभागः । पद्मलेश्यैर्मिथ्यादृष्ट्याद्यसंयतसम्यग्-
दृष्ट्यन्तैर्लोकस्यासंख्येयभागः । अष्टौ चतुर्दशभागा वा देशोनाः । संयतासंयतैर्लोकस्यासंख्येयभागः
§ ८४. दर्शन मार्गणाके अनुवादसे मिथ्यादृष्टियोंसे लेकर क्षीणकषाय तकके चक्षुदर्शनवाले
जीवोंका स्पर्श पंचेन्द्रियोंके समान है । मिथ्यादृष्टियोंसे लेकर क्षीणकषाय तकके अचक्षुदर्शनवाले
जीवोंका तथा अवधिदर्शनवाले और केवल दर्शनवाले जीवोंका स्पर्श ओघके समान है ।
§ ८५. लेश्या मार्गणाके अनुवादसे कृष्ण, नील और कापोत लेश्यावाले मिथ्यादृष्टियोंने सब
लोकका स्पर्श किया है । सासादनसम्यग्दृष्टियोंने लोकके असंख्यातवें भाग क्षेत्रका और लोकनाडी-
के चौदह भागोंमें-से क्रमशः कुछ कम पाँच२ भाग, कुछ कम चार भाग और कुछ कम दो भाग क्षेत्र-
का स्पर्श किया है । सम्यग्मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि जीवोंने लोकके असंख्यातवें भाग
क्षेत्रका स्पर्श किया है। पीतलेश्यावाले मिथ्यादृष्टि और सासादनसम्यग्दृष्टि जीवोंने लोकके
असंख्यातवें भाग क्षेत्रका तथा लोकनाडीके चौदह भागोंमें-से कुछ कम आठ३ भाग और कुछ कम
नौ भाग४ क्षेत्रका स्पर्श किया है । सम्यग्मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टियोंने लोकके असंख्यातवें
भाग क्षेत्रका तथा लोकनाडीके चौदह भागोंमें-से कुछ कम आठ५ भाग क्षेत्रका स्पर्श किया है ।
संयतासंयतोंने लोकके असंख्यातवें भाग क्षेत्रका और लोकनाडीके चौदह भागोंमें-से कुछ कम डेढ़६
भाग क्षेत्रका स्पर्श किया है । प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयत जीवोंने लोकके असंख्यातवें भाग
क्षेत्रका स्पर्श किया है । मिथ्यादृष्टियोंसे लेकर असंयतसम्यग्दृष्टियों तकके पद्मलेश्यावाले जीवोंने
लोकके असंख्यातवें भाग क्षेत्रका और लोकनाडीके चौदह भागोंमें-से कुछ कम आठ७ भाग क्षेत्रका
१. वा देशोनाः । द्वादशभागाः कुतो न लभ्यन्ते इति चेत् तत्रावस्थितलेश्यापेक्षया पञ्चैव । अथवा येषां
मते सासादन एकेन्द्रियेषु नोत्पद्यते तन्मतापेक्षया द्वादशभागा न दत्ताः । सम्यङ्मिथ्या-मु०, आ०, दि० १ ।
२. यह स्पर्श मारणान्तिक और उपपाद पदकी अपेक्षा बतलाया है । कृष्ण लेश्यावालेके कुछ कम पाँच राजु,
नील लेश्यावालेके कुछ कम चार राजु और कापोत लेश्यावालेके कुछ कम दो राजु यह स्पर्श होता है । जो
नारकी तिर्यंच सासादन सम्यग्दृष्टियोंमें उत्पन्न होते हैं उन्हींके यह स्पर्श सम्भव है । ३. यह स्पर्शन विहार,
वेदना, कषाय और वैक्रियिक पदकी अपेक्षा प्राप्त होता है, क्योंकि पीतलेश्यावाले सासादनोंका नीचे कुछ कम
दो राजु और ऊपर छह राजु क्षेत्रमें गमनागमन देखा जाता है । ४. यह स्पर्श मारणान्तिक समुद्घातकी
अपेक्षा प्राप्त होता है क्योंकि ऐसे जीव तीसरी पृथिवीसे ऊपर कुछ कम नौ राजु क्षेत्रमें मारणान्तिक समुद्घात
करते हुए पाये जाते हैं । उपपाद पदकी अपेक्षा इनका स्पर्श कुछ कम डेढ़ राजु होता है इतना यहाँ विशेष
जानना चाहिए । ५. यह स्पर्श विहार, वेदना, कषाय, वैक्रियिक और मारणान्तिक पदकी अपेक्षा प्राप्त होता
है । युक्तिका निर्देश पहले किया ही है । इतनी विशेषता है कि मिश्र गुणस्थानमें मारणान्तिक समुद्घात
नहीं होता । ६. यह स्पर्श मारणान्तिक पदकी अपेक्षा प्राप्त होता है । इनके उपपाद पद नहीं होता ।
७. यह स्पर्श विहार, वेदना, कषाय, वैक्रियिक और मारणान्तिक पदकी अपेक्षा प्राप्त होता है । इनके उपपाद
पदकी अपेक्षा स्पर्श कुछ कम पाँच राजु होता है । इतनी विशेषता है कि मिश्र गुणस्थानमें मारणान्तिक
और उपपाद पद नहीं होता ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri