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सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

सन्त नामदेव जी की हिन्दी कविता (डॉ. भगीरथ मिश्र - सन्त नामदेव के सम्पूर्ण हिन्दी पद सटीक)

Sant Namdev Ji Ki Hindi Kavita by Dr. Bhagirath Mishra

सन्त नामदेव (सम्पादक: डॉ. भगीरथ मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished332 पृष्ठ

पृष्ठ 290, कुल 332 में से

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पृष्ठ 290

२६८ नामदेव की हिन्दी कविता
मध्ययुगीन नवजागरण के प्रणेता नामदेव
मध्ययुगीन भक्ति साहित्य को पराजय और प्रताडना का साहित्य कहकर उसे
बराबर छोटा करने का प्रयत्न होता रहा है। इसमें संदेह नहीं कि गंगा की घाटी में हिंदू
शक्ति की पराजय भारतीय संस्कृति के लिए एक बड़ी दुर्घटना थी और उसने हिंदू
धर्म चेतना पर गहरा आघात पहुँचाया। परन्तु सौभाग्य से दक्षिण भारत इस प्रहार से
बचा हुआ था और वहाँ वैष्णव धर्म तथा संस्कृति के रूप में भक्तिवाद पर आधारित
व्यापक हिन्दू धर्म का विकास हो चुका था। १५० वर्षों बाद हम उत्तर भारत में हिंदू
धर्म को वैष्णव भक्ति के रूप में नया संस्कार प्राप्त करते पाते हैं और उसकी जीवन
शक्ति से चकित हो जाते हैं। भयंकर दमन, अराजकता तथा जन हानि के भीतर भी
हिंदू मन अपनी स्वतंत्रता तथा अखंडिता को सुरक्षित रख सका, यह सचमुच चमत्कार
से कम नहीं।
वास्तव में स्वामी रामानंद (सं० १२६६ ई०) से ही इस नव जागरण (रिनेसाँ)
को संबद्ध कर सकते हैं। इस जागरण की भूमिका कुछ पहले ही महाराष्ट्र में संत
ज्ञानेश्वर (१२७१-१२९६ ई०) और नामदेव (१२७०-१३५० ई०) के द्वारा स्थापित
हो गई थी। यह इतिहास सिद्ध है कि इन दोनों संतों ने साथ-साथ उत्तर भारत की
यात्रा की थी और मुसलमानों द्वारा महानाश का ताण्डव नृत्य स्वयं देखा था।
नामदेव के अभंगों में उनकी हृदय वेदना स्पष्ट रूप से प्रतिध्वनित हुई है। वे
कहते हैं—
'पत्थर के देवताओं को मुसलमानों ने तोड़ा फोड़ा और पानी में डुबो दिया
फिर भी वे न क्रोध करते हैं, न क्रंदन करते हैं। हे ईश्वर ! मैं ऐसे देवताओं का दर्शन
नहीं चाहता।'१
संभवत यह क्रांति की पहली आवाज थी जिसमें उस युग का हृदय मथन प्रति-
ध्वनित हुआ था। ज्ञानेश्वर के समाधि (सन् १२९६ ई०) लेने के पश्चात् नामदेव
उत्तर भारत लौटे और उन्होंने अपना शेष जीवन वहीं व्यतीत किया। नामदेव को इस
बात का श्रेय मिलना चाहिए कि उन्होंने हिंदुओं की धार्मिक और सामाजिक त्रुटियों को
पहचाना और उनको ध्यान में रखते हुए नये युग धर्म के अनुरूप एक अत्यन्त सहिष्णु,
उदार तथा क्रांतिकारी समाधान हिंदू-मात्र के सामने रखा।
१. ऐसे देव हेहि फोडिले तुरकी। पातले उदकी बाभातिना।
ऐसी ही दैवतें नको दाखू देवा। नामा केशवा विनवितसे ॥
—सकल संत गाथा, नामदेव महाराजांचे अभंग, अभंग १६६७।