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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

विवाहप्रकरणम् १६३
ओं मित्रः सत्यानामधिपतिः स मावत्वस्मिन्ब्रह्मण्यस्मिन्
क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यां देवहूत्याꣳ
स्वाहा॥ इदं मित्राय सत्यानामधिपतये–इदन्न मम॥८॥
ओं वरुणोऽपामधिपतिः स मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन्
क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यां देवहूत्याꣳ
स्वाहा॥ इदं वरुणायापामधिपतये–इदन्न मम॥९॥
ओं समुद्रः स्रोत्यानामधिपतिः स मावत्वस्मिन्
ब्रह्मण्यस्मिन्क्षेत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यां
देवहूत्याꣳ स्वाहा॥ इदं समुद्राय स्रोत्यानामधिपतये–इदन्न
मम॥१०॥
ओम् अन्नꣳ साम्राज्यानामधिपतिस्तन्मावत्वस्मिन्
ब्रह्मण्यस्मिन्क्षेत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यां
देवहूत्याꣳ स्वाहा॥ इदमन्नाय साम्राज्यानामधिपतये–इदन्न
मम॥११॥
ओं सोमऽओषधीनामधिपतिः स मावत्वस्मिन्
ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यां
देवहूत्याꣳ स्वाहा॥ इदं सोमाय ओषधीनामधिपतये–इदन्न
मम॥१२॥
ओं सविता प्रसवानांमधिपतिः स मावत्वस्मिन्
ब्रह्मण्यस्मिन्क्षेत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यां
देवहूत्याꣳ स्वाहा॥ इदं सवित्रे प्रसवानांमधिपतये–इदन्न
मम॥१३॥
ओं रुद्रः पशूनामधिपतिः स मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन्
क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यां देवहूत्याꣳ
स्वाहा॥ इदं रुद्राय पशूनामधिपतये–इदन्न मम॥१४॥

१६४ संस्कारविधिः
ओं त्वष्टा रूपाणामधिपतिः स मावत्वस्मिन्ब्रह्मण्यस्मिन्
क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्याꣳ
स्वाहा ॥ इदं त्वष्ट्रे रूपाणामधिपतये—इदन्न मम ॥ १५ ॥
ओं विष्णुः पर्वतानामधिपतिः स मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्य-
स्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन् कर्मण्यस्यां
देवहूत्याꣳ स्वाहा ॥ इदं विष्णवे पर्वतानामधिपतये—इदन्न
मम ॥ १६ ॥
ओं मरुतो गणानामधिपतयस्ते मावन्त्वस्मिन्ब्रह्मण्यस्मिन्
क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्याꣳ
स्वाहा ॥ इदं मरुद्भ्यो गणानामधिपतिभ्यः—इदन्न मम ॥ १७ ॥
ओं पितरः पितामहाः परेऽवरे ततास्ततामहा इह
मावन्त्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधा-
यामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्याꣳ स्वाहा ॥ इदं पितृभ्यः
पितामहेभ्यः परेभ्योऽवरेभ्यस्ततेभ्यस्ततामहेभ्यश्च—इदन्न
मम ॥ १८ ॥
इस प्रकार अभ्यातन होम की अठारह आज्याहुति दिये
पीछे, पुनः—
ओम् अग्निरैतु प्रथमो देवतानाꣳ सोऽस्यै प्रजां मुञ्चतु
मृत्युपाशात्। तदयꣳ राजा वरुणोऽनुमन्यतां यथेयꣳ स्त्री
पौत्रमघन्न रोदात् स्वाहा ॥ इदमग्नये—इदन्न मम ॥ १ ॥
ओम् इमामग्निस्त्रायतां गार्हपत्यः प्रजामस्यै नयतु
दीर्घमायुः। अशून्योपस्था जीवतामस्तु माता पौत्रमानन्द-
मभिविबुध्यतामियꣳ स्वाहा ॥ इदमग्नये—इदन्न मम ॥ २ ॥
ओम् स्वस्ति नोऽग्ने दिवा पृथिव्या विश्वानि धेह्ययथा
यजत्र। यदस्यां मयि दिवि जातं प्रशस्तं तदस्मासु द्रविणं धेहि
चित्रꣳ स्वाहा ॥ इदमग्नये—इदन्न मम ॥ ३ ॥

विवाहप्रकरणम् १६५
ओं सुगन्नु पन्थां प्रदिशन्न एहि ज्योतिष्मध्ये ह्यजरन्नऽ
आयुः। अपैतु मृत्युरमृतं म आगाद् वैवस्वतो नोऽअभयं
कृणोतु स्वाहा ॥ इदं वैवस्वताय—इदन्न मम ॥४॥
ओं परं मृत्योऽअनु परेहि पन्थां यत्र नोऽअन्य इतरो
देवयानात्। चक्षुष्मते शृण्वते ते ब्रवीमि मा नः प्रजा ँ रीरिषो
मोत वीरान्स्वाहा ॥ इदं मृत्यवे—इदन्न मम ॥ ५ ॥
ओं द्यौस्ते पृष्ठ ँ रक्षतु वायुरूरू अश्विनौ च। स्तनन्धयस्ते
पुत्रान्सविताभिरक्षत्वावाससः परिधानाद् बृहस्पतिर्विश्वे देवा
अभिरक्षन्तु पश्चात्स्वाहा ॥ इदं विश्वेभ्यो देवेभ्यः—इदन्न
मम ॥ ६ ॥
ओं मा ते गृहेषु निशि घोष उत्थादन्यत्र त्वद् रुदत्यः
संविशन्तु मा त्व ँ रुदत्युरऽआवधिष्ठा जीवपत्नी पतिलोके
विराज पश्यन्ती प्रजा ँ सुमनस्यमाना ँ स्वाहा ॥ इदमग्नये—
इदन्न मम ॥ ७ ॥
ओम् अप्रजस्यं पौत्रमर्त्यपाप्मानमुत वाऽअघम्। शीर्ष्णः
स्रजमिवोन्मुच्य द्विषद्भ्यः प्रतिमुञ्चामि पाश ँ स्वाहा ॥
इदमग्नये—इदन्न मम ॥ ८ ॥
इन प्रत्येक मन्त्रों से एक-एक आहुति करके आठ आज्याहुति
दीजिए।
तत्पश्चात् पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे (ओं भूरग्नये स्वाहा)
इत्यादि चार मन्त्रों से चार आज्याहुति दीजिए।
ऐसे होम करके वर आसन से उठ, पूर्वाभिमुख बैठी वधू
के सम्मुख पश्चिमाभिमुख खड़ा रहकर अपने वामहस्त से वधू
का दाहिना हाथ चत्ता धरके ऊपर को उचाना और अपने दक्षिण
हाथ से वधू की उठाई हुई दक्षिण हस्ताञ्जलि को अंगुष्ठसहित
चत्ती ग्रहण करके, वर—

