संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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१६८ संस्कारविधिः
इन्द्राग्नी॒ द्यावा॑पृथि॒वी मा॑त॒रिश्वॉ मि॒त्रावरु॑णा॒ भगो॑ अ॒श्विनो॒भा।
बृह॒स्पति॒र्म॒रुतो॒ ब्रह्म॒ सोम॑ इ॒मां नारीं॒ प्रजया॑ वर्धयन्तु॑ ॥५॥
अ॒हं वि॒ष्यामि॒ मयि॑ रू॒पम॑स्या॒ वेद॑दित् पश्य॒न्मन॑सः कुला॒यम्। न
स्ते॒यम॒द्भि म॒नसोद॑मुच्ये स्व॒यं श्र॑थ्नानो वरु॑णस्य॒ पाशा॑न् ᳒ ॥६॥
करके (प्रजया) ऐश्वर्य, वस्त्राभूषण आदि से सदा आनन्दित रक्खूँगी ॥४॥
- हे मेरे सम्बन्धी लोगो ! जैसे (इन्द्राग्नी) बिजली और प्रसिद्ध अग्नि
(द्यावापृथिवी) सूर्य और भूमि (मातरिश्वॉ) अन्तरिक्षस्थ वायु
(मित्रावरुणा) प्राण और उदान तथा (भगः) ऐश्वर्य (अश्विना)
सद्वैद्य और सत्योपदेशक (उभा) दोनों (बृहस्पतिः) श्रेष्ठ, न्यायकारी,
बड़ी प्रजा का पालन करनेहारा राजा (मरुतः) सभ्य मनुष्य, (ब्रह्म)
सबसे बड़ा परमात्मा और (सोमः) चन्द्रमा तथा सोमलतादि
ओषधिगण सब प्रजा की वृद्धि और पालन करते हैं, वैसे (इमां,
नारीम्) इस मेरी स्त्री को (प्रजया) प्रजा से बढ़ाया करते हैं, वैसे
तुम भी (वर्धयन्तु) बढ़ाया करो। जैसे मैं इस स्त्री को प्रजा आदि
से सदा बढ़ाया करूँगा, वैसे स्त्री भी प्रतिज्ञा करे कि मैं भी इस
मेरे पति को सदा आनन्द, ऐश्वर्य और प्रजा से बढ़ाया करूँगी।
जैसे ये दोनों मिलके प्रजा को बढ़ाया करते हैं, वैसे तू और मैं
मिलके गृहाश्रम के अभ्युदय को बढ़ाया करें॥५॥
० हे कल्याणक्रोडे! जैसे (मनसः) मन से (कुलायम्) कुल की
वृद्धि को (पश्यन्) देखता हुआ (अहम्) मैं (अस्याः) इस तेरे
(रूपम्) रूप को (विष्यामि) प्रीति से प्राप्त और इसमें प्रेम द्वारा
व्याप्त होता हूँ, वैसे यह तू मेरी वधू (मयि) मुझमें प्रेम से व्याप्त
होके अनुकूल व्यवहार को (वेदत्) प्राप्त होवे। जैसे मैं (मनसा)
मन से भी इस तुझ वधू के साथ (स्तेयम्) चोरी को (उदमुच्ये)