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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

प्रारंभिक पृष्ठ एवं सामान्य प्रकरण (ईश्वर-स्तुति, मन्त्र-पाठ व दैनिक हवन)

ओ३म्
संस्कार-विधि
महर्षि दयानन्द सर...

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ओ३म्
संस्कारविधिः
वेदानुकूलैर्गर्भाधानाद्यन्त्येष्टिपर्य्यन्तैः
षोडशसंस्कारैः समन्वितः
आर्य्यभाषया प्रकटीकृतः
श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्येण श्रीमद्दयानन्द-
सरस्वतीस्वामिना निर्मितः
आर्य साहित्य भवन
विजयकुमार गोविन्दराम हासानन्द

प्रकाशक : विजयकुमार गोविन्दराम हासानन्द
4408, नई सड़क, दिल्ली-110 006
दूरभाष : 23977216, 65360255
e-mail : [email protected]
Website : www.vedicbooks.com
वैदिक-ज्ञान-प्रकाश का गरिमापूर्ण 87वाँ वर्ष (1925-2012)
संस्करण : 2012
मूल्य : ₹ 45.00
मुद्रक : अजय प्रिंटर्स, दिल्ली-110 032
SANSKAR VIDHI by Swami Dayanand Saraswati

\underline{संस्कारविधेर्विषयसूचीपत्रम्}
<विषय> <पृष्ठ>
भूमिका ... ५-६
ग्रन्थारम्भः ... ७
ईश्वरस्तुतिप्रार्थनोपासनाः ... ९
स्वस्तिवाचनम् ... १३
शान्तिकरणम् ... १८
सामान्यप्रकरणम् ... २२
यज्ञकुण्डपरिमाणम् ... २३
यज्ञसमिधः ... २३
होमद्रव्यं चतुर्विधम् ... २४
स्थालीपाकः ... २४
यज्ञपात्रलक्षणानि ... २५
यज्ञपात्राकृतयः ... २६-२८
ऋत्विग्वरणम् ... २८
आचमनम्, मार्जनम् ... २९
अग्न्याधानम् ... ३०
समिदाधानम् ... ३१
वेदीमार्जनम् ... ३२
आघारावाज्यभागाहुतयः ... ३२
व्याहृत्याहुतयः ... ३३
संस्कारचतुष्टये चतस्रो मुख्याऽऽहुतयः ... ३४
अष्टाज्याहुतयः ... ३४-३५
पूर्णाहूतिः ... ३६
महावामदेव्यगानम् ... ३६-३७
१ गर्भाधानम् ... ३८
गर्भाधानस्य प्रमाणम् ... ३९

विषय पृष्ठ
ऋतुदानकालादि
२ पुंसवनम् ... ४१
३ सीमन्तोन्नयनम् ... ५४
४ जातकर्मसंस्कारः ... ५९
५ नामकरणम् ... ६४
६ निष्क्रमणसंस्कारः ... ७२
७ अन्नप्राशनसंस्कारः ... ७७
८ चूडाकर्मसंस्कारः ... ८०
९ कर्णवेधसंस्कारः ... ८३
१० उपनयनसंस्कारः ... ८९
११ वेदारम्भसंस्कारः ... ९०
ब्रह्मचारिकर्त्तव्योपदेशः ... ९९
ब्रह्मचर्यकालः ... १०५
पुनर्ब्रह्मचर्ये कर्त्तव्यो० ... ११२
१२ समावर्त्तनसंस्कारः ... १२१
१३ विवाहसंस्कारः ... १२७
१४ गृहाश्रमसंस्कारः ... १३५
गृहस्थोपदेशः ... १८९
पञ्चमहायज्ञाः ... १८९
पक्षेष्टिः तथा नवशस्येष्टिः ... २१४
शालानिर्माणविधिः ... २२५
वास्तुप्रतिष्ठा ... २२७
ब्राह्मणादिवर्णव्यवस्था ... २३२
गृहाश्रमे कर्त्तव्योपदेशः ... २३८
१५ वानप्रस्थाश्रमसंस्कारः ... २४३
१६ संन्यासाश्रमसंस्कारः ... २५७
अन्त्येष्टिकर्मविधिः ... २६४
... २९९