१६६ संस्कारविधिः
ओं गृ॒भ्णामि॑ ते सौभग॒त्वाय॒ हस्तं॒ मया॒ पत्या॑
ज॒रद॑ष्टि॒र्यथास॑ः । भगो॑ अ॒र्य॒मा स॑वि॒ता पुर॑न्धि॒र्मह्यं॑
त्वादु॒र्गार्ह॑पत्याय दे॒वाः * ॥ १ ॥
ओं भग॑स्ते॒ हस्त॑मग्रभीत् सवि॒ता हस्त॑मग्रभीत् ।
पत्नी॒ त्वम॑सि॒ धर्म॑णा॒हं गृ॒हप॑ति॒स्तव॑** ॥ २ ॥

  • हे वरानने ! जैसे मैं (सौभगत्वाय) ऐश्वर्य, सुसन्तानादि सौभाग्य
    की बढ़ती के लिए (ते) तेरे (हस्तम्) हाथ को (गृभ्णामि) ग्रहण
    करता हूँ, तू (मया) मुझ (पत्या) पति के साथ (जरदष्टिः)
    जरावस्था को प्राप्त सुखपूर्वक (आसः) हो, तथा हे वीर ! मैं सौभाग्य
    की वृद्धि के लिए आपके हस्त को ग्रहण करती हूँ। आप मुझ
    पत्नी के साथ वृद्धावस्था पर्यन्त प्रसन्न और अनुकूल रहिये। आपको
    मैं और मुझको आप आज से पति-पत्नी भाव करके प्राप्त हुए
    हैं। (भगः) सकल ऐश्वर्ययुक्त (अर्यमा) न्यायकारी (सविता)
    सब जगत् की उत्पत्ति का कर्त्ता (पुरन्धिः) बहुत प्रकार के जगत्
    का धर्त्ता परमात्मा और (देवाः) ये सब सभामण्डप में बैठे हुए
    विद्वान् लोग (गार्हपत्याय) गृहाश्रमकर्म के अनुष्ठान के लिए (त्वा)
    तुझको (मह्यम्) मुझे (अदुः) देते हैं। आज से मैं आपके हस्ते
    और आप मेरे हाथ बिक चुके हैं, कभी एक-दूसरे का अप्रियाचरण
    न करेंगे ॥ १ ॥
    ** हे प्रिये ! (भगः) ऐश्वर्ययुक्त मैं (ते) तेरे (हस्तम्) हाथ को
    (अग्रभीत्) ग्रहण करता हूँ तथा (सविता) धर्मयुक्त मार्ग में प्रेरक
    मैं तेरे (हस्तम्) हाथ को (अग्रभीत्) ग्रहण कर चुका हूँ, (त्वम्)
    तू (धर्मणा) धर्म से मेरी (पत्नी) भार्या (असि) है और (अहम्)
    मैं धर्म से (तव) तेरा (गृहपतिः) गृहपति हूँ। अपने दोनों मिलके
    घर के कामों की सिद्धि करें, और जो दोनों का अप्रियाचरण
    व्यभिचार है, उसको कभी न करें, जिससे घर के सब काम सिद्ध,
    उत्तम सन्तान, ऐश्वर्य और सुख की बढ़ती सदा होती रहे ॥ २ ॥

विवाहप्रकरणम् १६७
ममे॒यम॑स्तु पोष्या॒ मह्यं॑ त्वादा॒द् बृह॒स्पति॑:।
मया॒ पत्या॑ प्र॒जाव॑ति॒ सं जीव श॒रद॑: श॒तम्* ॥ ३ ॥
त्वष्टा॒ वासो॒ व्य॑दधाच्छु॒भे कं बृहस्पते॑: प्र॒शिषा॑ क॒वीनाम्।
तेने॒मां नारीं॑ सवि॒ता भग॑श्च॒ सूर्यामि॑व॒ परि॑ धत्तां प्र॒जया॑¶ ॥ ४ ॥

  • हे अनघे! (बृहस्पति:) सब जगत् का पालन करनेहारे परमात्मा
    ने जिस (त्वा) तुझको (मह्यम्) मुझे (अदात्) दिया है (इयम्)
    यही तू जगत्भर में मेरी (पोष्या) पोषण करने योग्य पत्नी (अस्तु)
    हो, हे (प्रजावति) तू (मया पत्या) मुझ पति के साथ (शतम्)
    सौ (शरद:) शरद् ऋतु अर्थात् शतवर्ष पर्यन्त (शं जीव) सुखपूर्वक
    जीवन धारण कर। वैसी ही वधू भी वर से प्रतिज्ञा करावे—हे
    भद्रवीर! परमेश्वर की कृपा से आप मुझे प्राप्त हुए हो, मेरे लिए
    आपके बिना इस जगत् में दूसरा पति अर्थात् स्वामी पालन करनेहारा
    सेव्य, इष्टदेव कोई नहीं है, न मैं आपसे अन्य दूसरे किसी को
    मानूँगी, जैसे आप मेरे सिवाय दूसरी स्त्री से प्रीति न करोगे, वैसे
    मैं भी किसी दूसरे पुरुष के साथ प्रीतिभाव से न वर्त्ता करूँगी।
    आप मेरे साथ सौ वर्ष पर्यन्त आनन्द से प्राण धारण कीजिए॥ ३ ॥
    हे शुभानने! जैसे (बृहस्पते:) इस परमात्मा की सृष्टि में और उसकी
    तथा (कवीनाम्) आप्त विद्वानों की (प्रशिषा) शिक्षा से दम्पती
    होते हैं, (त्वष्टा) जैसे बिजली सबको व्यास हो रही है, वैसे तू
    मेरी प्रसन्नता के लिए (वास:) सुन्दर वस्त्र (शुभे) और आभूषण
    तथा (कम्) मुझसे सुख को प्राप्त हो, इस मेरी और तेरी इच्छा
    को परमात्मा (व्यदधात्) सिद्ध करे। जैसे (सविता) सकल जगत्
    की उत्पत्ति करनेहारा परमात्मा (च) और (भग:) पूर्ण ऐश्वर्ययुक्त
    (प्रजया) उत्तम प्रजा से (इमाम्) इस तुझ (नारीम्) मुझ नर
    की स्त्री को (परिधत्ताम्) आच्छादित, शोभायुक्त करे, वैसे मैं (तेन)
    इस सबसे (सूर्याम् इव) सूर्य की किरण के समान तुझको वस्त्र
    और भूषणादि से सुशोभित सदा रक्खूँगा। तथा हे प्रिय! आपको
    मैं इसी प्रकार सूर्य के समान सुशोभित आनन्द अनुकूल प्रियाचरण

