संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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सम्मानाद् ब्राह्मणो नित्यमुद्विजेत विषादिव ।
अमृतस्येव चाकाङ्क्षेदवमानस्य सर्वदा ॥ १४ ॥
वेदमेव सदाभ्यस्येत् तपस्तप्स्यन् द्विजोत्तमः ।
वेदाभ्यासो हि विप्रस्य तपः परमिहोच्यते ॥ १५ ॥
योऽनधीत्य द्विजो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम् ।
स जीवन्नेव शूद्रत्वमाशु गच्छति सान्वयः ॥ १६ ॥
यथा खनन् खनित्रेण नरो वार्य्यधिगच्छति ।
तथा गुरुगतां विद्यां शुश्रूषुरधिगच्छति ॥ १७ ॥
श्रद्दधानः शुभां विद्यामाददीतावरादपि ।
अन्त्यादपि परं धर्मं स्त्रीरत्नं दुष्कुलादपि ॥ १८ ॥
विषादप्यमृतं ग्राह्यं बालादपि सुभाषितम् ।
विविधानि च शिल्पानि समादेयानि सर्वतः ॥ १९ ॥
—मनु० ॥
अर्थः—कान, त्वचा, नेत्र, जीभ, नासिका, गुदा, उपस्थ
(मूत्र का मार्ग) हाथ, पग, वाणी—ये दस इन्द्रियाँ इस शरीर
में हैं ॥ १ ॥
इनमें कान आदि पाँच ज्ञानेन्द्रिय और गुदा आदि पाँच
कर्मेन्द्रिय कहाते हैं ॥ २ ॥
ग्यारहवाँ इन्द्रिय मन है। वह अपने स्मृति आदि गुणों से
दोनों प्रकार के इन्द्रियों से सम्बन्ध करता है कि जिस मन के
जीतने में ज्ञानेन्द्रिय तथा कर्मेन्द्रिय दोनों जीत लिये जाते हैं ॥ ३ ॥
जैसे सारथि घोड़े को कुपथ में नहीं जाने देता, वैसे विद्वान्
ब्रह्मचारी आकर्षण करनेवाले विषयों में जाते हुए इन्द्रियों को
रोकने में सदा प्रयत्न किया करे ॥ ४ ॥
ब्रह्मचारी इन्द्रियों के साथ मन लगाने से निःसन्देह दोषी
हो जाता है और उन पूर्वोक्त १० इन्द्रियों को वश में करके