॥ ओ३म् ॥
भूमिका
सब सज्जन लोगों को विदित होवे कि मैंने बहुत सज्जनों
के अनुरोध करने से श्रीयुत महाराजे विक्रमादित्य के संवत्
१९३२ कार्त्तिक कृष्णपक्ष ३० शनिवार के दिन 'संस्कारविधि'
का प्रथमारम्भ किया था। उसमें संस्कृतपाठ सब एकत्र और
भाषापाठ एकत्र लिखा था। इस कारण संस्कार करानेवाले
मनुष्यों को संस्कृत और भाषा दूर-दूर होने से कठिनता पड़ती
थी और जो एक हज़ार पुस्तक छपे थे, उनमें से अब एक
भी नहीं रहा। इसलिए श्रीयुत महाराजे विक्रमादित्य के संवत्
१९४० आषाढ़ बदि १३ रविवार के दिन पुनः संशोधन करके
छपवाने के लिए विचार किया।
अब की बार जिस-जिस संस्कार का उपदेशार्थ प्रमाण-
वचन और प्रयोजन है, वह-वह संस्कार के पूर्व लिखा जाएगा।
तत्पश्चात् जो-जो संस्कार में कर्त्तव्य विधि है, उस-उसको क्रम
से लिखकर पुनः उस संस्कार का शेष विषय जोकि दूसरे संस्कार
तक करना चाहिए, वह लिखा है और जो विषय प्रथम अधिक
लिखा था, उसमें से अत्यन्त उपयोगी न जानकर छोड़ भी दिया
है और अब की बार जो-जो अत्यन्त उपयोगी विषय है, वह-
वह अधिक भी लिखा है।
इसमें यह न समझा जावे कि प्रथम विषय युक्त न था,
और युक्त छूट गया था उसका संशोधन किया है, किन्तु उन
विषयों का यथावत् क्रमबद्ध संस्कृत के सूत्रों में प्रथम लेख
किया था। उसमें सब लोगों की बुद्धि कृतकारी नहीं होती थी,

६ संस्कारविधिः
इसलिए अब सुगम कर दिया है, क्योंकि संस्कृतस्थ विषय
विद्वान् लोग समझ सकते थे, साधारण नहीं।
इसमें सामान्य विषय, जोकि सब संस्कारों के आदि और
उचित समय तथा स्थान में अवश्य करना चाहिए, वह प्रथम
सामान्यप्रकरण में लिख दिया है और जो मन्त्र वा क्रिया
सामान्यप्रकरण की संस्कारों में अपेक्षित है, उसके पृष्ठ, पंक्ति
की प्रतीक उन कर्त्तव्य संस्कारों में लिखी है कि जिसको देखके
सामान्यविधि की क्रिया वहाँ सुगमता से कर सकें और
सामान्यप्रकरण का विधि भी सामान्यप्रकरण में लिख दिया है,
अर्थात् वहाँ का विधि करके संस्कार का कर्त्तव्य कर्म करे और
जो सामान्यप्रकरण का विधि लिखा है, वह एक स्थान से अनेक
स्थलों में अनेक बार करना होगा। जैसे अग्न्याधान प्रत्येक
संस्कार में कर्त्तव्य है, वैसे वह सामान्यप्रकरण में एकत्र लिखने
से सब संस्कारों में बारम्बार न लिखना पड़ेगा।
इसमें प्रथम ईश्वर की स्तुति-प्रार्थना-उपासना, पुनः
स्वस्तिवाचन, शान्तिपाठ, तदनन्तर सामान्य-प्रकरण, पश्चात्
गर्भाधानादि अन्त्येष्टिपर्यन्त सोलह संस्कार क्रमशः लिखे हैं और
यहाँ सब मन्त्रों का अर्थ नहीं लिखा है, क्योंकि इसमें कर्मकाण्ड
का विधान है, इसलिए विशेषकर क्रिया-विधान लिखा है और
जहाँ-जहाँ अर्थ करना आवश्यक है, वहाँ-वहाँ अर्थ भी कर
दिया है और मन्त्रों के यथार्थ अर्थ मेरे किये वेद-भाष्य में
लिखे ही हैं, जो देखना चाहें वहाँ से देख लेवें। यहाँ तो केवल
क्रिया करना ही मुख्य है। जिन के द्वारा शरीर और आत्मा
सुसंस्कृत होने से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्त हो सकते
हैं और सन्तान अत्यन्त योग्य होते हैं, इसलिए संस्कारों का
करना सब मनुष्यों को अति उचित है।
॥ इति भूमिका ॥
—स्वामी दयानन्द सरस्वती

