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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

13
अथ विवाहसंस्कारविधिं वक्ष्यामः
'विवाह' उसे कहते हैं कि जो पूर्ण ब्रह्मचर्यव्रत द्वारा विद्या-
बल को प्राप्त तथा सब प्रकार से शुभ गुण-कर्म-स्वभावों में
तुल्य, परस्पर प्रीतियुक्त होके निम्नलिखित प्रमाणे सन्तानोत्पत्ति
और अपने-अपने वर्णाश्रम के अनुकूल उत्तम कर्म करने के
लिए स्त्री और पुरुष का सम्बन्ध होता है। इसमें प्रमाण—
उदगयन आपूर्यमाणपक्षे पुण्ये नक्षत्रे* चौलकर्मोपनयन-
गोदानविवाहाः ॥ १ ॥
सार्वकालमेके विवाहम् ॥ २ ॥
—यह आश्वलायनगृह्यसूत्र और—
आवसथ्याधानं दारकाले ॥ ३ ॥ इत्यादि पारस्कर और—
पुण्ये नक्षत्रे दारान् कुर्वीत ॥ ४ ॥
लक्षणप्रशस्तान् कुशलेन ॥ ५ ॥ इत्यादि गोभिलीयगृह्यसूत्र
और इसी प्रकार शौनकगृह्यसूत्र में भी है॥
अर्थः—उत्तरायण शुक्लपक्ष अच्छे दिन अर्थात् जिस दिन
प्रसन्नता हो, उस दिन विवाह करना चाहिए ॥ १ ॥
और कितने ही आचार्यों का ऐसा मत है कि सब काल
में विवाह करना चाहिए ॥ २ ॥
जिस अग्नि का स्थापन विवाह में होता है, उसका
'आवसथ्य' नाम है ॥ ३ ॥
प्रसन्नता के दिन सर्वथा शुभ गुणादि से उत्तम जो स्त्री
हो, उससे पाणिग्रहण करना चाहिए ॥ ४-५ ॥
* यह नक्षत्रादि का विचार कल्पनायुक्त है, इससे प्रमाण नहीं।

१३६ संस्कारविधिः
इसका समय-पृष्ठ ११२-११५ तक में लिखे प्रमाणे
जानना चाहिए। वधू और वर की आयु, कुल, वास्तव्य स्थान,
शरीर और स्वभाव की परीक्षा अवश्य करें, अर्थात् दोनों संज्ञान
और विवाह की इच्छा करनेवाले हों। स्त्री की आयु से वर
की आयु न्यून-से-न्यून ड्योढ़ी और अधिक-से-अधिक दूनी
होवे। परस्पर कुल की परीक्षा भी करनी चाहिए। इसमें प्रमाण-
वेदानधीत्य वेदौ वा वेदं वापि यथाक्रमम्।
अविप्लुतब्रह्मचर्यो गृहस्थाश्रममाविशेत् ॥ १ ॥
गुरुणानुमतः स्नात्वा समावृत्तो यथाविधि ।
उद्वहेत द्विजो भार्यां सवर्णां लक्षणान्विताम् ॥ २ ॥
असपिण्डा च या मातुरसगोत्रा च या पितुः ।
सा प्रशस्ता द्विजातीनां दारकर्मणि मैथुने ॥ ३ ॥
महान्त्यपि समृद्धानि गोऽजाविधनधान्यतः ।
स्त्रीसम्बन्धे दशैतानि कुलानि परिवर्जयेत् ॥ ४ ॥
हीनक्रियं निष्पुरुषं निश्छन्दो रोमशार्शसम्।
क्षय्यामयाव्यपस्मारिश्वित्रिकुष्ठिकुलानि च ॥ ५ ॥
नोद्वहेत्कपिलां कन्यां नाधिकाङ्गीं न रोगिणीम् ।
नालोमिकां नातिलोमां न वाचाटां न पिङ्गलाम् ॥ ६ ॥
नर्क्षवृक्षनदीनाम्नीं नान्त्यपर्वतनामिकाम् ।
न पक्ष्यहिप्रेष्यनाम्नीं न च भीषणनामिकाम् ॥ ७ ॥
अव्यङ्गाङ्गीं सौम्यनाम्नीं हंसवारणगामिनीम् ।
तनुलोमकेशदशनां मृद्वङ्गीमुद्वहेत् स्त्रियम् ॥ ८ ॥
ब्राह्मो दैवस्तथैवार्षः प्राजापत्यस्तथासुरः ।
गान्धर्वो राक्षसश्चैव पैशाचश्चाष्टमोऽधमः ॥ ९ ॥

विवाहप्रकरणम् १३७
आच्छाद्य चार्चयित्वा च श्रुतिशीलवते स्वयम्।
आहूय दानं कन्याया ब्राह्मो धर्मः प्रकीर्तितः ॥ १० ॥
यज्ञे तु वितते सम्यगृत्विजे कर्म कुर्वते।
अलङ्कृत्य सुतादानं दैवं धर्मं प्रचक्षते ॥ ११ ॥
एकं गोमिथुनं द्वे वा वरादादाय धर्मतः।
कन्याप्रदानं विधिवदार्षो धर्मः स उच्यते ॥ १२॥
सह नौ चरतां धर्ममिति वाचानुभाष्य च।
कन्याप्रदानमभ्यर्च्य प्राजापत्यो विधिः स्मृतः ॥ १३ ॥
ज्ञातिभ्यो द्रविणं दत्त्वा कन्यायै चैव शक्तितः।
कन्याप्रदानं विधिवदासुरो धर्म उच्यते ॥ १४ ॥
इच्छयाऽन्योन्यसंयोगः कन्यायाश्च वरस्य च।
गान्धर्वः स तु विज्ञेयो मैथुन्यः कामसम्भवः ॥ १५ ॥
हत्वा छित्त्वा च भित्त्वा च क्रोशन्तीं रुदतीं गृहात्।
प्रसह्य कन्याहरणं राक्षसो विधिरुच्यते ॥ १६ ॥
सुप्तां मत्तां प्रमत्तां वा रहो यत्रोपगच्छति।
स पापिष्ठो विवाहानां पैशाचश्चाष्टमोऽधमः ॥ १७ ॥
ब्राह्मादिषु विवाहेषु चतुर्ष्वेवानुपूर्वशः।
ब्रह्मवर्चस्विनः पुत्रा जायन्ते शिष्टसंमताः ॥ १८ ॥
रूपसत्त्वगुणोपेता धनवन्तो यशस्विनः।
पर्याप्तभोगा धर्मिष्ठा जीवन्ति च शतं समाः ॥ १९ ॥
इतरेषु तु शिष्टेषु नृशंसानृतवादिनः।
जायन्ते दुर्विवाहेषु ब्रह्मधर्मद्विषः सुताः ॥ २० ॥
अनिन्दितैः स्त्रीविवाहैरनिन्द्या भवति प्रजा।
निन्दितैर्निन्दिता नृणां तस्मान्निन्द्यान् विवर्जयेत् ॥ २१ ॥

