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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 182, कुल 318 में से

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पृष्ठ 182

१७८ संस्कारविधिः
ओम् अरुन्धत्यसि रुद्धाहमस्मि (अमुष्य१ असौ) ॥
इस मन्त्र को बोलके वर वधू की ओर देखके वधू के
मस्तक पर हाथ धरके-
ओं ध्रुवा द्यौर्ध्रुवा पृथिवी ध्रुवं विश्वमिदं जगत्।
ध्रुवासः पर्वता इमे ध्रुवा स्त्री पतिकुले इयम्२ ॥
ओं ध्रुवमसि ध्रुवं त्वा पश्यामि ध्रुवैधि पोष्ये मयि। मह्यं
त्वाद्राद् बृहस्पतिर्मया पत्या प्रजावती संजीव शरदः शतम्३ ॥
१. (अमुष्य) इस पद के स्थान में पति का नाम षष्ठयन्त और (असौ)
इसके स्थान में वधू का प्रथमान्त नाम जोड़कर बोले।
२. हे वरानने ! जैसे (द्यौः) सूर्य की कान्ति वा विद्युत् (ध्रुवा) सूर्यलोक
वा पृथिव्यादि में निश्चल, जैसे (पृथिवी) भूमि अपने स्वरूप
में (ध्रुवा) स्थिर, जैसे (इदम्) यह (विश्वम्) सब (जगत्)
संसार प्रवाहस्वरूप में (ध्रुवम्) स्थिर है, जैसे (इमे) ये प्रत्यक्ष
(पर्वताः) पहाड़ (ध्रुवासः) अपनी स्थिति में स्थिर हैं, वैसे (इयम्)
यह तू मेरी (स्त्री) (पतिकुले) मेरे कुल में (ध्रुवा) सदा स्थिर
रह ॥
३. हे स्वामिन् ! जैसे आप मेरे समीप (ध्रुवम्) दृढ़ संकल्प करके
स्थिर (असि) हैं या जैसे मैं (त्वा) आपको (ध्रुवम्) स्थिर दृढ़
(पश्यामि) देखती हूँ वैसे ही सदा के लिए मेरे साथ आप दृढ़
रहिएगा, क्योंकि मेरे मन के अनुकूल (त्वा) आपको (बृहस्पतिः)
परमात्मा (अदात्) समर्पित कर चुका है, वैसे मुझ पत्नी के साथ
उत्तम प्रजायुक्त होके (शतं शरदः) सौ वर्षपर्यन्त (सम् जीव)
जीविये तथा हे वरानने पत्नी ! (पोष्ये) धारण और पालन करने
योग्य (मयि) मुझ पति के निकट (ध्रुवा) स्थिर (एधि) रह,
(मह्यम्) मुझको अपनी मनसा के अनुकूल तुझे परमात्मा ने दिया
है, तू (मया) मुझ (पत्या) पति के साथ (प्रजावती) बहुत उत्तम
प्रजायुक्त होकर सौ वर्ष पर्यन्त आनन्दपूर्वक जीवन धारण कर।
वधू-वर ऐसी दृढ़ प्रतिज्ञा करें कि जिससे कभी उलटे विरोध में
न चलें ॥