ओ३म् नमो नमः सर्वविधात्रे जगदीश्वराय।
अथ संस्कारविधिं वक्ष्यामः
ओं स॒ह ना॑ववतु। स॒ह नौ॑ भुनक्तु। स॒ह वी॒र्यं॑ करवावहै।
ते॒ज॒स्विना॒वधी॑तमस्तु॒। मा वि॑द्विषा॒वहै॑।
ओं शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
—तैत्तिरीयआरण्यके, अष्टमप्रपाठके, प्रथमानुवाके
सर्वात्मा सच्चिदानन्दो विश्वादिविश्वकृद्विभुः।
भूयात्तमां सहायो नस्सर्वेशो न्यायकृच्छुचिः॥ १॥
गर्भाद्या मृत्युपर्यन्ताः संस्काराः षोडशैव हि।
वक्ष्यन्ते तं नमस्कृत्यानन्तविद्यं परेश्वरम्॥ २॥
वेदादिशास्त्रसिद्धान्तमाध्याय परमादरात्।
आर्यैतिह्यं पुरस्कृत्य शरीरात्मविशुद्धये॥ ३॥
संस्कारैस्संस्कृतं यद्यन्मेध्यमत्र तदुच्यते।
असंस्कृतं तु यल्लोके तदमेध्यं प्रकीर्त्यते॥ ४॥
अतः संस्कारकरणे क्रियतामुद्यमो बुधैः।
शिक्षौषधिभिर्नित्यं सर्वथा सुखवर्द्धनः॥ ५॥

८
संस्कारविधिः
कृतानीह विधानानि ग्रन्थग्रन्थनतत्परैः।
वेदविज्ञानविरहैः स्वार्थिभिः परिमोहितैः ॥ ६ ॥
प्रमाणैस्तान्यनादृत्य क्रियते वेदमानतः।
जनानां सुखबोधाय संस्कारविधिरुत्तमः ॥ ७ ॥
बहुभिः सज्जनैस्सम्यङ् मानवप्रियकारकैः।
प्रवृत्तो ग्रन्थकरणे क्रमशोऽहं नियोजितः ॥ ८ ॥
दयाया आनन्दो विलसति परो ब्रह्मविदितः
सरस्वत्यस्याग्रे निवसति मुदा सत्यनिलया।
इयं ख्यातिर्यस्य प्रततसुगुणा हीशशरणाऽ-
स्त्यनेनायं ग्रन्थो रचित इति बोद्धव्यमनघाः ॥ ९ ॥
चक्षूरामाङ्कचन्द्रेऽब्दे कार्त्तिकस्यान्तिमे दले।
अमायां शनिवारेऽयं ग्रन्थारम्भः कृतो मया ॥ १० ॥
बिन्दुवेदाङ्कचन्द्रेऽब्दे शुचौ मासेऽसिते दले।
त्रयोदश्यां रवौ वारे पुनः संस्करणं कृतम् ॥ ११ ॥
०-०
सब संस्कारों के आदि में निम्नलिखित मन्त्रों के पाठ और
अर्थ द्वारा एक विद्वान् वा बुद्धिमान् पुरुष ईश्वर की स्तुति-
प्रार्थना और उपासना स्थिरचित्त होकर परमात्मा में ध्यान लगाके
करे और सब लोग उसमें ध्यान लगाकर सुनें और विचारें—