१३८ संस्कारविधिः
अर्थ—ब्रह्मचर्य से चार, तीन, दो अथवा एक वेद को
यथावत् पढ़, अखण्डित ब्रह्मचर्य का पालन करके गृहाश्रम का
धारण करे ॥ १ ॥
यथावत् उत्तम रीति से ब्रह्मचर्य और विद्या को ग्रहण कर,
गुरु की आज्ञा से स्नान करके ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य अपने
वर्ण की उत्तम लक्षणयुक्त स्त्री से विवाह करे ॥ २ ॥
जो स्त्री माता की छह पीढ़ी और पिता के गोत्र की न
हो, वही द्विजों के लिए विवाह करने में उत्तम है ॥ ३ ॥
विवाह में नीचे लिखे हुए दश कुल, चाहे वे गाय आदि
पशु, धन और धान्य से कितने ही बड़े हों, उन कुलों की कन्या
के साथ विवाह न करे ॥ ४ ॥
वे दश कुल ये हैं। एक—जिस कुल में उत्तम क्रिया न
हों। दूसरा—जिस कुल में कोई भी उत्तम पुरुष न हो।
तीसरा—जिस कुल में कोई विद्वान् न हो। चौथा—जिस कुल
में शरीर के ऊपर बड़े-बड़े लोम हों। पाँचवाँ—जिस कुल में
बवासीर हो। छठा—जिस कुल में क्षयी (राज्यक्ष्मा) रोग हो।
सातवाँ—जिस कुल में अग्निमन्दता से आमाशय रोग हो।
आठवाँ—जिस कुल में मृगी रोग हो। नववाँ—जिस कुल में
श्वेतकुष्ठ हो और दसवाँ—जिस कुल में गलितकुष्ठ आदि रोग
हों—उन कुलों की कन्या अथवा उन कुलों के पुरुषों से विवाह
कभी न करे ॥ ५ ॥
पीले वर्णवाली, अधिक अङ्गवाली जैसी छंगुली आदि,
रोगवती, जिसके शरीर पर कुछ भी लोम न हों और जिसके
शरीर पर बड़े-बड़े लोम हों, व्यर्थ अधिक बोलनेवाली और
जिसके पीले बिल्ली के सदृश नेत्र हों ॥ ६ ॥
तथा जिस कन्या का (ऋक्ष) नक्षत्र पर नाम अर्थात् रेवती,
रोहिणी इत्यादि, (वृक्ष) चम्पा, चमेली आदि, (नदी) जिसका
गङ्गा, यमुना इत्यादि, (अन्त्य) चाण्डाली आदि, (पर्वत)
जिसका विन्ध्याचला इत्यादि, (पक्षी) पक्षी पर, अर्थात् कोकिला,

विवाहप्रकरणम् १३९
हंसा इत्यादि, (अहि), अर्थात् उरगा, भोगिनी इत्यादि, (प्रेष्य)
दासी इत्यादि और जिस कन्या का (भीषण) कालिका, चण्डिका
इत्यादि नाम हो, उससे विवाह न करे॥७॥
किन्तु जिसके सुन्दर अङ्ग, उत्तम नाम, हंस और हस्तिनी
के सदृश चालवाली, जिसके सूक्ष्म लोम, सूक्ष्म केश और सूक्ष्म
दाँत हों, जिसके सब अङ्ग कोमल हों, उस स्त्री से विवाह
करे॥८॥
ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस और
पैशाच, ये आठ प्रकार के विवाह होते हैं॥९॥
पहला- ब्राह्म- कन्या के योग्य सुशील, विद्वान् पुरुष
का सत्कार करके कन्या को वस्त्रादि से अलंकृत करके, उत्तम
पुरुष को बुला, अर्थात् जिसको कन्या ने भी पसन्द किया हो,
उसको देना, वह 'ब्राह्म' विवाह कहाता है॥१०॥
दूसरा-विस्तृत यज्ञ में बड़े-बड़े विद्वानों का वरण कर,
उसमें कर्म करानेवाले विद्वान् को वस्त्र-आभूषण आदि से कन्या
को सुशोभित करके देना, वह 'दैव' विवाह है॥११॥
तीसरा- एक गाय, बैल का जोड़ा अथवा दो जोड़े* वर
से लेके धर्मपूर्वक कन्यादान करना, वह 'आर्ष' विवाह है॥१२॥
चौथा-कन्या और वर को यज्ञशाला में विधि करके
सबके सामने तुम दोनों मिलके गृहाश्रम के कर्मों को यथावत्
करो, ऐसा कहकर दोनों की प्रसन्नतापूर्वक पाणिग्रहण होना,
वह 'प्राजापत्य' विवाह कहाता है। ये चार विवाह उत्तम
हैं॥१३॥
पाँचवाँ-वर की जातिवालों और कन्या को यथाशक्ति
धन देकर होम आदि विधि कर कन्या देना, 'आसुर' विवाह

  • यह बात मिथ्या है, क्योंकि आगे मनुस्मृति में निषेध किया है
    और युक्तिविरुद्ध भी है, इसलिए कुछ भी न ले-देकर दोनों की
    प्रसन्नता से पाणिग्रहण होना आर्ष विवाह है।