१६८ संस्कारविधिः
इन्द्राग्नी॒ द्यावा॑पृथि॒वी मा॑त॒रिश्वॉ मि॒त्रावरु॑णा॒ भगो॑ अ॒श्विनो॒भा।
बृह॒स्पति॒र्म॒रुतो॒ ब्रह्म॒ सोम॑ इ॒मां नारीं॒ प्रजया॑ वर्धयन्तु॑ ॥५॥
अ॒हं वि॒ष्यामि॒ मयि॑ रू॒पम॑स्या॒ वेद॑दित् पश्य॒न्मन॑सः कुला॒यम्। न
स्ते॒यम॒द्भि म॒नसोद॑मुच्ये स्व॒यं श्र॑थ्नानो वरु॑णस्य॒ पाशा॑न् ᳒ ॥६॥
करके (प्रजया) ऐश्वर्य, वस्त्राभूषण आदि से सदा आनन्दित रक्खूँगी ॥४॥

  • हे मेरे सम्बन्धी लोगो ! जैसे (इन्द्राग्नी) बिजली और प्रसिद्ध अग्नि
    (द्यावापृथिवी) सूर्य और भूमि (मातरिश्वॉ) अन्तरिक्षस्थ वायु
    (मित्रावरुणा) प्राण और उदान तथा (भगः) ऐश्वर्य (अश्विना)
    सद्वैद्य और सत्योपदेशक (उभा) दोनों (बृहस्पतिः) श्रेष्ठ, न्यायकारी,
    बड़ी प्रजा का पालन करनेहारा राजा (मरुतः) सभ्य मनुष्य, (ब्रह्म)
    सबसे बड़ा परमात्मा और (सोमः) चन्द्रमा तथा सोमलतादि
    ओषधिगण सब प्रजा की वृद्धि और पालन करते हैं, वैसे (इमां,
    नारीम्) इस मेरी स्त्री को (प्रजया) प्रजा से बढ़ाया करते हैं, वैसे
    तुम भी (वर्धयन्तु) बढ़ाया करो। जैसे मैं इस स्त्री को प्रजा आदि
    से सदा बढ़ाया करूँगा, वैसे स्त्री भी प्रतिज्ञा करे कि मैं भी इस
    मेरे पति को सदा आनन्द, ऐश्वर्य और प्रजा से बढ़ाया करूँगी।
    जैसे ये दोनों मिलके प्रजा को बढ़ाया करते हैं, वैसे तू और मैं
    मिलके गृहाश्रम के अभ्युदय को बढ़ाया करें॥५॥
    ० हे कल्याणक्रोडे! जैसे (मनसः) मन से (कुलायम्) कुल की
    वृद्धि को (पश्यन्) देखता हुआ (अहम्) मैं (अस्याः) इस तेरे
    (रूपम्) रूप को (विष्यामि) प्रीति से प्राप्त और इसमें प्रेम द्वारा
    व्याप्त होता हूँ, वैसे यह तू मेरी वधू (मयि) मुझमें प्रेम से व्याप्त
    होके अनुकूल व्यवहार को (वेदत्) प्राप्त होवे। जैसे मैं (मनसा)
    मन से भी इस तुझ वधू के साथ (स्तेयम्) चोरी को (उदमुच्ये)

विवाहप्रकरणम् १६९
इन पाणिग्रहण के छह मन्त्रों को बोलके, पश्चात् वर वधू
की हस्ताञ्जलि पकड़के उठावे और उसको साथ लेके जो कलश
कुण्ड की दक्षिण दिशा में प्रथम स्थापन किया था, उसको वही
पुरुष जो कलश के पास बैठा था, वर-वधू के साथ उसी कलश
को लेकर चले। यज्ञकुण्ड की दोनों प्रदक्षिणा करके—
ओम् अमोऽहमस्मि सा त्वꣳ सा त्वमस्यमोऽहम्।
सामाहमस्मि ऋक्त्वं द्यौरहं पृथिवी त्वं तावेव विवहावहै सह
रेतो दधावहै। प्रजां प्रजनयावहै पुत्रान् विन्दावहै बहून्। ते
सन्तु जरदष्टयः संप्रीयौ रोचिष्णू सुमनस्यमानौ। पश्येम शरदः
शतं जीवेम शरदः शतꣳ शृणुयाम शरदः शतम्॥ ७॥
छोड़ देता हूँ और किसी उत्तम पदार्थ का चोरी से (नाद्मि) भोज
नहीं करता हूँ, (स्वयम्) आप (श्रथ्नानः) पुरुषार्थ से शिथिल
होकर भी (वरुणस्य) उत्कृष्ट व्यवहार में विघ्नरूप दुर्व्यसनी पुरुष
के (पाशान्) बन्धनों को दूर करता रहूँ, वैसे (इत्) ही यह वधू
भी किया करे। इसी प्रकार वधू भी स्वीकार करे कि—मैं भी
इसी प्रकार आपसे वर्त्ता करूँगी॥ ६॥

  • हे वधू! जैसे (अहम्) मैं (अमः) ज्ञानवान् ज्ञानपूर्वक तेरा ग्रहण
    करनेवाला (अस्मि) होता हूँ, वैसे (सा) सो (त्वम्) तू भी
    ज्ञानपूर्वक मेरा ग्रहण करनेहारी (असि) है, जैसे (अहम्) मैं अपने
    पूर्ण प्रेम से तुझको (अमः) ग्रहण करता हूँ, वैसे (सा) मुझसे
    ग्रहण की हुई (त्वम्) तू भी मुझको ग्रहण करती है। (अहम्)
    मैं (साम) सामवेद के तुल्य प्रशंसित (अस्मि) हूँ, हे वधू! तू
    (ऋक्) ऋग्वेद के तुल्य प्रशंसित है, (त्वम्) तू (पृथिवी) पृथिवी
    के समान गर्भादि गृहाश्रम के व्यवहारों को धारण करनेहारी है
    और मैं (द्यौः) वर्षा करनेहारे सूर्य के समान हूँ, वह तू और मैं
    (तावेव) दोनों ही (विवहावहै) प्रसन्नतापूर्वक विवाह करें, (सह)
    साथ मिलके (रेतः) वीर्य को (दधावहै) धारण करें, (प्रजाम्)

