संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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वैसे इन ब्रह्मचारी और ब्रह्मचारिणी स्त्री के सन्तान यथावत्
बढ़ते हैं॥ २॥
जैसे राजादि सब लोग (पूर्षु) अपने नगरों और (आमासु)
अपने घर में उत्पन्न हुए पुत्र और कन्यारूप प्रजाओं में उत्तम
शिक्षाओं को (परः) उत्तम विद्वान् (अप्रमृष्यम्) शत्रुओं को
सहने के अयोग्य, ब्रह्मचर्य से प्राप्त हुए शरीरात्मबलयुक्त देह
को (अरातयः) शत्रु लोग (न) नहीं (विनशन्) विनाश कर
सकते और (अनृतानि) मिथ्याभाषणादि दुष्ट दुर्व्यसनों को प्राप्त
(न) नहीं होते, वैसे उत्तम स्त्री-पुरुषों को (द्रुहोः) द्रोह आदि
दुर्गुण और (रिषः) हिंसा आदि पाप (न सम्पृचः) सम्बन्ध
नहीं करते, किन्तु जो युवावस्था में विवाह कर प्रसन्नतापूर्वक
विधि से सन्तानोत्पत्ति करते हैं, इनके (अस्य) इस (अश्वस्य)
महान् गृहाश्रम के मध्य में उत्तम बालकों का (जनिम) जन्म
होता है। इसलिए हे स्त्री वा पुरुष! तू (सूरीन्) विद्वानों की
(पाहि) रक्षा कर। (च) और ऐसे गृहस्थों को (अत्र) इस
गृहाश्रम में सदैव (स्वः) सुख बढ़ता रहता है॥३॥
हे मनुष्यो ! (यः) जो पूर्वोक्त लक्षणयुक्त पूर्ण जवान (ईम्)
सब प्रकार की परीक्षा करके (महिषीम्) उत्तम कुल में उत्पन्न
हुई, विद्या, शुभ गुण, रूप, सुशीलतादियुक्त (इषिराम्) वर की
इच्छा करनेहारी, हृदय को प्रिय स्त्री को (एति) प्राप्त होता है
और जो (पतिम्) विवाह से अपने स्वामी की (इच्छन्ती) इच्छा
करती हुई, (इयम्) यह (वधूः) स्त्री अपने सदृश, हृदय को
प्रिय पति को (एति) प्राप्त होती है। वह पुरुष वा स्त्री (अस्य)
इस गृहाश्रम के मध्य (आश्रवस्यात्) अत्यन्त विद्या, धन-
धान्ययुक्त सब ओर से होवें और वे दोनों (रथः) रथ के समान
(आघोषात्) परस्पर प्रिय वचन बोलें (च) और सब गृहाश्रम
के भार को (वहाते) उठा सकते हैं तथा वे दोनों (पुरू) बहुत
(सहस्रा) असंख्य उत्तम कार्यों को (परिवर्तयाते) सब ओर