१४० संस्कारविधिः
कहाता है॥१४॥
छठा—वर और कन्या की इच्छा से दोनों का संयोग होना
और अपने मन में मान लेना कि हम दोनों स्त्री-पुरुष हैं, यह
काम से हुआ ‘गान्धर्व’ विवाह कहाता है॥१५॥
सातवाँ—हनन, छेदन, अर्थात् कन्या के रोकनेवालों का
विदारण कर क्रोशती, रोती, कम्पती और भयभीत हुई कन्या
को बलात्कार हरण करके विवाह करना, वह ‘राक्षस’ विवाह
है॥१६॥
आठवाँ—जो सोती, पागल हुई वा नशा पीकर उन्मत्त
हुई कन्या को एकान्त पाकर दूषित कर देना, यह सब विवाहों
में नीच-से-नीच महानीच, दुष्ट, अतिदुष्ट ‘पैशाच’ विवाह
है॥१७॥
ब्राह्म, दैव, आर्ष और प्राजापत्य इन चार विवाहों में
पाणिग्रहण किये हुए स्त्री-पुरुषों से जो सन्तान उत्पन्न होते हैं,
वे वेदादिविद्या से तेजस्वी, आप्त पुरुषों के सम्मत, अत्युत्तम
होते हैं॥१८॥
वे पुत्र वा कन्या सुन्दर रूप, बल, पराक्रम, शुद्ध बुद्ध्यादि
उत्तम गुणयुक्त, बहु धनयुक्त, पुण्यकीर्तिमान् और पूर्ण भोग के
भोक्ता, अतिशय धर्मात्मा होकर १०० वर्ष तक जीते हैं॥१९॥
इन चार विवाहों से जो बाकी रहे चार आसुर, गान्धर्व,
राक्षस और पैशाच, इन चार दुष्ट विवाहों से उत्पन्न हुए सन्तान
निन्दित कर्मकर्त्ता, मिथ्यावादी, वेदधर्म के द्वेषी, बड़े नीच
स्वभाववाले होते हैं॥२०॥
इसलिए मनुष्यों को योग्य है कि जिन निन्दित विवाहों
से नीच प्रजा होती हैं, उनका त्याग और जिन उत्तम विवाहों
से उत्तम प्रजा होती हैं, उन्हें किया करें॥२१॥
उत्कृष्टायाभिरूपाय वराय सदृशाय च।
अप्राप्तामपि तां तस्मै कन्यां दद्याद् यथाविधिः ॥१॥

विवाहप्रकरणम् १४१
काममाममरणात् तिष्ठेद् गृहे कन्यर्तुमत्यपि।
न चैवैनां प्रयच्छेत्तु गुणहीनाय कर्हिचित्॥२॥
त्रीणि वर्षाण्युदीक्षेत कुमार्यृतुमती सती।
ऊर्ध्वं तु कालादेतस्माद् विन्देत सदृशं पतिम्॥३॥
अर्थ:-यदि माता-पिता कन्या का विवाह करना चाहें
तो अति उत्कृष्ट शुभगुण-कर्म-स्वभाववाले, कन्या के सदृश
रूपलावण्यादि गुणयुक्त वर ही को चाहें वह कन्या माता की
छह पीढ़ी के भीतर भी हो, तथापि उसी को कन्या देना अन्य
को कभी न देना कि जिससे दोनों अति प्रसन्न होकर गृहाश्रम
की उन्नति और उत्तम सन्तानों की उत्पत्ति करें॥१॥
चाहे मरण-पर्यन्त कन्या पिता के घर में बिना विवाह के
बैठी भी रहे, परन्तु गुणहीन असदृश, दुष्ट पुरुष के साथ कन्या
का विवाह कभी न करे और वर-कन्या भी अपने-आप स्वसदृश
के साथ ही विवाह करें॥२॥
जब कन्या विवाह करने की इच्छा करे तब रजस्वला होने
के दिन से तीन वर्ष को छोड़के चौथे वर्ष में विवाह करे॥३॥
प्रश्न- 'अष्टवर्षा भवेद् गौरी नववर्षा च रोहिणी।'
इत्यादि श्लोकों की क्या गति होगी?
उत्तर- इन श्लोकों और इनके माननेवालों की दुर्गति,
अर्थात् जो इन श्लोकों की रीति से बाल्यावस्था में अपने सन्तानों
का विवाह कर-करा, उनको नष्ट-भ्रष्ट, रोगी, अल्पायु करते हैं,
वे अपने कुल का जानो सत्यानाश कर रहे हैं। इसलिए यदि
शीघ्र विवाह करें तो वेदारम्भ में लिखे हुए सोलह वर्ष से न्यून
कन्या और पच्चीस वर्ष से न्यून पुरुष का विवाह कभी न करें-
करावें। इसके आगे जितना अधिक ब्रह्मचर्य रक्खेंगे, उतना ही
उनको आनन्द अधिक होगा।
प्रश्न-विवाह निकटवासियों से अथवा दूरवासियों से

१४२ संस्कारविधिः
करना चाहिए?
उत्तर—'दुहिता दुर्हिता दूरे हिता भवतीति।' यह निरुक्त
का प्रमाण है कि—जितना दूरदेश में विवाह होगा, उतना ही
उन्हें अधिक लाभ होगा।
प्रश्न—अपने गोत्र वा भाई-बहिनों का परस्पर विवाह क्यों
नहीं होता?
उत्तर—एक दोष यह है कि इनके विवाह होने में प्रीति
कभी नहीं होती, क्योंकि जितनी प्रीति परोक्ष पदार्थ में होती
है, उतनी प्रत्यक्ष में नहीं और बाल्यावस्था के गुण-दोष भी
विदित रहते हैं, तथा भयादि भी अधिक नहीं रहते। दूसरा जबतक
दूरस्थ एक-दूसरे कुल के साथ सम्बन्ध नहीं होता, तबतक
शरीर आदि की पुष्टि भी पूर्ण नहीं होती। तीसरा दूर सम्बन्ध
होने से परस्पर प्रीति, उन्नति, ऐश्वर्य बढ़ता है, निकट से नहीं।
युवावस्था ही में विवाह का प्रमाण—
तमस्मेरा॑ यु॒वत॑यो॒ युवा॑नं म॒र्मृज्यमा॑नाः॒ परि॑ यन्त्यापः॑ ।
स शु॒क्रेभिः॒ शिक्व॑भी रे॒वद॒स्मे दी॒दाया॑नि॒ध्मो घृ॒तनि॑र्णिग॒प्सु ॥ १ ॥
अ॒स्मै तिस्रो अ॑व्य॒थ्याय॒ नारी॑र्दे॒वाय॑ दे॒वीर्दि॑धिषन्त्यन्न॑म्।
कृ॒ताइ॑वो॒प हि प्र॑स॒स्रे अ॒प्सु स पी॒यूषं॑ धयति पू॒र्वसूना॑म् ॥ २ ॥
अश्व॒स्यात्र॒ जनि॑मा॒स्य च॒ स्वर्द्द्रुहो॑ रि॒षः सम्पृचः॑ पाहि सू॒रीन्।
आ॒मासु॑ पू॒र्षु प॒रो अप्र॑मृष्यं॒ नारा॑तयो॒ वि न॑श॒न्नानृ॑तानि ॥ ३ ॥
—ऋ० मं० २। सू० ३५। मं० ४-६॥
व॒धूरि॒यं पति॑मि॒च्छन्त्ये॑ति॒ य ईं॒ वहा॑ते महि॒षीमिषि॑राम्।
आ॒स्य श्रव॒स्याद् रथ॒ आ च॑ घो॒षात् पुरु सह॒स्रा परि॑ वर्तयाते ॥ ४ ॥
—ऋ० मं० ५। सू० ३७। मं० ३॥

