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संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा

DevanagariHindipublished267 पृष्ठ

तुलसी साहिब (हाथरसवाले) २५१
करम का भोग भरम छूटै ।
बिन बेनी असनान पकड़ जम घर घर के लूटै ॥
बचै नहिँ कोइ सब को पटकै । हर दम पिय० ॥ ६ ॥
पूस पुरुप की आस बास बिन नहिँ जिव निस्तारा।
सतगुरु केवट गैल गवन करि जब जावै पारा ॥
मिलै जब पिउ परसै प्यारी ।
सुन्दर सेज बिछाय पिया सँग सोवै कर यारी ॥
अरज करि प्रीतम से हटकै । हर दम पिय० ॥ ७ ॥
माघ मनोरथ प्रीति परम पद की सुधि संभारी ।
ऐसी हैँ कोइ नारि जगत तजि तन मन से न्यारी ॥
सुरत की डोरी लै लावै ।
मूल मुकर१ की राह दाव करि सहजहि चढ़ि जावै ॥
कुमति कुनबे की बुधि झटकै । हर दम पिय० ॥ ८ ॥
फागुन फरक निकारि यार सँग खेलै खुल होली ।
आस अबीर उड़ाय गुनन की भर मारै झोली ॥
अरगजा घिसि चन्दन लेपै ।
नील सिखर की राह सुरत चढ़ि सुन्दर में चेपै२ ॥
चरन में हित चित से गठि कै । हर दम पिय० ॥ ९ ॥
चतुर सहेली चेत हेत हियरे से मन लावै ।
पल पल पालै प्रीति रीति पिया को जो रस चावै ॥
अमल करि होवै मतवारी ।
नसा नैन के माहिँ बिसरि गइ सुधि बुधि सब सारी ॥
गरक३ डोरी बाँधै बटि कै । हर दम पिय० ॥ १० ॥
(१) दर्पन । (२) चिपक जाय । (३) डूबी हुई, मतवाली ।

२५२ शब्द संग्रह
बुन्द बैसाख की साख सिन्ध गति सन्तन ने गाई ।
सुनि के सज्जन होय समझ करि छोड़ै चतुराई ॥
दीन दिल दुरमत को छोड़ै ।
मन मकरन्द१ की जानि मानि तन मन को सब तोड़ै ॥
लहर सतसँग की जब चटकै । हर दम पिय० ॥११॥
जबर जेठ की रीति करै कोइ किंकर जब होवै ।
मन के बिखम विकार काढ़ि के तुलसी सब धोवै ॥
भरम तजि भक्ति भजन करना ।
मन मूरख को बाँधि पकड़ कर जीवतही मरना ॥
निकल घट न्यारी ह्वै फटकै ।
हर दम पिय की पीर दरस बिन मन मोरा भटकै ॥१२॥
काष्ठ जिह्वास्वामी (देव)
जीवन समय—सं० १८३४ से १६०६ तक । जन्म स्थान—काशी । सतसंग
स्थान—काशी और रामनगर । जाति—सरजूपारी ब्राह्मण भीटरी मिश्र शाखा के ।
इन का विवाह काशी ही में हो गया था परंतु वैराग्य उपजने पर गृहस्थ
आश्रम को