१७० संस्कारविधिः
इन प्रतिज्ञा-मन्त्रों से दोनों प्रतिज्ञा करके—
पश्चात् वर वधू के पीछे रहके, वधू के दक्षिण ओर समीप
में जा उत्तराभिमुख खड़ा रहके, वधू की दक्षिणाञ्जलि अपनी
दक्षिणाञ्जलि से पकड़के दोनों खड़े रहें और वह पुरुष पुनः
कुण्ड के दक्षिण में कलश लेके वैसे बैठे। तत्पश्चात् वधू की
माता अथवा भाई जो प्रथम चावल और ज्वार की धाणी सूप
में रक्खी थी, उसको बाएँ हाथ में लेके दाहिने हाथ से वधू
का दक्षिण पग उठवाके पत्थर की शिला पर चढ़वावे और
उस समय वर—
ओम् आरोहेममश्मानमश्मेव त्वं स्थिरा भव।
अभितिष्ठ पृतन्यतोऽवबाधस्व पृतनायतः ॥ १ ॥
इस मन्त्र को बोले।
तत्पश्चात् वधू-वर कुण्ड के समीप जाके पूर्वाभिमुख दोनों
खड़े रहें और यहाँ वधू दक्षिण ओर रहके अपनी हस्ताञ्जलि
को वर की हस्ताञ्जलि पर रक्खे।
तत्पश्चात् वधू की माँ या भाई, जो बाएँ हाथ में धाणी
का सूपड़ा पकड़के खड़ा रहा हो, वह धाणी का सूपड़ा भूमि
पर धर अथवा किसी के हाथ में देके, जो वधू-वर की एकत्र
की हुई, अर्थात् नीचे वर की और ऊपर वधू की हस्ताञ्जलि

उत्तम प्रजा को (प्रजनयावहै) उत्पन्न करें, (बहून्) बहुत (पुत्रान्)
पुत्रों को (विन्दावहै) प्राप्त होवें। (ते) वे पुत्र (जरदष्टयः) जरावस्था
के अन्त तक जीवनयुक्त (सन्तु) रहें, (संप्रियौ) अच्छे प्रकार एक-
दूसरे से प्रसन्न (रोचिष्णू) एक-दूसरे में रुचियुक्त (सुमनस्यमानौ)
अच्छे प्रकार विचार करते हुए (शतम्) सौ (शरदः) शरद्ऋतु
अर्थात् शत वर्ष पर्यन्त एक-दूसरे को प्रेम की दृष्टि से (पश्येम)
देखते रहें (शतं शरदः) सौ वर्षपर्यन्त आनन्द से (जीवेम) जीते
रहें और (शतं शरदः) सौ वर्षपर्यन्त प्रिय वचनों को (शृणुयाम)
सुनते रहें॥७॥

विवाहप्रकरणम् १७१
है, उसमें प्रथम थोड़ा घृत सिंचन करके, पश्चात् प्रथम सूप
में से दाहिने हाथ की अञ्जलि से दो बार लेके वर-वधू की
एकत्र की हुई अञ्जलि में धाणी डाले। पश्चात् उस अञ्जलिस्थ
धाणी पर थोड़ा-सा घी सिंचन करे। पश्चात् वधू वर की
हस्ताञ्जलिसहित अपनी हस्ताञ्जल को आगे से नमाके—
ओ३म् अर्यमणं देवं कन्या अग्निमयक्षत।
स नो अर्यमा देवः प्रेतो मुञ्चतु मा पतेः स्वाहा॥
इदमर्यम्णे अग्नये—इदन्न मम॥ १॥
ओ३म् इयं नार्युपब्रूते लाजानावपन्तिका।
आयुष्मानस्तु मे पतिरेधन्तां ज्ञातयो मम स्वाहा॥
इदमग्नये—इदन्न मम॥ २॥
ओ३म् इमाँल्लाजानावपाम्यग्नौ समृद्धिकरणं तव।
मम तुभ्यं च संवननं तदग्निरनुमन्यतामियँ स्वाहा॥
इदमग्नये—इदन्न मम॥ ३॥
इन तीन मन्त्रों में एक-एक मन्त्र से एक-एक बार थोड़ी-
थोड़ी धाणी की आहुति तीन बार प्रज्वलित ईंधन पर देके, वर—
ओं सरस्वति प्रेदमव सुभगे वाजिनीवति। यान्त्वा
विश्वस्य भूतस्य प्रजायामस्याग्रतः यस्यां भूतँ समभवद्
यस्यां विश्वमिदं जगत्। तामद्य गाथां गास्यामि या स्त्रीणामुत्तमं
यशः॥ १॥
इस मन्त्र को बोलके अपने जमणे हाथ की हस्ताञ्जलि
से वधू की हस्ताञ्जलि पकड़के, वर—
ओं तुभ्यमग्रे पर्यवहन्त्सूर्यां वहतुना सह।
पुनः पतिभ्यो जायां दा अग्ने प्रजया सह॥ १॥
ओं कन्यला पितृभ्यः पतिलोकं यतीयमप दीक्षामयष्ट।
कन्या उत त्वया वयं धारा उदन्या इवातिगाहेमहि द्विषः॥ २॥
इन मन्त्रों को पढ़, यज्ञकुण्ड की प्रदक्षिणा करके, यज्ञकुण्ड

१७२ संस्कारविधिः
के पश्चिमभाग में पूर्व की ओर मुख करके थोड़ी देर दोनों
खड़े रहें।
तत्पश्चात् पूर्वोक्त प्रकार कलशसहित यज्ञकुण्ड की प्रदक्षिणा
कर, पुनः दो बार इसी प्रकार, अर्थात् सब मिलके तीन परिक्रमा
करके, अन्त में यज्ञकुण्ड के पश्चिम में थोड़ा खड़ा रहके, उक्त
रीति से तीन बार क्रिया पूरी हुए पश्चात् वधू की माँ अथवा
भाई उस सूप को तिरछा करके उसमें बाकी रही हुई धाणी
को वधू की हस्ताञ्जलि में डाल देवे। पश्चात् वधू—
ओं भगाय स्वाहा॥ इदं भगाय—इदन्न मम॥
इस मन्त्र को बोलके प्रज्वलित अग्नि पर वेदी में उस धाणी
की एक आहुति देवे। पश्चात् वर-वधू को दक्षिण भाग में रखके
कुण्ड के पश्चिम में पूर्वाभिमुख बैठके—
ओं प्रजापतये स्वाहा॥ इदं प्रजापतये—इदन्न मम॥
इस मन्त्र को बोलके स्रुवा से एक घृत की आहुति देवे।
तत्पश्चात् एकान्त में जाके वधू के बँधे हुए केशों को
वर—
प्र त्वा मुञ्चामि॒ वरु॑णस्य॒ पाशा॒द्येन॒ त्वाब॑ध्नात्
स॒वि॒ता सु॒शेव॑ः। ऋ॒तस्य॑ यो॒नौ सु॒कृ॒तस्य॑ लो॒केऽरि॑ष्टां
त्वा स॒ह पत्या॑ दधामि॥ १ ॥
प्रेतो मु॑ञ्चामि॒ नामुतः सुब॒द्धाम॒मुत॑स्करम्।
यथेयमिन्द्र मीढ्वः सुपु॒त्रा सु॒भगास॑ति॥ २ ॥
इन दोनों मन्त्रों को बोलके प्रथम वधू के केशों को छोड़ना।
तत्पश्चात् सभामण्डप में आके ‘सप्तपदी-विधि’ का आरम्भ
करे। इस समय वर के उपवस्त्र के साथ वधू के उत्तरीय वस्त्र
की गाँठ देनी, इसे ‘जोड़ा’ कहते हैं। वधू-वर दोनों जने आसन
पर से उठके वर अपने दक्षिण हाथ से वधू की दक्षिण हस्ताञ्जलि
पकड़के यज्ञकुण्ड के उत्तरभाग में जावें। तत्पश्चात् वर अपना