विवाहप्रकरणम् १४३
उप॑ व॒ एषे॒ वन्द्ये॑भिः शू॒षैः प्र य॒ह्वी दिव॒श्चित॒यद्भि॑र॒र्कैः ।
उ॒षासा॒नक्ता॑ वि॒दुषी॑व॒ विश्व॒मा हा॑ वहतो॒ मर्त्या॑य य॒ज्ञम् ॥ ५ ॥
—ऋ० मं० ५ । सू० ४१ । मं० ७ ॥
अर्थ—जो (मर्मृज्यमानाः) उत्तम ब्रह्मचर्यव्रत और सद्धिद्याओं
से अत्यन्त युक्त (युवतयः) बीसवें वर्ष से चौबीसवें वर्षवाली
हैं, वे कन्याएँ जैसे (आपः) जल वा नदी समुद्र को प्राप्त होती
हैं, वैसे (अस्मेराः) हमें प्राप्त होनेवाली, अपनी-अपनी पसन्द,
अपने-अपने से ड्योढ़े वा दूने आयुवाले, (तम्) उस ब्रह्मचर्य
और विद्या से परिपूर्ण, शुभ लक्षणयुक्त (युवानम्) जवान पति
को (परियन्ति) अच्छे प्रकार प्राप्त होती हैं। (सः) वह ब्रह्मचारी
(शुक्रेभिः) शुद्ध गुण और (शिक्वभिः) वीर्यादि से युक्त होके
(अस्मे) हमारे मध्य में (रेवत्) अत्यन्त श्रीयुक्त कर्म को और
(दीदाय) अपने तुल्य युवती स्त्री को प्राप्त होवे। जैसे (अप्सु)
अन्तरिक्ष वा समुद्र में (घृतनिर्णिक्) जल को शोधन करनेहारा
(अनिध्मः) आप प्रकाशित विद्युत् अग्नि है,
इसी प्रकार स्त्री और पुरुष के हृदय में प्रेम बाहर
अप्रकाशमान, भीतर सुप्रकाशित रहकर उत्तम सन्तान और
अत्यन्त आनन्द को गृहाश्रम में दोनों स्त्री-पुरुष प्राप्त होवें ॥ १ ॥
हे स्त्री-पुरुषो! जैसे (तिस्रः) उत्तम, मध्यम तथा निकृष्ट
स्वभावयुक्त, (देवीः नारीः) विद्वान् नरों की विदुषी स्त्रियाँ
(अस्मै) इस (अव्यथ्याय) पीड़ा से रहित (देवाय) काम के
लिए (अन्नम्) अन्नादि उत्तम पदार्थों को (दिधिषन्ति) धारण
करती हैं, (कृता इव) की हुई शिक्षायुक्त के समान (अप्सु)
प्राणवत् प्रीति आदि व्यवहारों में प्रवृत्त होने के लिए स्त्री से
पुरुष और पुरुष से स्त्री (उप प्रसस्रे) सम्बन्ध को प्राप्त होती
है, (सः हि) वही पुरुष और स्त्री आनन्द को प्राप्त होती है।
जैसे जलों में (पीयूषम्) अमृतरूप रस को (पूर्वसूनाम्) प्रथम
प्रसूत हुई स्त्रियों का बालक (धयति) दुग्ध पीके बढ़ता है,

१४४ संस्कारविधिः
वैसे इन ब्रह्मचारी और ब्रह्मचारिणी स्त्री के सन्तान यथावत्
बढ़ते हैं॥ २॥
जैसे राजादि सब लोग (पूर्षु) अपने नगरों और (आमासु)
अपने घर में उत्पन्न हुए पुत्र और कन्यारूप प्रजाओं में उत्तम
शिक्षाओं को (परः) उत्तम विद्वान् (अप्रमृष्यम्) शत्रुओं को
सहने के अयोग्य, ब्रह्मचर्य से प्राप्त हुए शरीरात्मबलयुक्त देह
को (अरातयः) शत्रु लोग (न) नहीं (विनशन्) विनाश कर
सकते और (अनृतानि) मिथ्याभाषणादि दुष्ट दुर्व्यसनों को प्राप्त
(न) नहीं होते, वैसे उत्तम स्त्री-पुरुषों को (द्रुहोः) द्रोह आदि
दुर्गुण और (रिषः) हिंसा आदि पाप (न सम्पृचः) सम्बन्ध
नहीं करते, किन्तु जो युवावस्था में विवाह कर प्रसन्नतापूर्वक
विधि से सन्तानोत्पत्ति करते हैं, इनके (अस्य) इस (अश्वस्य)
महान् गृहाश्रम के मध्य में उत्तम बालकों का (जनिम) जन्म
होता है। इसलिए हे स्त्री वा पुरुष! तू (सूरीन्) विद्वानों की
(पाहि) रक्षा कर। (च) और ऐसे गृहस्थों को (अत्र) इस
गृहाश्रम में सदैव (स्वः) सुख बढ़ता रहता है॥३॥
हे मनुष्यो ! (यः) जो पूर्वोक्त लक्षणयुक्त पूर्ण जवान (ईम्)
सब प्रकार की परीक्षा करके (महिषीम्) उत्तम कुल में उत्पन्न
हुई, विद्या, शुभ गुण, रूप, सुशीलतादियुक्त (इषिराम्) वर की
इच्छा करनेहारी, हृदय को प्रिय स्त्री को (एति) प्राप्त होता है
और जो (पतिम्) विवाह से अपने स्वामी की (इच्छन्ती) इच्छा
करती हुई, (इयम्) यह (वधूः) स्त्री अपने सदृश, हृदय को
प्रिय पति को (एति) प्राप्त होती है। वह पुरुष वा स्त्री (अस्य)
इस गृहाश्रम के मध्य (आश्रवस्यात्) अत्यन्त विद्या, धन-
धान्ययुक्त सब ओर से होवें और वे दोनों (रथः) रथ के समान
(आघोषात्) परस्पर प्रिय वचन बोलें (च) और सब गृहाश्रम
के भार को (वहाते) उठा सकते हैं तथा वे दोनों (पुरू) बहुत
(सहस्रा) असंख्य उत्तम कार्यों को (परिवर्तयाते) सब ओर