अथेश्वरस्तुतिप्रार्थनोपासनामन्त्राः
ओ३म्॒ विश्वा॑नि देव सवितर्दुरि॒तानि॒ परा॑ सुव।
यद् भ॒द्रन्तन्न॒ऽआ सु॑व ॥ १ ॥ —यजुः० अ० ३०। मं० ३।
अर्थ—हे (सवितः) सकल जगत् के उत्पत्तिकर्त्ता, समग्र
ऐश्वर्ययुक्त, (देव) शुद्धस्वरूप, सब सुखों के दाता परमेश्वर!
आप कृपा करके (नः) हमारे (विश्वानि) सम्पूर्ण (दुरितानि)
दुर्गुण, दुर्व्यसन और दुःखों को (परा सुव) दूर कर दीजिए।
(यत्) जो (भद्रम्) कल्याणकारक गुण-कर्म-स्वभाव और
पदार्थ है, (तत्) वह सब हमको (आ सुव) प्राप्त कीजिए ॥ १ ॥
हिर॒ण्य॒गर्भः सम॑वर्त्त॒ताग्रे॑ भू॒तस्य॑ जा॒तः पति॒रेक॑ऽआसीत्।
स दा॑धार पृथि॒वीं द्यामु॒तेमां कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम ॥ २ ॥
—यजुः० अ० १३। मं० ४॥
अर्थ—जो (हिरण्यगर्भः) स्वप्रकाशस्वरूप और जिसने
प्रकाश करनेहारे सूर्य-चन्द्रमादि पदार्थ उत्पन्न करके धारण किये
हैं, जो (भूतस्य) उत्पन्न हुए सम्पूर्ण जगत् का (जातः) प्रसिद्ध
(पतिः) स्वामी (एकः) एक ही चेतनस्वरूप (आसीत्) था,
जो (अग्रे) सब जगत् के उत्पन्न होने से पूर्व (समवर्त्तत) वर्त्तमान
था, (सः) वह (इमाम्) इस (पृथिवीम्) भूमि (उत) और
(द्याम्) सूर्यादि को (दाधार) धारण कर रहा है। हम लोग
उस (कस्मै) सुखस्वरूप (देवाय) शुद्ध परमात्मा के लिए
(हविषा) ग्रहण करने योग्य योगाभ्यास और अतिप्रेम से
(विधेम) विशेष भक्ति किया करें ॥ २ ॥
यऽआ॑त्म॒दा ब॑ल॒दा यस्य॒ विश्व॑ऽउ॒पास॑ते प्र॒शिषं॒ यस्य॑ दे॒वाः।
यस्य॑ छा॒याऽमृतं॒ यस्य॑ मृ॒त्युः कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम ॥ ३ ॥
—यजुः० अ० २५। मं० १३॥

१० संस्कारविधिः
अर्थ—(यः) जो (आत्मदाः) आत्मज्ञान का दाता,
(बलदाः) शरीर, आत्मा और समाज के बल का देनेहारा,
(यस्य) जिसकी (विश्वे) सब (देवाः) विद्वान् लोग (उपासते)
उपासना करते हैं और (यस्य) जिसका (प्रशिषम्) प्रत्यक्ष
सत्यस्वरूप शासन और न्याय अर्थात् शिक्षा को मानते हैं,
(यस्य) जिसका (छाया) आश्रय ही (अमृतम्) मोक्षसुखदायक
है, (यस्य) जिसका न मानना अर्थात् भक्ति न करना ही (मृत्युः)
मृत्यु आदि दुःख का हेतु है, हम लोग उस (कस्मै) सुखस्वरूप
(देवाय) सकल ज्ञान के देनेहारे परमात्मा की प्राप्ति के लिए
(हविषा) आत्मा और अन्तःकरण से (विधेम) भक्ति अर्थात्
उसी की आज्ञा-पालन करने में तत्पर रहें॥३॥
यः प्रा॒ण॒तो नि॑मिष॒तो म॑हि॒त्वैक॒ इद्राजा॒ जग॑तो ब॒भूव॑।
यऽईशे॑ऽअ॒स्य द्वि॒पद॒श्चतु॑ष्पद॒ः कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम॥४॥
—यजुः० अ० २३। मं० ३॥
अर्थ—(यः) जो (प्राणतः) प्राणवाले और (निमिषतः)
अप्राणिरूप (जगतः) जगत् का (महित्वा) अपने अनन्त महिमा
से (एकः इत्) एक ही (राजा) विराजमान राजा (बभूव)
है, (यः) जो (अस्य) इस (द्विपदः) मनुष्यादि और (चतुष्पदः)
गौ आदि प्राणियों के शरीर की (ईशे) रचना करता है, हम
लोग उस (कस्मै) सुखस्वरूप (देवाय) सकलैश्वर्य के देनेहारे
परमात्मा की उपासना अर्थात् (हविषा) अपनी सकल उत्तम
सामग्री को उसकी आज्ञा-पालन में समर्पित करके (विधेम)
विशेष भक्ति करें॥४॥
येन॒ द्यौरु॒ग्रा पृ॑थि॒वी च॑ दृ॒ढा येन॒ स्व॑ स्तभि॒तं येन॒ नाक॑ः।
योऽअ॒न्तरि॑क्षे॒ रज॑सो वि॒मान॒ः कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम॥५॥
—यजुः० अ० ३२। मं० ६॥

