संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविवाहप्रकरणम् १४३
उप॑ व॒ एषे॒ वन्द्ये॑भिः शू॒षैः प्र य॒ह्वी दिव॒श्चित॒यद्भि॑र॒र्कैः ।
उ॒षासा॒नक्ता॑ वि॒दुषी॑व॒ विश्व॒मा हा॑ वहतो॒ मर्त्या॑य य॒ज्ञम् ॥ ५ ॥
—ऋ० मं० ५ । सू० ४१ । मं० ७ ॥
अर्थ—जो (मर्मृज्यमानाः) उत्तम ब्रह्मचर्यव्रत और सद्धिद्याओं
से अत्यन्त युक्त (युवतयः) बीसवें वर्ष से चौबीसवें वर्षवाली
हैं, वे कन्याएँ जैसे (आपः) जल वा नदी समुद्र को प्राप्त होती
हैं, वैसे (अस्मेराः) हमें प्राप्त होनेवाली, अपनी-अपनी पसन्द,
अपने-अपने से ड्योढ़े वा दूने आयुवाले, (तम्) उस ब्रह्मचर्य
और विद्या से परिपूर्ण, शुभ लक्षणयुक्त (युवानम्) जवान पति
को (परियन्ति) अच्छे प्रकार प्राप्त होती हैं। (सः) वह ब्रह्मचारी
(शुक्रेभिः) शुद्ध गुण और (शिक्वभिः) वीर्यादि से युक्त होके
(अस्मे) हमारे मध्य में (रेवत्) अत्यन्त श्रीयुक्त कर्म को और
(दीदाय) अपने तुल्य युवती स्त्री को प्राप्त होवे। जैसे (अप्सु)
अन्तरिक्ष वा समुद्र में (घृतनिर्णिक्) जल को शोधन करनेहारा
(अनिध्मः) आप प्रकाशित विद्युत् अग्नि है,
इसी प्रकार स्त्री और पुरुष के हृदय में प्रेम बाहर
अप्रकाशमान, भीतर सुप्रकाशित रहकर उत्तम सन्तान और
अत्यन्त आनन्द को गृहाश्रम में दोनों स्त्री-पुरुष प्राप्त होवें ॥ १ ॥
हे स्त्री-पुरुषो! जैसे (तिस्रः) उत्तम, मध्यम तथा निकृष्ट
स्वभावयुक्त, (देवीः नारीः) विद्वान् नरों की विदुषी स्त्रियाँ
(अस्मै) इस (अव्यथ्याय) पीड़ा से रहित (देवाय) काम के
लिए (अन्नम्) अन्नादि उत्तम पदार्थों को (दिधिषन्ति) धारण
करती हैं, (कृता इव) की हुई शिक्षायुक्त के समान (अप्सु)
प्राणवत् प्रीति आदि व्यवहारों में प्रवृत्त होने के लिए स्त्री से
पुरुष और पुरुष से स्त्री (उप प्रसस्रे) सम्बन्ध को प्राप्त होती
है, (सः हि) वही पुरुष और स्त्री आनन्द को प्राप्त होती है।
जैसे जलों में (पीयूषम्) अमृतरूप रस को (पूर्वसूनाम्) प्रथम
प्रसूत हुई स्त्रियों का बालक (धयति) दुग्ध पीके बढ़ता है,