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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 156, कुल 318 में से

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पृष्ठ 156

१५२ संस्कारविधिः
ऐसी विनती वर से करे और वर—
ओं प्रतिगृह्णामि ॥
इस वाक्य को बोलके कन्या के हाथ से ले और उस
समय—
ओं मि॒त्रस्य॑ त्वा॒ चक्षु॑षा प्रती॑क्षे ॥
इस मन्त्रस्थ वाक्य को बोलके मधुपर्क को अपनी दृष्टि
से देखे और—
ओं दे॒वस्य॑ त्वा सवि॒तुः प्र॑स॒वेऽश्विनोर्बा॒हुभ्यां॑ पू॒ष्णो
हस्ता॑भ्यां॒ प्रति॑गृह्णामि ॥
इस मन्त्र को बोलके मधुपर्क के पात्र को वाम हाथ में
लेवे और—
ओं भूर्भुव॒: स्व॒: । मधु॒ वाता॑ ऋताय॒ते मधु॑ क्षरन्ति॒
सिन्ध॑वः । माध्वी᳖र्नः स॒न्त्वोष॑धीः ॥ १ ॥
ओं भूर्भुव॒: स्व॒: । मधु॒ नक्त॑मु॒तोषसो॒ मधु॑म॒त्पार्थि॑व॒ꣳ
रज॑: । मधु॒ द्यौर॑स्तु नः पि॒ता ॥ २ ॥
ओं भूर्भुव॒: स्व॒: । मधु॑मान्नो॒ वन॒स्पति॒र्मधु॑माँ अस्तु॒ सूर्य॑: ।
माध्वी॒र्गावो॑ भवन्तु नः ॥ ३ ॥
इन तीन मन्त्रों से मधुपर्क की ओर अवलोकन करे।
ओं नमः श्यावास्यायान्नशने यत्त आविद्धं तत्ते
निष्कृन्तामि ॥
इस मन्त्र को पढ़, दाहिने हाथ की अनामिका और अंगुष्ठ
से मधुपर्क को तीन बार बिलोवे और उस मधुपर्क में से वर—
ओं वसवस्त्वा गायत्रेण च्छन्दसा भक्षयन्तु ॥
इस मन्त्र से पूर्व दिशा।
ओं रुद्रास्त्वा त्रैष्टुभेन च्छन्दसा भक्षयन्तु ॥