ईश्वरस्तुतिप्रार्थनोपासना:
अर्थ—(येन) जिस परमात्मा ने (उग्रा) तं
(द्यौः) सूर्य आदि (च) और (पृथिवी) भूमि क...
(येन) जिस जगदीश्वर ने (स्वः) सुख को (स्तभितम्)
और (येन) जिस ईश्वर ने (नाकः) दुःखरहित मोक्ष को धारण
किया है, (यः) जो (अन्तरिक्षे) आकाश में (रजसः) सब
लोकलोकान्तरों को (विमानः) विशेष मानयुक्त, अर्थात् जैसे
आकाश में पक्षी उड़ते हैं, वैसे सब लोकों का निर्माण करता
और भ्रमण कराता है, हम लोग उस (कस्मै) सुखदायक
(देवाय) कामना करने के योग्य परब्रह्म की प्राप्ति के लिए
(हविषा) सब सामर्थ्य से (विधेम) विशेष भक्ति करें॥ ५ ॥
प्र॒जाप॑ते॒ न त्वदे॒तान्य॒न्यो विश्वा॑ जा॒तानि॒ परि॒ ता ब॑भूव।
यत्का॑मास्ते जुहु॒मस्तन्नो॑ऽअस्तु व॒यं स्या॑म॒ पत॑यो रयी॒णाम् ॥ ६ ॥
—ऋ० मं० १०। सू० १२१। मं० १०॥
अर्थ—हे (प्रजापते) सब प्रजा के स्वामी परमात्मन्!
(त्वत्) आपसे (अन्यः) भिन्न दूसरा कोई (ता) उन (एतानि)
इन (विश्वा) सब (जातानि) उत्पन्न हुए जड़-चेतनादिकों को
(न) नहीं (परि बभूव) तिरस्कार करता है, अर्थात् आप सर्वोपरि
हैं। (यत्कामाः) जिस-जिस पदार्थ की कामनावाले हम लोग
(ते) आपका (जुहुमः) आश्रय लेवें और वाञ्छा करें, (तत्)
उस-उसकी कामना (नः) हमारी सिद्ध (अस्तु) होवे। जिससे
(वयम्) हम लोग (रयीणाम्) धनैश्वर्यों के (पतयः) स्वामी
(स्याम) होवें॥ ६ ॥
स नो॑ ब॒न्धुर्जनि॑ता स वि॑धा॒ता धामा॑नि वेद् भुव॑नानि॒ विश्वा॑।
यत्र॑ दे॒वाऽअ॒मृत॑मानशा॒नास्तृ॒तीये॑ धाम॑न्न॒ध्यैर॑यन्त ॥ ७ ॥
—यजुः० अ० ३२। मं० १०॥
अर्थ—हे मनुष्यो! (सः) वह परमात्मा (नः) अपने लोगों

