संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
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के भीतर इतना पढ़ना-पढ़ाना चाहिए।
तत्पश्चात् पतञ्जलिमुनिकृत महाभाष्य, जिसमें वर्ण
उच्चारणशिक्षा, अष्टाध्यायी, धातुपाठ, गणपाठ, उणादिगण,
लिङ्गानुशासन इन छह ग्रन्थों की व्याख्या यथावत् लिखी है,
डेढ़ वर्ष में अर्थात् अठारह महीने में इसको पढ़ना-पढ़ाना। इस
प्रकार शिक्षा और व्याकरणशास्त्र को तीन वर्ष पाँच महीने वा
नौ महीने, अथवा ४ वर्ष के भीतर पूरा कर सब संस्कृतविद्या
के मर्मस्थलों को समझने के योग्य होवे।
तत्पश्चात् यास्कमुनिकृत निघण्टु निरुक्त तथा कात्यायनादि
मुनिकृत कोश डेढ़ वर्ष के भीतर पढ़के, अव्यार्थ आप्तमुनिकृत
वाच्यवाचक सम्बन्धरूप यौगिक*, योगरूढ़ि और रूढ़ि तीन
प्रकार के शब्दों के अर्थ यथावत् जानें। तत्पश्चात् पिङ्गलाचार्यकृत
पिङ्गलसूत्र छन्दोग्रन्थ भाष्यसहित तीन महीने में पढ़ और तीन
महीने में श्लोकादिरचनविद्या को सीखें। पुनः यास्कमुनिकृत
काव्यालङ्कारसूत्र, वात्स्यायनमुनिकृत भाष्यसहित आकाङ्क्षा,
योग्यता, आसत्ति और तात्पर्यार्थ अन्वयसहित पढ़के, इसी के
साथ मनुस्मृति, विदुरनीति और किसी प्रकरण में से १० सर्ग
वाल्मीकीय रामायण के, ये सब एक वर्ष के भीतर पढ़ें और
पढ़ावें तथा एक वर्ष में सूर्यसिद्धान्तादि में से किसी एक सिद्धान्त
से गणितविद्या, जिसमें बीजगणित, रेखागणित और पाटीगणित,
जिसको अङ्कगणित भी कहते हैं, पढ़ें और पढ़ावें। निघण्टु से
लेके ज्योतिषपर्यन्त वेदाङ्गों को चार वर्ष के भीतर पढ़ें।
तत्पश्चात् जैमिनिमुनिकृत सूत्र पूर्वमीमांसा व्यासमुनिकृत
व्याख्यासहित, कणादमुनिकृत वैशेषिकसूत्ररूप शास्त्र को
गौतममुनिकृत प्रशस्तपादभाष्यसहित, वात्स्यायनमुनिकृत भाष्य-
- यौगिक—जो क्रिया के साथ सम्बन्ध रक्खे। जैसे पाचक याजकादि।
योगरूढ़ि—जैसे पङ्कजादि। रूढ़ि—जैसे धन, वन इत्यादि।