विवाहप्रकरणम् १४५
से सिद्ध कर सकते हैं॥४॥
हे मनुष्यो ! यदि तुम पूर्ण ब्रह्मचर्य से सुशिक्षित विद्यायुक्त
अपने सन्तानों को कराके स्वयंवर विवाह कराओ तो वे
(वन्द्येभिः) कामना के योग्य (चितयद्भिः) सब सत्य विद्याओं
को जाननेवाले, (अर्कैः) सत्कार के योग्य, (शूषैः) शरीरात्म-
बलों से युक्त होके (वः) तुम्हारे लिए (एषे) सब सुख प्राप्त
कराने को समर्थ होवें और वे (उषासानक्ता) जैसे दिन और
रात तथा जैसे (विदुषीव) विदुषी स्त्री और विद्वान् पुरुष
(विश्वम्) गृहाश्रम के सम्पूर्ण व्यवहार को (आवहतः) सब
ओर से प्राप्त होते हैं, (ह) वैसे ही इस (यज्ञम्) संगतरूप गृहाश्रम
के व्यवहार को वे स्त्री-पुरुष पूर्ण कर सकते हैं और (मर्त्याय)
मनुष्यों के लिए यही पूर्वोक्त विवाह पूर्ण सुखदायक है और
(यह्वी) बड़े ही शुभ गुण-कर्म-स्वभाववाले स्त्री-पुरुष दोनों
(दिवः) कामनाओं को (उप प्र वहतः) अच्छे प्रकार प्राप्त हो
सकते हैं, अन्य नहीं॥५॥
जैसे ब्रह्मचर्य में कन्या का ब्रह्मचर्य वेदोक्त है, वैसे ही
सब पुरुषों को ब्रह्मचर्य से विद्या पढ़, पूर्ण जवान हो, परस्पर
परीक्षा करके, जिससे जिसकी विवाह करने में पूर्ण प्रीति हो,
उसी से उसका विवाह होना अत्युत्तम है। जो कोई युवास्था
में विवाह न कराके बाल्यावस्था में अनिच्छित, अयोग्य वर-
कन्या का विवाह करावेंगे, वे वेदोक्त ईश्वराज्ञा के विरोधी होकर
महादुःखसागर में क्योंकर न डूबेंगे? और जो पूर्वोक्त विधि से
विवाह करते-कराते हैं, वे ईश्वराज्ञा के अनुकूल होने से पूर्ण
सुख को प्राप्त होते हैं।
प्रश्न—विवाह अपने-अपने वर्ण में होना चाहिए, वा अन्य
वर्ण में भी?
उत्तर—अपने-अपने वर्ण में, परन्तु वर्णव्यवस्था गुणकर्मों
के अनुसार होनी चाहिए, जन्ममात्र से नहीं।

१४६ संस्कारविधिः
जो पूर्ण विद्वान्, धर्मात्मा, परोपकारी, जितेन्द्रिय, मिथ्या-
भाषणादि दोषरहित, विद्या और धर्म-प्रचार में तत्पर रहे—इत्यादि
उत्तम गुण जिसमें हों, वह ब्राह्मण-ब्राह्मणी। विद्या, बल, शौर्य,
न्यायकारित्वादि गुण जिसमें हों, वह क्षत्रिय-क्षत्रिया और विद्वान्
होके कृषि, पशु-पालन, व्यापार, देशभाषाओं में चतुरतादि गुण
जिसमें हों, वह वैश्य-वैश्या और जो विद्याहीन मूर्ख हो, वह
शूद्र-शूद्रा कहावे। इसी क्रम से विवाह होना चाहिए, अर्थात्
ब्राह्मण का ब्राह्मणी, क्षत्रिय का क्षत्रिया, वैश्य का वैश्या और
शूद्र का शूद्रा के साथ ही विवाह होने में आनन्द होता है, अन्यथा
नहीं।
इस वर्णव्यवस्था में प्रमाण—
धर्मचर्यया जघन्यो वर्णः पूर्वं पूर्वं वर्णमापद्यते
जातिपरिवृत्तौ ॥ १ ॥
अधर्मचर्यया पूर्वो वर्णो जघन्यं जघन्यं वर्णमापद्यते
जातिपरिवृत्तौ ॥ २ ॥ —आपस्तम्बे ॥
शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम्।
क्षत्रियाज्जातमेवन्तु विद्याद्वैश्यात्तथैव च ॥ ३ ॥
—मनुस्मृतौ ॥
अर्थः—धर्माचरण से नीच वर्ण उत्तम-उत्तम वर्ण को प्राप्त
होता है और उस वर्ण में जो-जो कर्तव्य-अधिकाररूप कर्म
हैं, वे सब गुण-कर्म उस पुरुष और स्त्री को प्राप्त होवें ॥ १ ॥
वैसे ही अधर्माचरण से उत्तम-उत्तम वर्ण नीचे-नीचे के वर्ण
को प्राप्त होवें और वे ही उस-उस वर्ण के अधिकार और कर्मों
के कर्त्ता होवें ॥ २ ॥ उत्तम गुण-कर्म-स्वभाव से जो शूद्र है,
वह वैश्य, क्षत्रिय, ब्राह्मण और वैश्य क्षत्रिय, ब्राह्मण तथा क्षत्रिय
ब्राह्मण वर्ण के अधिकार और कर्मों को प्राप्त होता है। वैसे
ही नीच कर्म और गुणों से जो ब्राह्मण है, वह क्षत्रिय, वैश्य,