१० संस्कारविधिः
अर्थ—(यः) जो (आत्मदाः) आत्मज्ञान का दाता,
(बलदाः) शरीर, आत्मा और समाज के बल का देनेहारा,
(यस्य) जिसकी (विश्वे) सब (देवाः) विद्वान् लोग (उपासते)
उपासना करते हैं और (यस्य) जिसका (प्रशिषम्) प्रत्यक्ष
सत्यस्वरूप शासन और न्याय अर्थात् शिक्षा को मानते हैं,
(यस्य) जिसका (छाया) आश्रय ही (अमृतम्) मोक्षसुखदायक
है, (यस्य) जिसका न मानना अर्थात् भक्ति न करना ही (मृत्युः)
मृत्यु आदि दुःख का हेतु है, हम लोग उस (कस्मै) सुखस्वरूप
(देवाय) सकल ज्ञान के देनेहारे परमात्मा की प्राप्ति के लिए
(हविषा) आत्मा और अन्तःकरण से (विधेम) भक्ति अर्थात्
उसी की आज्ञा-पालन करने में तत्पर रहें॥ ३॥
यः प्रा॒ण॒तो नि॑मिष॒तो म॑हि॒त्वैक॒ इद्राजा॒ जग॑तो ब॒भूव॑।
यऽईशे॑ऽअ॒स्य द्वि॒पद॒श्चतु॑ष्पदः॒ कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम॥ ४॥
—यजुः० अ० २३। मं० ३॥
अर्थ—(यः) जो (प्राणतः) प्राणवाले और (निमिषतः)
अप्राणिरूप (जगतः) जगत् का (महित्वा) अपने अनन्त महिमा
से (एकः इत्) एक ही (राजा) विराजमान राजा (बभूव)
है, (यः) जो (अस्य) इस (द्विपदः) मनुष्यादि और (चतुष्पदः)
गौ आदि प्राणियों के शरीर की (ईशे) रचना करता है, हम
लोग उस (कस्मै) सुखस्वरूप (देवाय) सकलैश्वर्य के देनेहारे
परमात्मा की उपासना अर्थात् (हविषा) अपनी सकल उत्तम
सामग्री को उसकी आज्ञा-पालन में समर्पित करके (विधेम)
विशेष भक्ति करें॥ ४॥
येन॒ द्यौरु॒ग्रा पृ॑थि॒वी च॑ दृ॒ढा येन॒ स्व॑ स्तभि॒तं येन॒ नाकः॑।
योऽअ॒न्तरि॑क्षे रज॑सो वि॒मानः॒ कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम॥ ५॥
—यजुः० अ० ३२। मं० ६॥

ईश्वरस्तुतिप्रार्थनोपासना: ११
अर्थ—(येन) जिस परमात्मा ने (उग्रा) तीक्ष्ण स्वभाववाले
(द्यौः) सूर्य आदि (च) और (पृथिवी) भूमि को (दृढा) धारण,
(येन) जिस जगदीश्वर ने (स्वः) सुख को (स्तभितम्) धारण
और (येन) जिस ईश्वर ने (नाकः) दुःखरहित मोक्ष को धारण
किया है, (यः) जो (अन्तरिक्षे) आकाश में (रजसः) सब
लोकलोकान्तरों को (विमानः) विशेष मानयुक्त, अर्थात् जैसे
आकाश में पक्षी उड़ते हैं, वैसे सब लोकों का निर्माण करता
और भ्रमण कराता है, हम लोग उस (कस्मै) सुखदायक
(देवाय) कामना करने के योग्य परब्रह्म की प्राप्ति के लिए
(हविषा) सब सामर्थ्य से (विधेम) विशेष भक्ति करें॥५॥
प्रजा॑पते॒ न त्वदे॒तान्य॒न्यो विश्वा॑ जा॒तानि॒ परि॒ ता ब॑भूव।
यत्का॑मास्ते जुहु॒मस्तन्नो॑ऽअस्तु व॒यं स्या॑म॒ पत॑यो रयी॒णाम्॥६॥
—ऋ० मं० १०। सू० १२१। मं० १०॥
अर्थ—हे (प्रजापते) सब प्रजा के स्वामी परमात्मन्!
(त्वत्) आपसे (अन्यः) भिन्न दूसरा कोई (ता) उन (एतानि)
इन (विश्वा) सब (जातानि) उत्पन्न हुए जड़-चेतनादिकों को
(न) नहीं (परि बभूव) तिरस्कार करता है, अर्थात् आप सर्वोपरि
हैं। (यत्कामाः) जिस-जिस पदार्थ की कामनावाले हम लोग
(ते) आपका (जुहुमः) आश्रय लेवें और वाञ्छा करें, (तत्)
उस-उसकी कामना (नः) हमारी सिद्ध (अस्तु) होवे। जिससे
(वयम्) हम लोग (रयीणाम्) धनैश्वर्यों के (पतयः) स्वामी
(स्याम) होवें॥६॥
स नो॑ बन्धुर्जनि॒ता स वि॑धा॒ता धामा॑नि वे॒द भुव॑नानि॒ विश्वा॑।
यत्र॑ दे॒वाऽअ॒मृत॑मानशा॒नास्तृ॒तीये॑ धाम॑न्न॒ध्यैर॑यन्त ॥७॥
—यजुः० अ० ३२। मं० १०॥
अर्थ—हे मनुष्यो! (सः) वह परमात्मा (नः) अपने लोगों