विवाहप्रकरणम् १७३
दक्षिण हाथ वधू के दक्षिण स्कन्धे पर रखके दोनों समीप-
समीप उत्तराभिमुख खड़े रहें। तत्पश्चात् वर—
मा सव्येन दक्षिणमतिक्राम ॥
ऐसा बोलके वधू को उसका दक्षिण पग उठवाके चलने
के लिए आज्ञा देवे और—
ओम् इष एकपदी भव सा मामनुव्रता भव विष्णुस्त्वा
नयतु पुत्रान् विन्दावहै बहूंस्ते सन्तु जरदष्टयः ॥
इस मन्त्र को बोलके वर अपने साथ वधू को लेकर ईशान
दिशा में एक पग* चले और चलावे।
ओम् ऊर्जे द्विपदी भव०*॥ इस मन्त्र से दूसरा।
ओं रायस्पोषाय त्रिपदी भव० ॥ इस मन्त्र से तीसरा।
ओं मयोभवाय चतुष्पदी भव० ॥ इस मन्त्र से चौथा।
ओं प्रजाभ्यः पञ्चपदी भव० ॥ इस मन्त्र से पाँचवाँ।
ओम् ऋतुभ्यः षट्पदी भव० ॥ इस मन्त्र से छठा ॥ और—
ओं सखे सप्तपदी भव० ॥ इस मन्त्र से सातवाँ पग चलना।
इस रीति से इन सात मन्त्रों से सात पग ईशान दिशा में
चलाके वधू-वर दोनों गाँठ बँधे हुए शुभासन पर बैठें।
तत्पश्चात् प्रथम से जो जल के कलश को लेके यज्ञकुण्ड
के दक्षिण में बैठाया था, वह पुरुष उस पूर्व-स्थापित जलकुम्भ

  • इस पग धरने की विधि ऐसी है कि वधू प्रथम अपना जमणा
    पग उठाके ईशानकोण की ओर बढ़ाके धरे, तत्पश्चात् दूसरे बायें
    पग को उठाके जमणे पग की पटली तक धरे, अर्थात् जमणे पग
    के थोड़ा-सा पीछे बायाँ पग रक्खे। इसी को एक पग गिणना।
    इसी प्रकार अगले छह मन्त्रों से भी क्रिया करनी, अर्थात् एक-
    एक मन्त्र से एक-एक पग ईशान दिशा की ओर धरना।
    जो 'भव' के आगे मन्त्र में पाठ है, सो छह मन्त्रों के इस 'भव'
    पद के आगे पूरा बोलके पग धरने की क्रिया करनी।

१७४ संस्कारविधिः
को लेके वधू-वर के समीप आवे और उसमें से थोड़ा-सा
जल लेके वधू-वर के मस्तक पर छिटकावे, और वर—
ओम् आपो॒ हि ष्ठा म॑यो॒भुव॒स्ता न॑ ऽ ऊ॒र्जे द॑धातन।
म॒हे रणा॑य॒ चक्ष॑से॥ १॥
यो व॑: शि॒वत॑मो॒ रस॒स्तस्य॑ भाजयते॒ह न॑:।
उ॒श॒तीरि॑व मा॒तर॑:॥ २॥
तस्मा॒ऽ अरं॑ गमाम वो॒ यस्य॒ क्षया॑य॒ जिन्व॑थ।
आपो॑ ज॒नय॑था च नः॥ ३॥
ओम् आपः शिवाः शिवतमाः शान्ताः शान्ततमास्तास्ते
कृण्वन्तु भेषजम्॥ ४॥
इन चार मन्त्रों को बोले। तत्पश्चात् वधू-वर वहाँ से
उठके—
ओं तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्। पश्येम शरदः
शतं जीवेम शरदः शतꣳ शृणुयाम शरदः शतं प्र ब्रवाम शरदः
शतमदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात्॥ १॥
इस मन्त्र को पढ़के सूर्य का अवलोकन करें।
तत्पश्चात् वर वधू के दक्षिण स्कन्धे पर अपना दक्षिण
हाथ लेके उससे वधू का हृदय-स्पर्श करके—
ओं मम व्रते ते हृदयं दधामि मम चित्तमनु चित्तं ते अस्तु।
मम वाचमेकमना जुषस्व प्रजापतिष्ट्वा नियुनक्तु मह्यम्॥*

  • हे वधू! (ते) तेरे (हृदयम्) अन्तःकरण और आत्मा को (मम)
    मेरे (व्रते) कर्म के अनुकूल (दधामि) धारण करता हूँ (मम)
    मेरे (चित्तमनु) चित्त के अनुकूल (ते) तेरा (चित्तम्) चित्त सदा
    (अस्तु) रहे, (मम) मेरी (वाचम्) वाणी को तू (एकमनाः)
    एकाग्रचित्त से (जुषस्व) सेवन किया कर। (प्रजापतिः) प्रजा का
    पालन करनेवाला परमात्मा (त्वा) तुझको (मह्यम्) मेरे लिए
    (नियुनक्तु) नियुक्त करे।