विवाहप्रकरणम् १४७
शूद्र और क्षत्रिय वैश्य, शूद्र तथा वैश्य शूद्र वर्ण के अधिकार
और कर्मों को प्राप्त होता है॥३॥
इसी प्रकार वर्णव्यवस्था होने से पक्षपात न होकर सब
वर्ण उत्तम बने रहते और उत्तम बनने में प्रयत्न करते और उत्तम
वर्ण इस भय से कि मैं नीच वर्ण न हो जाऊँ, इसलिए बुरे
कर्म छोड़ उत्तम कर्मों ही को किया करते हैं। इससे संसार
की बड़ी उन्नति है। आर्यावर्त्त देश में जब तक ऐसी वर्णव्यवस्था
और पूर्वोक्त ब्रह्मचर्य, विद्याग्रहण, उत्तमता से स्वयंवर विवाह
होता था, तभी देश की उन्नति थी। अब भी ऐसा ही होना चाहिए,
जिससे आर्यावर्त्त देश अपनी पूर्वावस्था को प्राप्त होकर आनन्दित
होवे।
अब वधू-वर एक-दूसरे के गुण-कर्म और स्वभाव की
परीक्षा इस प्रकार करें—
दोनों का तुल्य शील, समान बुद्धि, समान आचार, समान
रूपादि गुण, अहिंसकता, सत्य, मधुर भाषण, कृतज्ञता, दयालुता,
निर्लोभता, देश का सुधार, विद्याग्रहण, सत्योपदेश करने में
निर्भयता, उत्साह, अहंकार, मत्सर, ईर्ष्या, काम-क्रोध, कपट,
द्यूत, चोरी, मद्यमांसाहारादि दोषों का त्याग, गृह्य-कार्यों में अति
चतुरता हो। जब-जब प्रातःसायं वा परदेश से आकर मिलें,
तब-तब 'नमस्ते' इस वाक्य से परस्पर नमस्कार कर, स्त्री पति
के चरणस्पर्श, पादप्रक्षालन आसनदान करे तथा दोनों परस्पर
प्रेम बढ़ानेहारे वचनादि व्यवहारों से वर्त्तकर आनन्द भोगें। वर
के शरीर से स्त्री का शरीर पतला और पुरुष के स्कन्धे के
तुल्य स्त्री का शिर होना चाहिए। तत्पश्चात् भीतर की परीक्षा
स्त्री-पुरुष वचनादि-व्यवहारों से करें।
ओम् ऋतमग्रे प्रथमं जज्ञ ऋते सत्यं प्रतिष्ठितम्।
यदियं कुमार्य्यभिजाता तदियमिह प्रतिपद्यताम्।
यत्सत्यं तद् दृश्यताम्॥

१४८ संस्कारविधिः
अर्थ—जब विवाह करने का समय निश्चय हो चुके, तब
कन्या चतुर पुरुषों से वर की और वर चतुर स्त्रियों से कन्या
की परोक्ष में परीक्षा करावे। पश्चात् उत्तम विद्वान् स्त्री-पुरुषों
की सभा करके दोनों परस्पर संवाद करें कि—"हे स्त्री वा
हे पुरुष ! इस जगत् के पूर्व ऋत—यथार्थस्वरूप महत्तत्त्व उत्पन्न
हुआ था और उस महत्तत्त्व में सत्य, त्रिगुणात्मक, नाशरहित
प्रकृति प्रतिष्ठित है। जैसे पुरुष और प्रकृति के योग से सब
विश्व उत्पन्न हुआ है, वैसे मैं कुमारी और मैं कुमार पुरुष इस
समय में दोनों विवाह करने की सत्य प्रतिज्ञा करती वा करता
हूँ। उसको यह कन्या और मैं वर प्राप्त होवें और अपनी प्रतिज्ञा
को सत्य करने के लिए दृढ़ोत्साही रहें॥"
विधि—जब कन्या रजस्वला होकर पृष्ठ ४१-४२ में लिखे
प्रमाणे शुद्ध हो जाए, तब जिस दिन गर्भाधान की रात्रि निश्चित
की हो, उस रात्रि में विवाह करने के लिए प्रथम ही सब सामग्री
जोड़ रखनी चाहिए और पृष्ठ २२-२८ में लिखे प्रमाणे यज्ञशाला,
वेदी, ऋत्विक्, यज्ञपात्र, शाकल्य आदि सब सामग्री शुद्ध करके
रखनी उचित है। पश्चात्* एक घण्टेमात्र रात्रि जाने पर—
ओं काम वेद ते नाम मदो नामासि समानयामुँः सुरा
ते अभवत्। परमत्र जन्माग्रे तपसो निर्मितोऽसि स्वाहा ॥ १ ॥
ओम् इमं त उपस्थं मधुना सँसृजामि प्रजापतेर्मुखमेतत्
द्वितीयम्। तेन पुँसोभिभवासि सर्वानवशान्वशिन्यसि राज्ञि
स्वाहा ॥ २ ॥
ओम् अग्निं क्रव्यादमकृन्वन् गुहानाः स्त्रीणामुपस्थमृषयः
पुराणाः। तेनाज्यकृण्वँस्त्रै शुङ्गं त्वाष्ट्रं त्वयि तद्दधातु
स्वाहा ॥ ३ ॥
* यदि आधी रात तक विधि पूरा न हो सके तो मध्याह्नोत्तर आरम्भ
कर देवे कि जिससे मध्यरात्रि तक विवाह विधि पूरा हो जावे।

