सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 170, कुल 318 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 170

१६६ संस्कारविधिः
ओं गृ॒भ्णामि॑ ते सौभग॒त्वाय॒ हस्तं॒ मया॒ पत्या॑
ज॒रद॑ष्टि॒र्यथास॑ः । भगो॑ अ॒र्य॒मा स॑वि॒ता पुर॑न्धि॒र्मह्यं॑
त्वादु॒र्गार्ह॑पत्याय दे॒वाः * ॥ १ ॥
ओं भग॑स्ते॒ हस्त॑मग्रभीत् सवि॒ता हस्त॑मग्रभीत् ।
पत्नी॒ त्वम॑सि॒ धर्म॑णा॒हं गृ॒हप॑ति॒स्तव॑** ॥ २ ॥

  • हे वरानने ! जैसे मैं (सौभगत्वाय) ऐश्वर्य, सुसन्तानादि सौभाग्य
    की बढ़ती के लिए (ते) तेरे (हस्तम्) हाथ को (गृभ्णामि) ग्रहण
    करता हूँ, तू (मया) मुझ (पत्या) पति के साथ (जरदष्टिः)
    जरावस्था को प्राप्त सुखपूर्वक (आसः) हो, तथा हे वीर ! मैं सौभाग्य
    की वृद्धि के लिए आपके हस्त को ग्रहण करती हूँ। आप मुझ
    पत्नी के साथ वृद्धावस्था पर्यन्त प्रसन्न और अनुकूल रहिये। आपको
    मैं और मुझको आप आज से पति-पत्नी भाव करके प्राप्त हुए
    हैं। (भगः) सकल ऐश्वर्ययुक्त (अर्यमा) न्यायकारी (सविता)
    सब जगत् की उत्पत्ति का कर्त्ता (पुरन्धिः) बहुत प्रकार के जगत्
    का धर्त्ता परमात्मा और (देवाः) ये सब सभामण्डप में बैठे हुए
    विद्वान् लोग (गार्हपत्याय) गृहाश्रमकर्म के अनुष्ठान के लिए (त्वा)
    तुझको (मह्यम्) मुझे (अदुः) देते हैं। आज से मैं आपके हस्ते
    और आप मेरे हाथ बिक चुके हैं, कभी एक-दूसरे का अप्रियाचरण
    न करेंगे ॥ १ ॥
    ** हे प्रिये ! (भगः) ऐश्वर्ययुक्त मैं (ते) तेरे (हस्तम्) हाथ को
    (अग्रभीत्) ग्रहण करता हूँ तथा (सविता) धर्मयुक्त मार्ग में प्रेरक
    मैं तेरे (हस्तम्) हाथ को (अग्रभीत्) ग्रहण कर चुका हूँ, (त्वम्)
    तू (धर्मणा) धर्म से मेरी (पत्नी) भार्या (असि) है और (अहम्)
    मैं धर्म से (तव) तेरा (गृहपतिः) गृहपति हूँ। अपने दोनों मिलके
    घर के कामों की सिद्धि करें, और जो दोनों का अप्रियाचरण
    व्यभिचार है, उसको कभी न करें, जिससे घर के सब काम सिद्ध,
    उत्तम सन्तान, ऐश्वर्य और सुख की बढ़ती सदा होती रहे ॥ २ ॥