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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 171, कुल 318 में से

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पृष्ठ 171

विवाहप्रकरणम् १६७
ममे॒यम॑स्तु पोष्या॒ मह्यं॑ त्वादा॒द् बृह॒स्पति॑:।
मया॒ पत्या॑ प्र॒जाव॑ति॒ सं जीव श॒रद॑: श॒तम्* ॥ ३ ॥
त्वष्टा॒ वासो॒ व्य॑दधाच्छु॒भे कं बृहस्पते॑: प्र॒शिषा॑ क॒वीनाम्।
तेने॒मां नारीं॑ सवि॒ता भग॑श्च॒ सूर्यामि॑व॒ परि॑ धत्तां प्र॒जया॑¶ ॥ ४ ॥

  • हे अनघे! (बृहस्पति:) सब जगत् का पालन करनेहारे परमात्मा
    ने जिस (त्वा) तुझको (मह्यम्) मुझे (अदात्) दिया है (इयम्)
    यही तू जगत्भर में मेरी (पोष्या) पोषण करने योग्य पत्नी (अस्तु)
    हो, हे (प्रजावति) तू (मया पत्या) मुझ पति के साथ (शतम्)
    सौ (शरद:) शरद् ऋतु अर्थात् शतवर्ष पर्यन्त (शं जीव) सुखपूर्वक
    जीवन धारण कर। वैसी ही वधू भी वर से प्रतिज्ञा करावे—हे
    भद्रवीर! परमेश्वर की कृपा से आप मुझे प्राप्त हुए हो, मेरे लिए
    आपके बिना इस जगत् में दूसरा पति अर्थात् स्वामी पालन करनेहारा
    सेव्य, इष्टदेव कोई नहीं है, न मैं आपसे अन्य दूसरे किसी को
    मानूँगी, जैसे आप मेरे सिवाय दूसरी स्त्री से प्रीति न करोगे, वैसे
    मैं भी किसी दूसरे पुरुष के साथ प्रीतिभाव से न वर्त्ता करूँगी।
    आप मेरे साथ सौ वर्ष पर्यन्त आनन्द से प्राण धारण कीजिए॥ ३ ॥
    हे शुभानने! जैसे (बृहस्पते:) इस परमात्मा की सृष्टि में और उसकी
    तथा (कवीनाम्) आप्त विद्वानों की (प्रशिषा) शिक्षा से दम्पती
    होते हैं, (त्वष्टा) जैसे बिजली सबको व्यास हो रही है, वैसे तू
    मेरी प्रसन्नता के लिए (वास:) सुन्दर वस्त्र (शुभे) और आभूषण
    तथा (कम्) मुझसे सुख को प्राप्त हो, इस मेरी और तेरी इच्छा
    को परमात्मा (व्यदधात्) सिद्ध करे। जैसे (सविता) सकल जगत्
    की उत्पत्ति करनेहारा परमात्मा (च) और (भग:) पूर्ण ऐश्वर्ययुक्त
    (प्रजया) उत्तम प्रजा से (इमाम्) इस तुझ (नारीम्) मुझ नर
    की स्त्री को (परिधत्ताम्) आच्छादित, शोभायुक्त करे, वैसे मैं (तेन)
    इस सबसे (सूर्याम् इव) सूर्य की किरण के समान तुझको वस्त्र
    और भूषणादि से सुशोभित सदा रक्खूँगा। तथा हे प्रिय! आपको
    मैं इसी प्रकार सूर्य के समान सुशोभित आनन्द अनुकूल प्रियाचरण