विवाहप्रकरणम् १४९
इन मन्त्रों से सुगन्धित शुद्ध जल से पूर्ण कलशों को लेके
वधू और वर स्नान कर, पश्चात् वधू उत्तम वस्त्रालङ्कार धारण
करके उत्तम आसन पर पूर्वाभिमुख बैठे। तत्पश्चात् पृष्ठ ९ से
२१ तक लिखे प्रमाणे ईश्वरस्तुतिप्रार्थनोपासना, स्वस्तिवाचन,
शान्तिकरण करें। तत्पश्चात् पृष्ठ ३०-३१ में लिखे प्रमाणे
अग्न्याधान, समिदाधान, पृष्ठ २४ में लिखे प्रमाणे स्थालीपाक
आदि यथोक्त कर वेदी के समीप रक्खें। वैसे ही वर भी अपने
एकान्त घर में जाके उत्तम वस्त्रालङ्कार धारण करके, यज्ञशाला
में आ, उत्तमासन पर पूर्वाभिमुख बैठके पृष्ठ ९-१२ में लिखे
प्रमाणे ईश्वरस्तुति-प्रार्थनोपासना* कर वधू के घर को जाने का
ढंग करे। तत्पश्चात् कन्या और वरपक्ष के पुरुष बड़े सम्मान
से वर को घर ले-जावें। जिस समय वर वधू के घर में प्रवेश
करे, उसी समय वधू और कार्यकर्त्ता मधुपर्क आदि से वर का
निम्नलिखित प्रकार से आदर-सत्कार करें।
उसकी रीति यह है कि वर-वधू के घर में प्रवेश करके
पूर्वाभिमुख खड़ा रहे और वधू तथा कार्यकर्त्ता वर के समीप
उत्तराभिमुख खड़े रहके, वधू और कार्यकर्त्ता—
साधु भवानास्तामर्चयिष्यामो भवन्तम्॥
इस वाक्य को बोलें। उसपर वर—
ओम् अर्चय॥
ऐसा प्रत्युत्तर देवे।
पुनः वधू और कार्यकर्त्ता ने वर के लिए जो उत्तम आसन
सिद्ध कर रक्खा हो, उसे वधू हाथ में लेकर आगे खड़ी रहके—
ओं विष्टरो विष्टरो विष्टरः प्रतिगृह्यताम्॥

  • विवाह में आये हुए स्त्री-पुरुष भी एकाग्रचित्त, ध्यानावस्थित होके
    इन तीन कर्मों के अनुसार ईश्वर का चिन्तन किया करें।

१५० संस्कारविधिः
यह उत्तम आसन है, आप ग्रहण कीजिए। वर—
ओम् प्रतिगृह्णामि ॥
इस वाक्य को बोलके वधू के हाथ से आसन ले, बिछा,
उसपर सभामण्डप में पूर्वाभिमुख बैठके, वर—
ओं वर्ष्मोऽस्मि समानानामुद्यतामिव सूर्यः।
इमं तमभितिष्ठामि यो मा कश्चाभिदासति ॥
इस मन्त्र को बोले।
तत्पश्चात् कार्यकर्त्ता एक सुन्दर पात्र में पूर्ण जल भरके
कन्या के हाथ में देवे और कन्या—
ओं पाद्यं पाद्यं पाद्यं प्रतिगृह्यताम् ॥
इस वाक्य को बोलके वर के आगे धरे। पुनः वर—
ओम् प्रतिगृह्णामि ॥
इस वाक्य को बोलके कन्या के हाथ से उदक ले पग*—
प्रक्षालन करे और उस समय—
ओं विराजो दोहोऽसि विराजो दोहमशीय मयि पाद्यायै
विराजो दोहः ॥
इस मन्त्र को बोले।
तत्पश्चात् कार्यकर्त्ता दूसरा शुद्ध लोटा पवित्र जल से भर
कन्या के हाथ में देवे पुनः कन्या—
ओम् अर्घोऽर्घोऽर्घः प्रतिगृह्यताम् ॥
इस वाक्य को बोलके वर के हाथ में देवे और वर—
ओं प्रतिगृह्णामि ॥
इस वाक्य को बोलके कन्या के हाथ से जलपात्र लेके

  • यदि घर का प्रवेशक द्वार पूर्वाभिमुख हो तो वर उत्तराभिमुख और
    वधू तथा कार्यकर्त्ता पूर्वाभिमुख खड़े रहके यदि ब्राह्मण वर्ण हो
    तो प्रथम दक्षिण पग पश्चात् बायाँ और अन्य क्षत्रियादि वर्ण हों
    तो प्रथम बायाँ पग धोवे पश्चात् दाहिना।

विवाहप्रकरणम् १५१
उससे मुखप्रक्षालन करे और उसी समय मुख धोके वर—
ओम् आप स्थ युष्माभिः सर्वान् कामानवाप्नवानि ॥ १ ॥
ओं समुद्रं वः प्रहिणोमि स्वां योनिमभिगच्छत ।
अरिष्टास्माकं वीरा मा परासेचि मत्पयः ॥ २ ॥
इन मन्त्रों को बोले। तत्पश्चात् वेदी के पश्चिम में बिछाये
हुए उसी शुभासन पर पूर्वाभिमुख बैठे।
तत्पश्चात् कार्यकर्त्ता एक सुन्दर उपपात्र जल से पूर्ण भर,
उसमें आचमनी रख, कन्या के हाथ में देवे और उस समय
कन्या—
ओम् आचमनीयमाचमनीयमाचमनीयं प्रतिगृह्यताम् ॥
इस वाक्य को बोलके वर के सामने करे और वर—
ओं प्रतिगृह्णामि ॥
इस वाक्य को बोलके कन्या के हाथ में से जलपात्र को
ले, सामने धर, उसमें से दाहिने हाथ में जल, जितना अंगुलियों
के मूल तक पहुँचे उतना लेके, वर—
ओम् आमागन् यशसा सँसृज वर्चसा ।
तं मा कुरु प्रियं प्रजानामधिपतिं पशूनामरिष्टिं तनूनाम् ॥
इस मन्त्र से एक आचमन । इसी प्रकार दूसरी और तीसरी
बार इसी मन्त्र को पढ़के दूसरा और तीसरा आचमन करे।
तत्पश्चात् कार्यकर्त्ता मुधपर्क* का पात्र कन्या के हाथ
में देवे और कन्या—
ओं मधुपर्को मधुपर्को मधुपर्कः प्रतिगृह्यताम् ॥

  • मधुपर्क उसको कहते हैं जो दही में घी वा शहद मिलाया जाता
    है। उसका परिमाण १२ (बारह) तोले दही में ४ (चार) तोले
    शहद अथवा ४ (चार) तोले घी मिलाना चाहिए, और यह मधुपर्क
    कांसे के पात्र में होना उचित है।