काष्ठ जिह्वास्वामी (देव) २५३
लटकत लट लहरत स्रुति कुन्डल, गहनन की झमकान ।
आपुस मैं हँसि हँसि कै दोऊ, खात खियावत पान ॥२॥
जहँ बसंत नित महमह महकत, लहरत लता बितान१ ।
बिहरत दोउ तेहि सुमन बाग मैं, अलि कोकिल कर गान॥३॥
ओहि रहस्य सुख रस को कैसे, जानि सकै अज्ञान ।
देवहु की जहँ मति पहुंचत नहिँ, थकि गये बेद पुरान ॥४॥
(२)
चीखि चीखि चसकन से राम सुधा पीजिये ।
राम चरित सागर मैं रोम रोम भीँजिये ॥ १ ॥
राग द्वेस जग बढ़ाइ काहे को छीजिये ।
परदुखवन देखत हीं आप सेँ पसीजिये ॥ २ ॥
तारि तारि खैंचि खाँचि स्रुति को नहिँ गाँजिये ।
जा मैं रस बनो रहै वही अर्थ कीजिये ॥ ३ ॥
बहुत काल सन्तन के दोऊ चरन मीँजिये ।
देव दृष्टि पाइ विमल जुग जुग लौँ जीजिये ॥ ४ ॥
॥ विनय ॥
मैं तो मन ही मन पछिताय रह्यौ ॥ टेक ॥
साज समाज सरस पायहु के, कर से रतन गँवाय रह्यौ ॥१॥
यह नर तन यह काया उत्तम, बिन सतसंग नसाय रह्यौ ॥२॥
पढ़्यौ गुन्यौ सिखयौ औरन को, आप बिषय लपटाय रह्यौ॥३
चित्र विचित्र करम को धागा, जनम जनम अरुझाय रह्यौ ॥४
काहे को कबहुँ यह सुरझहि, दिन दिन अधिक फँसाय रह्यौ॥५
सदा मुक्ति को ज्ञान अगम लखि, गले हार पहिराय रह्यौ ॥६
जिव को सूत सिवहि से अरुझे, बिनती देव सुनाय रह्यौ ॥७
(१) मंडप ।

२५४ शब्द संग्रह
॥ उपदेश ॥
(१)
कोई सफान देखा दिल का, साँचा बना झिलमिल का ॥ टेक
कोइ बिल्ली कोइ बगुला देखा, पहिरे फकीरी खिलका१।
बाहर मुख से ज्ञान छाँटते, भीतर कोरा छिलका ॥ १ ॥
भजन करन मैं गजब आलसी, जैसे थका मँजिल का ।
औरन के पीसन मैं सुरमा, जैसे बहा सिल का ॥ २ ॥
पढ़े लिखे कुछ ऐसेहि वैसे, बड़ा घमंड अकिल का ।
जहरी बचन यौं मुख से निकलैं, साँप निकलता बिलका ॥३
भजन बिना सब जप तप झूठा, झूठ तवक्क़ा फजल२ का ।
क्या कहिये गुरुदेव न पाया, महरम३ आँख के तिल का ॥४
(२)
समुझ बूझ जिय मैं बन्दे, क्या करना है क्या करता है ।
गुन का मालिक आपै बनता, अरु दोष राम पर धरता है ॥१
अपना धरम छोड़ि औरौं के, ओछे धरम पकरता है ।
अजब नसे की गफलत आई, साहिब को नहिं डरता है ॥२॥
जिनके खातिर जान माल से, बहि बहि के तू मरता है ।
वे क्या तेरे काम पड़ेंगे, उनका लहना भरता है ॥ ३ ॥
देव धरम चाहे सो करि ले, आवागमन न टरता है ।
प्यारे केवल राम नाम से, तेरा मतलब सरता है ॥ ४ ॥
फुटकर
कवित्त
काहू के अधार सेवा बनिज व्यौपार को है,
काहू के अधार थित बित खेत गाम को ॥
(१) ख़िरक़ा=गदड़ी । (२) बड़ाई की आशा । (३) भेदी ।

फुटकर २५५
काहू के अधार तन सार भ्रात बंधुन को,
काहू के अधार प्रिय सार निज नाम को ॥
काहू के अधार विद्या बुद्धि अरु बल को है,
काहू के अधार हाथी घोड़ा धन धाम को ॥
मैं तो निराधार मेरी हरिहि करेंगे सार,
मेरे तो अधार एक जानो हरि नाम को ॥
कवित्त
कब को पुकारत हौँ सुनौ नहीं एको बात,
एहो नंदलाल तुम कैसे प्रतिपाल हौ ॥
कहैं ह दयाल सो तो दया हू न देखियत,
मेरी मति ऐसी ओछी नीके पसुपाल हौ ॥
धस्यो हो नृसिंह रूप तबहीं प्रह्लाद काज,
अब तो न लाज कछू गोधन मैं ग्वाल हौ ॥
डास्यो तेल कान मैं कि बस्यो जाय कानन१ मैं,
सेस सेज लेटि कि धौँ पौंढ़े जा पताल हौ ॥
सवैया
आईं सवै ब्रज गोप लली, ठिठकीं ह्वै गली जमुना जल न्हाने १
औचक आय मिले रसखान, बजावत बेनु सुनावत तानें ॥२
हाहा [ सिसकीं सिगरी, मति मैन२ हरी हियरा हुलसाने ३
घूम दिमाने३ अमाने चकोर से, ओर से दोऊ चलैँ दृग बानैँ॥४
सवैया
सुनिये सब की कहिये न कछू, रहिये इमि या भव बागर४ सैँ१
करिये व्रत नेम सचाई लिये, जिन तैं तरिये भव सागर मैं ॥२
मिलिये सब सोँ दुरभाव बिना, रहिये सतसंग उजागर मैं ३
रसखान गुबिंदहि यौं भजिये, जिमि नागरि५ को चित गागर मैं ॥४

