संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)

संतबानी संग्रह (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - कबीर, दादू, तुलसी, पलटू आदि प्रमुख संतों की वाणी)
Santbani Sangrah: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी एवं बेलवेडियर प्रेस द्वारा
DevanagariHindipublished267 पृष्ठ
पृष्ठ 264, कुल 267 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 264फुटकर २५५
फुटकर २५५
काहू के अधार तन सार भ्रात बंधुन को,
काहू के अधार प्रिय सार निज नाम को ॥
काहू के अधार विद्या बुद्धि अरु बल को है,
काहू के अधार हाथी घोड़ा धन धाम को ॥
मैं तो निराधार मेरी हरिहि करेंगे सार,
मेरे तो अधार एक जानो हरि नाम को ॥
कवित्त
कब को पुकारत हौँ सुनौ नहीं एको बात,
एहो नंदलाल तुम कैसे प्रतिपाल हौ ॥
कहैं ह दयाल सो तो दया हू न देखियत,
मेरी मति ऐसी ओछी नीके पसुपाल हौ ॥
धस्यो हो नृसिंह रूप तबहीं प्रह्लाद काज,
अब तो न लाज कछू गोधन मैं ग्वाल हौ ॥
डास्यो तेल कान मैं कि बस्यो जाय कानन१ मैं,
सेस सेज लेटि कि धौँ पौंढ़े जा पताल हौ ॥
सवैया
आईं सवै ब्रज गोप लली, ठिठकीं ह्वै गली जमुना जल न्हाने १
औचक आय मिले रसखान, बजावत बेनु सुनावत तानें ॥२
हाहा [ सिसकीं सिगरी, मति मैन२ हरी हियरा हुलसाने ३
घूम दिमाने३ अमाने चकोर से, ओर से दोऊ चलैँ दृग बानैँ॥४
सवैया
सुनिये सब की कहिये न कछू, रहिये इमि या भव बागर४ सैँ१
करिये व्रत नेम सचाई लिये, जिन तैं तरिये भव सागर मैं ॥२
मिलिये सब सोँ दुरभाव बिना, रहिये सतसंग उजागर मैं ३
रसखान गुबिंदहि यौं भजिये, जिमि नागरि५ को चित गागर मैं ॥४
(१) वन। (२) कामदेव। (३) दीवाने। (४) झाड़ी। (५) चतुर स्त्री।