विवाहप्रकरणम् १७५
इस मन्त्र को बोले और उसी प्रकार वधू भी अपने दक्षिण
हाथ से वर के हृदय का स्पर्श करके इसी ऊपर लिखे हुए
मन्त्र को बोले*।
तत्पश्चात् वर वधू के मस्तक पर हाथ धरके—
सु॒म॒ङ्गली॒रियं व॒धूरि॒मां स॒मेत॒ पश्य॑त ।
सौभा॑ग्यमस्यै द॒त्त्वा याथास्तं॒ वि परे॑तन ॥
इस मन्त्र को बोलके कार्यार्थ आये हुए लोगों की ओर
अवलोकन करना और इस समय सब लोग—
‘ओं सौभाग्यमस्तु। ओं शुभं भवतु ॥’
इस वाक्य से आशीर्वाद देवें।
तत्पश्चात् वधू-वर यज्ञकुण्ड के समीप पूर्ववत् बैठके, पुनः
पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे दोनों (ओं यदस्य कर्मणो०), इस
स्विष्टकृत् मन्त्र से होमाहुति, अर्थात् एक आज्याहुति और पृष्ठ
३३ में लिखे प्रमाणे (ओं भूरग्नये स्वाहा) इत्यादि चार मन्त्रों
से एक-एक से एक-एक आहुति करके चार आज्याहुति देवें
और इस प्रमाणे विवाह का विधि पूरे हुए पश्चात् दोनों जने
आराम, अर्थात् विश्राम करें।

  • वैसे ही हे प्रिय वीर स्वामिन् ! आपके हृदय, आत्मा और अन्तःकरण
    को मेरे प्रियाचरण कर्म में धारण करती हूँ। मेरे चित्त के अनुकूल
    आपका चित्त सदा रहे। आप एकाग्र होके मेरी वाणी का जो कुछ
    मैं आपसे कहूँ उसका सेवन सदा किया कीजिए, क्योंकि आज
    से प्रजापति परमात्मा ने आपको मेरे अधीन किया है वैसे मुझको
    आपके अधीन किया है, अर्थात् इस प्रतिज्ञा के अनुकूल दोनों
    वर्त्ता करें, जिससे सर्वदा आनन्दित और कीर्तिमान, पतिव्रता और
    स्त्रीव्रत होके सब प्रकार के व्यभिचार, अप्रियभाषणादि को छोड़के
    परस्पर प्रीतियुक्त रहें।

१७६ संस्कारविधिः
इस रीति से थोड़ा-सा विश्राम करके विवाह का उत्तर-
विधि करें। यह उत्तर-विधि सब वधू के घर की ईशान दिशा
में, विशेष करके एक घर प्रथम से बना रक्खा हो, वहाँ जाके
करना।
तत्पश्चात् सूर्य अस्त हुए पीछे जब आकाश में नक्षत्र दीखें,
उस समय वधू-वर यज्ञकुण्ड के पश्चिम भाग में पूर्वाभिमुख
आसन पर बैठें और पृष्ठ ३० में लिखे प्रमाणे अग्न्याधान (ओं
भूर्भुवः स्वद्यौं०) इस मन्त्र से करें। यदि प्रथम ही सभामण्डप
ईशान दिशा में हुआ और प्रथम अग्न्याधान किया हो, तो
अग्न्याधान न करें। (ओम् अयन्त इध्म०) इत्यादि चार मन्त्रों
से समिदाधान करके, जब अग्नि प्रदीप्त होवे तब पृष्ठ ३२-३३
में लिखे प्रमाणे (ओम् अग्नये स्वाहा) इत्यादि चार मन्त्रों से
आघारावाज्यभागाहुति चार और पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे (ओं
भूरग्नये स्वाहा) इत्यादि चार मन्त्रों से चार व्याहृति आहुति, ये
सब मिलके आठ आज्याहुति देवें।
तत्पश्चात् निम्नलिखित मन्त्रों से प्रधान-होम करें—
ओं लेखासन्धिषु पक्ष्मस्वारोकेषु च यानि ते। तानि ते पूर्णाहुत्या .
सर्वाणि शमयाम्यहं स्वाहा ॥ इदं कन्यायै—इदन्न मम ॥
ओं केशेषु यच्च पापकमीक्षिते रुदिते च यत्। तानि०॥
ओं शीलेषु यच्च पापकं भाषिते हसिते च यत्। तानि०॥
ओम् आरोकेषु च दन्तेषु हस्तयोः पादयोश्च यत्। तानि०॥
ओम् ऊर्वोरुपस्थे जङ्घयोः सन्धानेषु च यानि ते। तानि०॥
ओं यानि कानि च घोराणि सर्वाङ्गेषु तवाभवन्।
पूर्णाहुतिभिराज्यस्य सर्वाणि तान्यशीशमं स्वाहा॥
इदं कन्यायै—इदन्न मम ॥
ये छह मन्त्र हैं। इनमें से एक-एक मन्त्र बोल, एक-एक
से एक-एक आहुति, अर्थात् छह आज्याहुति देनी। तत्पश्चात्

विवाहप्रकरणम् १७७
पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे (ओं भूरग्नये स्वाहा) इत्यादि चार व्याहृति
मन्त्रों से चार आज्याहुति देके—
वधू-वर वहाँ से उठके सभामण्डप के बाहर उत्तर दिशा
में जावें। तत्पश्चात् वर—
ध्रुवं पश्य॥
ऐसा बोलके वधू को ध्रुव का तारा दिखलावे१ और वधू
वर से बोले कि मैं—
पश्यामि ॥
ध्रुव-तारे को देखती हूँ।
तत्पश्चात् वधू बोले—
ओं ध्रुवमसि ध्रुवाहं पतिकुले भूयासम् ( अमुष्य२ असौ ) ॥
इस मन्त्र को बोलके, तत्पश्चात्—
अरुन्धतीं पश्य ॥
ऐसा वाक्य बोलके वर वधू को अरुन्धती का तारा
दिखलावे और वधू—
पश्यामि ॥
ऐसा कहके—
१. हे वधू वा वर ! जैसे यह ध्रुव दृढ़ स्थिर है, इसी प्रकार आप और
मैं एक-दूसरे के प्रियाचरणों में दृढ़ स्थिर रहें।
२. (अमुष्य) इस पद के स्थान में षष्ठीविभक्त्यन्त पति का नाम
बोलना, जैसे—शिवशर्मा पति का नाम हो तो ‘‘शिवशर्मणः’’ ऐसे,
और (असौ) इस पद के स्थान में वधू अपने नाम को प्रथमा-
विभक्त्यन्त बोलकर इस मन्त्र को पूरा बोले जैसे ‘‘भूयासं
सौभाग्यदाहम् शिवशर्मणस्ते’’ इस प्रकार दोनों पद जोड़के बोले।
‘‘हे स्वामिन्! सौभाग्यदा (अहम्) मैं (अमुष्य) आप शिवशर्मा
की अर्द्धांगी (पतिकुले) आपके कुल में (ध्रुव) निश्चल जैसेकि
आप ( ध्रुवम् ) दृढ़ निश्चयवाले मेरे स्थिर पति (असि) हैं, वैसे
मैं भी आपकी स्थिर दृढ़ पत्नी (भूयासम्) होऊँ।