(१) वन। (२) कामदेव। (३) दीवाने। (४) झाड़ी। (५) चतुर स्त्री।

२५६ शब्द संग्रह
सवैया
वह साँवरो नन्द को छैल अली, अब तो अति ही इतरान लगो॥१
नित घाटन बाटन कुंजन में, मोहिं देखत ही नियरान लगो॥२
रसखान बखान कहा कहिये, तकि सैनन सों मुसकान लगो॥३
तिरछी बरछी सम मारत है, दृग बान कमान सु का...
शब्द
कहँ गये प्यारे, झलक दिखा के ॥ टेक ॥
हिरदै बसी माधुरी मूरत, कस जाव प्रीतम खूँट छुड़...
बिरह अगिन ने तन मन फूँका, हिया जुड़ावो अमी प...
भई बावरी इत उत डोलौं, तन मन की सब सुद्धि...
मैं तो। हाँ पतितन को नायक, कैसे बचिहै। पन¹ बिस...
अब तो कर मैं लीन्ह सिँधौरा, तुम से मिलिहौँ दहँ ज...
बाँह गहे की लाज तुम्हीं को, का पै जावौँ तुम्हरो क...
प्रेम प्रसाद देहु निज स्वामी, मोको दासनदास बना...
रुबाई
ख़ाक आप को समझना, इकसीर² है तो यह है।
इख़लाक़³ सब से रखना, तसख़ीर⁴ है तो यह ।
सब काम अपना करना, तक़दीर⁵ के हवाले ।
नज़दीक आरिफ़ों⁶ के, तदवीर है तो यह ॥
रुबाई
वीराँ किया जब आप को बस्ती नज़र पड़ी
जब आप नेस्त हम हुए हस्ती नज़र पड़ी ॥
देखा तो ख़ाक्सारी ही आली मुक़ाम है ।
ज्यों ज्यों बलंद हम हुए पस्ती नज़र पड़ी ॥
॥ इति ॥
(१) पतित-पावन होने का प्रण । (२) रसायन । (३) आदर ...
(४) बशी करन । (५) मौज । (६) साधों ।

शुद्धि पत्र
शब्द संग्रह
पंक्ति अशुद्ध शुद्ध
६ बिछुड़ बिछुड़ैँ
१५ गरीबा गरीबी
५ भाँड़े भाँड़ैँ
६ फाँसी१ फाँसी°
५ कारति कीरति
४ (जीवन- भाजराज भोजराज
चरित्र की)
१६ पड़ा पड़ी
" राग रोग
८ बिहारा विहारी
१२ तेर तेरे
५ उघाड़े उघाड़ो
१० (जीवन चरित्र को) लख लिख
१ (नोट की) श्रथ अर्थ°
३ (नोट की) सम्बन्धा सम्बन्धी
४ इद्रिन इंद्रिन
२ कैस कैसैँ
१८ मँ मैं
३ म मैं
१३ लान्हा लीन्ह्यो
नोट हू हूँ
६ रँग रंग
१७ ह हैं
२० अयौ आयौ

२ शुद्धि पत्र
पृष्ठ पंक्ति अशुद्ध शुद्ध
१६६ नोट फिर मौन (चुप) फिर मौन गो. १
साधकर बैठे आर साध कर गो. २
धन दोलत और धन गो. ३
१७३ नोट खान
,, ,, मे
१७४ ४ अठौ
१७६ ४ (चरनदास की) पडित
१८८ ७ (नोट की) ह
२०७ नोट बगैर
२५० १७ बयोँ
२५४ नोट गड़ड़ी
२५५ ६ ह
२५६ १४ तसख़ीर