संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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करना चाहिए?
उत्तर—'दुहिता दुर्हिता दूरे हिता भवतीति।' यह निरुक्त
का प्रमाण है कि—जितना दूरदेश में विवाह होगा, उतना ही
उन्हें अधिक लाभ होगा।
प्रश्न—अपने गोत्र वा भाई-बहिनों का परस्पर विवाह क्यों
नहीं होता?
उत्तर—एक दोष यह है कि इनके विवाह होने में प्रीति
कभी नहीं होती, क्योंकि जितनी प्रीति परोक्ष पदार्थ में होती
है, उतनी प्रत्यक्ष में नहीं और बाल्यावस्था के गुण-दोष भी
विदित रहते हैं, तथा भयादि भी अधिक नहीं रहते। दूसरा जबतक
दूरस्थ एक-दूसरे कुल के साथ सम्बन्ध नहीं होता, तबतक
शरीर आदि की पुष्टि भी पूर्ण नहीं होती। तीसरा दूर सम्बन्ध
होने से परस्पर प्रीति, उन्नति, ऐश्वर्य बढ़ता है, निकट से नहीं।
युवावस्था ही में विवाह का प्रमाण—
तमस्मेरा॑ यु॒वत॑यो॒ युवा॑नं म॒र्मृज्यमा॑नाः॒ परि॑ यन्त्यापः॑ ।
स शु॒क्रेभिः॒ शिक्व॑भी रे॒वद॒स्मे दी॒दाया॑नि॒ध्मो घृ॒तनि॑र्णिग॒प्सु ॥ १ ॥
अ॒स्मै तिस्रो अ॑व्य॒थ्याय॒ नारी॑र्दे॒वाय॑ दे॒वीर्दि॑धिषन्त्यन्न॑म्।
कृ॒ताइ॑वो॒प हि प्र॑स॒स्रे अ॒प्सु स पी॒यूषं॑ धयति पू॒र्वसूना॑म् ॥ २ ॥
अश्व॒स्यात्र॒ जनि॑मा॒स्य च॒ स्वर्द्द्रुहो॑ रि॒षः सम्पृचः॑ पाहि सू॒रीन्।
आ॒मासु॑ पू॒र्षु प॒रो अप्र॑मृष्यं॒ नारा॑तयो॒ वि न॑श॒न्नानृ॑तानि ॥ ३ ॥
—ऋ० मं० २। सू० ३५। मं० ४-६॥
व॒धूरि॒यं पति॑मि॒च्छन्त्ये॑ति॒ य ईं॒ वहा॑ते महि॒षीमिषि॑राम्।
आ॒स्य श्रव॒स्याद् रथ॒ आ च॑ घो॒षात् पुरु सह॒स्रा परि॑ वर्तयाते ॥ ४ ॥
—ऋ० मं० ५। सू० ३७। मं० ३॥