१७८ संस्कारविधिः
ओम् अरुन्धत्यसि रुद्धाहमस्मि (अमुष्य१ असौ) ॥
इस मन्त्र को बोलके वर वधू की ओर देखके वधू के
मस्तक पर हाथ धरके-
ओं ध्रुवा द्यौर्ध्रुवा पृथिवी ध्रुवं विश्वमिदं जगत्।
ध्रुवासः पर्वता इमे ध्रुवा स्त्री पतिकुले इयम्२ ॥
ओं ध्रुवमसि ध्रुवं त्वा पश्यामि ध्रुवैधि पोष्ये मयि। मह्यं
त्वाद्राद् बृहस्पतिर्मया पत्या प्रजावती संजीव शरदः शतम्३ ॥
१. (अमुष्य) इस पद के स्थान में पति का नाम षष्ठयन्त और (असौ)
इसके स्थान में वधू का प्रथमान्त नाम जोड़कर बोले।
२. हे वरानने ! जैसे (द्यौः) सूर्य की कान्ति वा विद्युत् (ध्रुवा) सूर्यलोक
वा पृथिव्यादि में निश्चल, जैसे (पृथिवी) भूमि अपने स्वरूप
में (ध्रुवा) स्थिर, जैसे (इदम्) यह (विश्वम्) सब (जगत्)
संसार प्रवाहस्वरूप में (ध्रुवम्) स्थिर है, जैसे (इमे) ये प्रत्यक्ष
(पर्वताः) पहाड़ (ध्रुवासः) अपनी स्थिति में स्थिर हैं, वैसे (इयम्)
यह तू मेरी (स्त्री) (पतिकुले) मेरे कुल में (ध्रुवा) सदा स्थिर
रह ॥
३. हे स्वामिन् ! जैसे आप मेरे समीप (ध्रुवम्) दृढ़ संकल्प करके
स्थिर (असि) हैं या जैसे मैं (त्वा) आपको (ध्रुवम्) स्थिर दृढ़
(पश्यामि) देखती हूँ वैसे ही सदा के लिए मेरे साथ आप दृढ़
रहिएगा, क्योंकि मेरे मन के अनुकूल (त्वा) आपको (बृहस्पतिः)
परमात्मा (अदात्) समर्पित कर चुका है, वैसे मुझ पत्नी के साथ
उत्तम प्रजायुक्त होके (शतं शरदः) सौ वर्षपर्यन्त (सम् जीव)
जीविये तथा हे वरानने पत्नी ! (पोष्ये) धारण और पालन करने
योग्य (मयि) मुझ पति के निकट (ध्रुवा) स्थिर (एधि) रह,
(मह्यम्) मुझको अपनी मनसा के अनुकूल तुझे परमात्मा ने दिया
है, तू (मया) मुझ (पत्या) पति के साथ (प्रजावती) बहुत उत्तम
प्रजायुक्त होकर सौ वर्ष पर्यन्त आनन्दपूर्वक जीवन धारण कर।
वधू-वर ऐसी दृढ़ प्रतिज्ञा करें कि जिससे कभी उलटे विरोध में
न चलें ॥

विवाहप्रकरणम् १७९
इन दोनों मन्त्रों को बोले।
पश्चात् वधू और वर दोनों यज्ञकुण्ड के पश्चिम भाग में
पूर्वाभिमुख होके कुण्ड के समीप बैठें और पृष्ठ २९ में लिखे
प्रमाणे (ओम् अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा) इत्यादि तीन मन्त्रों
से एक-एक से एक-एक आचमन करके तीन-तीन आचमन
दोनों करें। पश्चात् पृष्ठ २३ में लिखी हुई समिधाओं से यज्ञकुण्ड
में अग्नि को प्रदीप्त करके, पृष्ठ २४ में लिखे प्रमाणे घृत और
स्थालीपाक, अर्थात् भात को उसी समय बनावें। पृष्ठ ३१ में
लिखे प्रमाण (ओम् अयन्त इध्म०) इत्यादि चार मन्त्रों से
समिधा-होम दोनों जने करके, पश्चात् पृष्ठ ३२-३३ में लिखे
प्रमाणे आधारावाज्यभागाहुति चार और पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे
व्याहृति आहुति चार, दोनों मिलके आठ आज्याहुति वर-वधू
देवें।
तत्पश्चात् जो ऊपर सिद्ध किया हुआ ओदन, अर्थात् भात
है, उसे एक पात्र में निकालके उसके ऊपर स्रुवा से घृत सेचन
करके, घृत और भात को अच्छे प्रकार मिलाकर दक्षिण हाथ
से थोड़ा-थोड़ा भात दोनों जने लेके—
ओम् अग्नये स्वाहा ॥ इदमग्नये—इदन्न मम ॥
ओं प्रजापतये स्वाहा ॥ इदं प्रजापतये—इदन्न मम ॥
ओं विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा ॥
इदं विश्वेभ्यो देवेभ्यः—इदन्न मम ॥
ओम् अनुमतये स्वाहा ॥ इदमनुमतये—इदन्नमम ॥
इनमें से प्रत्येक मन्त्र से एक-एक करके चार स्थालीपाक,
अर्थात् भात की आहुति देनी। तत्पश्चात् पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे
(ओं यदस्य कर्मणो०) इस मन्त्र से एक स्विष्टकृत् आहुति देनी।
तत्पश्चात् पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे व्याहृति आहुति चार और
पृष्ठ ३४-३५ में लिखे प्रमाणे अष्टाज्याहुति आठ, दोनों मिलके