१२ संस्कारविधिः
को (बन्धुः) भ्राता के समान सुखदायक, (जनिता) सकल
जगत् का उत्पादक, (सः) वह (विधाता) सब कामों का पूर्ण
करनेहारा, (विश्वा) सम्पूर्ण (भुवनानि) लोकमात्र और (धामानि)
नाम, स्थान, जन्मों को (वेद) जानता है, और (यत्र) जिस
(तृतीये) सांसारिक सुख-दुःख से रहित, नित्यानन्दयुक्त, (धामन्)
मोक्षस्वरूप, धारण करनेहारे परमात्मा में (अमृतम्) मोक्ष को
(आनशानाः) प्राप्त होके (देवाः) विद्वान् लोग (अध्यैरयन्त)
स्वेच्छापूर्वक विचरते हैं, वही परमात्मा अपना गुरु, आचार्य,
राजा और न्यायाधीश है। अपने लोग मिलके सदा उसकी भक्ति
किया करें ॥७॥
अग्ने॒ नय॑ सु॒पथा॑ रा॒येऽअ॒स्मान् विश्वा॑नि देव व॒युना॑नि वि॒द्वान्।
यु॒यो॒ध्यु॒स्मज्जु॑हुरा॒णमेनो॒ भूयि॑ष्ठां ते॒ नम॑ऽउक्तिं विधेम ॥८॥
—यजुः० अ० ४०। मं० १६॥
अर्थ—हे (अग्ने) स्वप्रकाश, ज्ञानस्वरूप, सब जगत् के
प्रकाश करनेहारे, (देव) सकल सुखदाता परमेश्वर! आप
जिससे (विद्वान्) सम्पूर्ण विद्यायुक्त हैं, कृपा करके (अस्मान्)
हम लोगों को (राये) विज्ञान वा राज्यादि ऐश्वर्य की प्राप्ति के
लिए (सुपथा) अच्छे, धर्मयुक्त, आप्त लोगों के मार्ग से
(विश्वानि) सम्पूर्ण (वयुनानि) प्रज्ञान और उत्तम कर्म (नय)
प्राप्त कराइए और (अस्मत्) हमसे (जुहुराणम्) कुटिलतायुक्त
(एनः) पापरूप कर्म को (युयोधि) दूर कीजिए। इस कारण
हम लोग (ते) आपकी (भूयिष्ठाम्) बहुत प्रकार की स्तुतिरूप
(नमः उक्तिम्) नम्रतापूर्वक प्रशंसा (विधेम) सदा किया करें
और सर्वदा आनन्द में रहें ॥८॥
॥ इतीश्वरस्तुतिप्रार्थनोपासनाप्रकरणम् ॥

