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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 127

वेदारम्भप्रकरणम् १२३
कर तथा पढ़ और पढ़ाया भी कर। अपने इन्द्रियों को बुरे कामों
से हटा अच्छे कामों में चला, विद्या का ग्रहण कर और कराया
कर। अपने अन्तःकरण और आत्मा को अन्यायाचरण से हटा
न्यायाचरण में प्रवृत्त कर और कराया कर तथा पढ़ और सदा
पढ़ाया कर। अग्निविद्या के सेवनपूर्वक विद्या को पढ़ और पढ़ाया
कर । अग्निहोत्र करता हुआ पढ़ और पढ़ाया कर। 'सत्यवादी
होना तप'—सत्यवचा राथीतर आचार्य; 'न्यायाचरण में कष्ट
सहना तप'—तपो नित्य पौरुशिष्टि आचार्य; 'और धर्म में
चलके पढ़ना-पढ़ाना और सत्योपदेश करना ही तप है' यह
नाक मौद्गल्य आचार्य का मत है और सब आचार्यों के मत
में यही पूर्वोक्त तप, यही पूर्वोक्त तप है, ऐसा तू जान ॥ ३ ॥
इत्यादि उपदेश तीन दिन के भीतर आचार्य वा बालक
का पिता करे।
तत्पश्चात् घर को छोड़ गुरुकुल में जावे। यदि पुत्र हो
तो पुरुषों की पाठशाला और कन्या हो तो स्त्रियों की पाठशाला
में भेजें। यदि घर में वर्णोच्चारण की शिक्षा यथावत् न हुई हो
तो आचार्य बालकों को और कन्याओं को स्त्री पाणिनिमुनिकृत
वर्णोच्चारणशिक्षा एक महीने के भीतर पढ़ा देवें। पुनः
पाणिनिमुनिकृत अष्टाध्यायी का पाठ पदच्छेद, अर्थसहित आठ
महीने में, अथवा एक वर्ष में पढ़ाकर, धातुपाठ और दश लकारों
के रूप सधवाना तथा दश प्रक्रिया भी सधवानी। पुनः
पाणिनिमुनिकृत लिङ्गानुशासन और उणादिगण, गणपाठ तथा
अष्टाध्यायीस्थ ण्वुल् और तृच् प्रत्ययाद्यन्त सुबन्तरूप छह महीने
के भीतर सधवा देवें। पुनः दूसरी बार अष्टाध्यायी पदार्थोंक्ति,
समास, शङ्का-समाधान, उत्सर्ग अपवाद* अन्वयपूर्वक पढ़ावें
और संस्कृतभाषण का भी अभ्यास कराते जाएँ। आठ महीने

  • जिस सूत्र का अधिक विषय हो वह उत्सर्ग और जो किसी सूत्र
    के बड़े विषय में से थोड़े में प्रवृत्त हो वह अपवाद कहाता है।