१८० संस्कारविधिः
बारह आज्याहुति देनी।
तत्पश्चात् शेष रहा हुआ भात एक पात्र में निकालके उसपर
घृत-सेचन और दक्षिण हाथ रखके—
ओम् अन्नपाशेन मणिना प्राणसूत्रेण पृश्निना।
बध्नामि सत्यग्रन्थिना मनश्च हृदयं च ते१ ॥१॥
ओम् यदेतद्धृदयं तव तदस्तु हृदयं मम।
यदिदँ हृदयं मम तदस्तु हृदयं तव२ ॥२॥
ओम् अन्नं प्राणस्य षङ्गिँशस्तेन बध्नामि त्वा असौ३ ॥३॥
इन तीनों मन्त्रों को मन से जपके वर उस भात में से
प्रथम थोड़ा-सा भक्षण करके, जो उच्छिष्ट=शेष भात रहे वह
अपनी वधू के लिए खाने को देवे और जब वधू उसे खा चुके,
तब वधू-वर यज्ञमण्डप में सन्नद्ध हुए शुभासन पर नियम प्रमाणे
पूर्वाभिमुख बैठें और पृष्ठ ३६-३७ में लिखे प्रमाणे सामवेदोक्त
१. हे वधू वा वर! जैसे अन्न के साथ प्राण, प्राण के साथ अन्न तथा
अन्न और प्राण का अन्तरिक्ष के साथ सम्बन्ध है, वैसे (ते) तेरे
(हृदयम्) हृदय (च) और (मनः) मन (च) और चित्त आदि
को (सत्यग्रन्थिना) सत्यता की गाँठ से (बध्नामि) बाँधती वा
बाँधता हूँ॥१॥
२. हे वर! हे स्वामिन् वा हे पत्नी! (यदेतत्) जो यह (तव) तेरा
(हृदयम्) आत्मा वा अन्तःकरण है (तत्) वह (मम) मेरा
(हृदयम्) आत्मा अन्तःकरण के तुल्य प्रिय (अस्तु) हो, और
(मम) मेरा (यदिदम्) जो यह (हृदयम्) आत्मा, प्राण और मन
है (तत्) सो (तव) तेरे (हृदयम्) आत्मादि के तुल्य प्रिय (अस्तु)
सदा रहे॥२॥
३. (असौ) हे यशोदे! जो (प्राणस्य) प्राण का पोषण करनेहारा
(षड्विंशः) छब्बीसवाँ तत्त्व (अन्नम्) अन्न है (तेन) उससे (त्वा)
तुझको (बध्नामि) दृढ़ प्रीति से बाँधता वा बाँधती हूँ॥३॥

विवाहप्रकरणम् १८१
महावामदेव्यगान करें।
तत्पश्चात् पृष्ठ ९-२१ में लिखे प्रमाणे ईश्वर की
स्तुतिप्रार्थनोपासना, स्वस्तिवाचन, शान्तिकरण कर्म करके क्षार-
लवणरहित मिष्ट, दुग्ध, घृतादिसहित भोजन करें।
तत्पश्चात् पृष्ठ ३६, ३७ में लिखे प्रमाणे पुरोहितादि सद्धर्मी
और कार्यार्थ इकट्ठे हुए लोगों को सन्मानार्थ उत्तम भोजन कराना।
तत्पश्चात् पुरुषों का पुरुष और स्त्रियों का स्त्री यथायोग्य
आदर-सत्कार करके उन्हें विदा कर देवें।
तत्पश्चात् दश घटिका रात्रि जाए, तब वधू और वर पृथक्-
पृथक् स्थान में भूमि में बिछौना करके तीन रात्रिपर्यन्त ब्रह्मचर्य-
व्रतसहित रहकर शयन करें और ऐसा भोजन करें कि स्वप्न
में भी वीर्यपात न होवे। तत्पश्चात् चौथे दिवस विधिपूर्वक
गर्भाधानसंस्कार करें। यदि चौथे दिवस कोई अड़चन आवे तो
अधिक दिन ब्रह्मचर्यव्रत में दृढ़ रहकर जिस दिन दोनों की
इच्छा हो और पृष्ठ ४१-४२ में लिखे प्रमाणे गर्भाधान की रात्रि
भी हो, उस रात्रि में यथाविधि गर्भाधान करें।
तत्पश्चात् दूसरे वा तीसरे दिन प्रातःकाल वर पक्षवाले
लोग वधू और वर को रथ में बैठाके बड़े सन्मान से अपने
घर में लावें और जो वधू अपने माता-पिता के घर को छोड़ते
समय आँख में अश्रु भर लावे तो—
जी॒वं रु॑दन्ति॒ वि म॑यन्ते अध्व॒रे दी॒र्घामनु॒ प्रसि॑तिं दीधियुर्नर॑: ।
वा॒मं पि॒तृभ्यो॒ य इदं समे॑रि॒रे मय॑: पति॑भ्यो॒ जन॑यः परि॒ष्वजे॑ ॥
इस मन्त्र को वर बोले और रथ में बैठते समय वर अपने
साथ दक्षिण बाजू वधू को बैठावे। उस समय वर—
पू॒षा त्वे॒तो न॑यतु॒ हस्त॒गृह्या॒श्विना॑ त्वा॒ प्र व॑हतां॒ रथे॑न ।
गृ॒हान्ग॑च्छ गृ॒हप॑त्नी॒ यथासो॑ व॒शिनी॒ त्वं वि॒दथ॑मा व॑दासि ॥ १ ॥

१८२ संस्कारविधिः
सु॒किं॒शुकं॑ शल्म॒लिं वि॒श्वरू॑पं॒ हिर॑ण्यवर्णं॒ सु॒वृतं॑
सु॒च॒क्रम॑। आ रो॑ह सूर्ये अ॒मृत॑स्य लो॒कं स्योनं॒ पत्ये॑ वह॒तुं
कृ॑णुष्व॥२॥
इन दो मन्त्रों को बोलके रथ को चलावे।
यदि वधू को वहाँ से अपने घर लाने के समय नौका
पर बैठना पड़े तो इस निम्नलिखित मन्त्र को पूर्व बोलके नौका
पर बैठें—
अश्म॑न्वती रीयते॒ सं र॑भध्व॒मुत्ति॑ष्ठत् प्र त॑रता सखायः।
और नाव से उतरते समय—
अत्रा॑ जहाम॒ ये अस॒न्नशे॑वाः शिवा॒न्व्यय॒मुत्त॑रेमा॒भि वाजा॑न्॥
इस उत्तरार्द्ध मन्त्र को बोलके नाव से उतरें।
पुनः इसी प्रकार मार्ग में चार मार्गों का संयोग, नदी, व्याघ्र,
चोर आदि से भय या भयङ्कर स्थान, ऊँचे-नीचे खाढ़ावाली
पृथिवी, बड़े-बड़े वृक्षों का झुण्ड या श्मशानभूमि आवे तो—
मा वि॑दन् परिप॒न्थिनो॒ य आ॒सीद॑न्ति दम्पती।
सु॒गेभि॑र्दुर्गमती॒तामप॑ द्रा॒न्त्वरा॑तयः॥
इस मन्त्र को बोले।
तत्पश्चात् वधू-वर जिस रथ में बैठके जाते हों, उस रथ
का कोई अङ्ग टूट जाए, अथवा किसी प्रकार का अकस्मात्
उपद्रव होवे, तो मार्ग में कोई अच्छा स्थान देखके निवास करना
और साथ रक्खे हुए विवाहाग्नि को प्रगट करके उसमें पृष्ठ ३३
में लिखे प्रमाणे चार व्याहृति आज्याहुति देनी। पश्चात् पृष्ठ ३६-
३७ में लिखे प्रमाणे महावामदेव्यगान करना।
पश्चात् जब वधू-वर का रथ वर के घर के आगे आ
पहुँचे, तब कुलीन, पुत्रवती, सौभाग्यवती, या कोई ब्राह्मणी,