१५२ संस्कारविधिः
ऐसी विनती वर से करे और वर—
ओं प्रतिगृह्णामि ॥
इस वाक्य को बोलके कन्या के हाथ से ले और उस
समय—
ओं मि॒त्रस्य॑ त्वा॒ चक्षु॑षा प्रती॑क्षे ॥
इस मन्त्रस्थ वाक्य को बोलके मधुपर्क को अपनी दृष्टि
से देखे और—
ओं दे॒वस्य॑ त्वा सवि॒तुः प्र॑स॒वेऽश्विनोर्बा॒हुभ्यां॑ पू॒ष्णो
हस्ता॑भ्यां॒ प्रति॑गृह्णामि ॥
इस मन्त्र को बोलके मधुपर्क के पात्र को वाम हाथ में
लेवे और—
ओं भूर्भुव॒: स्व॒: । मधु॒ वाता॑ ऋताय॒ते मधु॑ क्षरन्ति॒
सिन्ध॑वः । माध्वी᳖र्नः स॒न्त्वोष॑धीः ॥ १ ॥
ओं भूर्भुव॒: स्व॒: । मधु॒ नक्त॑मु॒तोषसो॒ मधु॑म॒त्पार्थि॑व॒ꣳ
रज॑: । मधु॒ द्यौर॑स्तु नः पि॒ता ॥ २ ॥
ओं भूर्भुव॒: स्व॒: । मधु॑मान्नो॒ वन॒स्पति॒र्मधु॑माँ अस्तु॒ सूर्य॑: ।
माध्वी॒र्गावो॑ भवन्तु नः ॥ ३ ॥
इन तीन मन्त्रों से मधुपर्क की ओर अवलोकन करे।
ओं नमः श्यावास्यायान्नशने यत्त आविद्धं तत्ते
निष्कृन्तामि ॥
इस मन्त्र को पढ़, दाहिने हाथ की अनामिका और अंगुष्ठ
से मधुपर्क को तीन बार बिलोवे और उस मधुपर्क में से वर—
ओं वसवस्त्वा गायत्रेण च्छन्दसा भक्षयन्तु ॥
इस मन्त्र से पूर्व दिशा।
ओं रुद्रास्त्वा त्रैष्टुभेन च्छन्दसा भक्षयन्तु ॥

विवाहप्रकरणम् १५३
इस मन्त्र से दक्षिण दिशा।
ओम् आदित्यास्त्वा जागतेन च्छन्दसा भक्षयन्तु॥
इस मन्त्र से पश्चिम दिशा, और—
ओं विश्वे त्वा देवा आनुष्टुभेन च्छन्दसा भक्षयन्तु॥
इस मन्त्र से उत्तर दिशा में थोड़ा-थोड़ा छोड़े, अर्थात् छींटे
देवे।
ओं भूतेभ्यस्त्वा परिगृह्णामि॥
इस मन्त्रस्थ वाक्य को बोलके पात्र के मध्य भाग में से
लेके ऊपर की ओर तीन बार फेंकना। तत्पश्चात् उस मधुपर्क
के तीन भाग करके तीन काँसे के पात्रों में धर, भूमि में अपने
सम्मुख तीनों पात्र रक्खे। रक्खे—
ओं यन्मधुनो मधव्यं परमं रूपमन्नाद्यम्। तेनाहं मधुनो
मधव्येन परमेण रूपेणान्नाद्येन परमो मधव्योऽन्नादोऽसानि॥
इस मन्त्र को एक-एक बार बोलके एक-एक भाग में
से वर थोड़ा-थोड़ा प्राशन करे वा सब प्राशन करे। जो उन
पात्रों में शेष उच्छिष्ट मधुपर्क रहा हो, वह किसी अपने सेवक
को देवे वा जल में डाल देवे। तत्पश्चात्—
ओम् अमृतापिधानमसि स्वाहा॥
ओं सत्यं यशः श्रीर्मयि श्रीः श्रयतां स्वाहा॥
इन दो मन्त्रों से दो आचमन, अर्थात् एक से एक और
दूसरे से दूसरा वर करे। तत्पश्चात् वर पृष्ठ ३० में लिखे प्रमाणे
चक्षुरादि इन्द्रियों का जल से स्पर्श करे। पश्चात् कन्या—
ओं गौर्गौर्गौः प्रतिगृह्यताम्॥
इस वाक्य से वर की विनती करके अपनी शक्ति के योग्य
वर. को गोदानादि द्रव्य, जोकि वर के योग्य हो, अर्पण करे
और वर—
ओं प्रतिगृह्णामि॥

१५४ संस्कारविधिः
इस वाक्य से उसको ग्रहण करे। इस प्रकार मधुपर्क विधि
यथावत् करके, वधू और कार्यकर्त्ता वर को सभामण्डपस्थान*
से घर में ले-जाके शुभ आसन पर पूर्वाभिमुख बैठाके, वर
के सामने पश्चिमाभिमुख वधू को बैठावे और कार्यकर्त्ता
उत्तराभिमुख बैठके—
ओम् अमुक¹ गोत्रोत्पन्नामिमाममुकनाम्नीम्² अलङ्कृतां
कन्यां प्रतिगृह्णातु भवान्॥
इस प्रकार बोलके वर का हाथ चत्ता, अर्थात् हथेली ऊपर
रखके, उसके हाथ में वधू का दक्षिण हाथ चत्ता ही रखना,
और वर—
ओम् प्रतिगृह्णामि॥ ऐसा बोलके—
ओं जरां गच्छ परिधत्स्व वासो भवा कृष्टीनामभि-
शस्तिपावा।
शतं च जीव शरदः सुवर्चा रयिं च पुत्राननुसंव्ययस्वा-
युष्मतीदं परिधत्स्व वासः॥
इस मन्त्र को बोलके वधू को उत्तम वस्त्र देवे। तत्पश्चात्—
ओं या अकृन्तन्नवयन् या अतन्वत याश्च
देवीस्तन्तूनभितो ततन्थ। तास्त्वा देवीर्जरसे
संव्ययस्वायुष्मतीदं परिधत्स्व वासः॥
इस मन्त्र को बोलके वधू को वर उपवस्त्र देवे। वह उपवस्त्र

  • ·यदि सभामण्डप स्थापन न किया हो तो जिस घर में मधुपर्क हुआ
    हो उससे दूसरे घर में वर को ले-जावे।
    १. अमुक इस पद के स्थान में जिस गोत्र और कुल में वधू उत्पन्न
    हुई हो उसका उच्चारण अर्थात् उसका नाम लेना।
    २. ‘‘अमुकनाम्नीम्’’ इस स्थान पर वधू का नाम द्वितीया विभक्ति
    के एकवचन से बोलना।