अथ स्वस्तिवाचनम्
अ॒ग्निमी॑ळे पु॒रोहि॑तं य॒ज्ञस्य॑ दे॒वमृ॒त्विज॑म्।
होता॑रं रत्न॒धात॑मम्॥ १ ॥
स नः॑ पि॒तेव॑ सू॒नवेऽग्ने॑ सू॒पाय॒नो भ॑व।
सच॑स्वा नः स्व॒स्तये॑ ॥ २ ॥
—ऋ० मं० १ । सू० १ । मं० १, ९ ॥
स्व॒स्ति नो॑ मिमीताम॒श्विना॒ भग॑ः स्व॒स्ति दे॒व्य-
र्दि॑तिरन॒र्वण॑ः। स्व॒स्ति पू॒षा असु॑रो दधातु नः स्व॒स्ति
द्यावा॑पृथि॒वी सु॒चेतु॑ना ॥ ३ ॥
स्व॒स्तये॑ वा॒युमुप॑ ब्रवामहै॒ सोमं॑ स्व॒स्ति भुव॑नस्य॒
यस्पति॑ः। बृह॒स्पतिं॒ सर्व॑गणं स्व॒स्तये॑ स्व॒स्तय॑
आ॒दि॒त्यासो॑ भवन्तु नः॥ ४ ॥
विश्वे॑ दे॒वा नो॑ अ॒द्या स्व॒स्तये॑ वैश्वान॒रो वसु॑र॒ग्निः
स्व॒स्तये॑। दे॒वा अ॑वन्त्वृ॒भव॑ः स्व॒स्तये॑ स्व॒स्ति नो॑ रु॒द्रः
पा॒त्वंह॑सः ॥ ५ ॥
स्व॒स्ति मि॑त्रावरुणा स्व॒स्ति पंथ्ये रेवति। स्व॒स्ति न॒
इन्द्र॑श्चा॒ग्निश्च॑ स्व॒स्ति नो॑ अदिते कृधि॥ ६ ॥
स्व॒स्ति पन्था॒मनु॑ चरेम सूर्याचन्द्र॒मसा॑विव।
पु॒नर्द॑द॒ताघ्न॑ता जा॒न॒ता सं ग॑मेमहि॥ ७ ॥
—ऋ० मं० ५। सू० ५१। ११-१५ ॥

१४.
संस्कारविधिः
ये दे॒वानां॑ य॒ज्ञिया॑ य॒ज्ञिया॑नां॒ मनो॒र्यज॑त्रा अ॒मृता॑
ऋ॒त॒ज्ञाः। ते नो॒ रास॑न्तामुरुगा॒यम॒द्य यू॒यं पा॑त
स्व॒स्तिभिः॒ सदा॑ नः ॥८॥
—ऋ० मं० ७। सू० ३५। ६५॥
येभ्यो॑ मा॒ता मधु॑मत् पिन्व॑ते॒ पयः॑ पी॒यूषं॒ द्यौरदि॑-
तिरद्रि॑बर्हाः। उ॒क्थशु॑ष्मान् वृष॒भरान्त्स्वर्ज॑स॒स्ताँ
आ॑दि॒त्याँ अनु॑ मदा स्व॒स्तये॑ ॥९॥
नृ॒चक्ष॑सो॒ अनि॑मिषन्तो॒ अर्ह॑णा बृ॒हद् दे॒वासो॑
अ॒मृ॒त॒त्वमा॑नशुः। ज्योति॑रथा॒ अहि॑माया॒ अना॑गसो
दि॒वो वर्ष्माणं॑ वसते स्व॒स्तये॑ ॥१०॥
स॒म्राजो॒ ये सु॒वृधो॑ य॒ज्ञमा॑य॒युरप॑रिह्वता॒ दधि॑रे दि॒वि
क्षय॑म्। ताँ आ वि॑वास॒ नम॑सा सु॒वृक्तिभि॑र्म॒हो
आ॑दि॒त्याँ अदि॑तिं स्व॒स्तये॑ ॥११॥
को वः॒ स्तोमं॑ राधति॒ यं जुजो॑षथ॒ विश्वे॑ देवासो
मनुषो॒ यति॒ ष्ठन॑। को वो॑ऽध्व॒रं तु॑विजाता॒ अरं॑ कर॒द्यो
नः॒ पर्षदत्यंहः॒ स्व॒स्तये॑ ॥१२॥
येभ्यो॒ होतां॑ प्रथ॒मामा॑ये॒जे मनुः॑ स॒मिद्धा॒ग्निर्मन॑सा
स॒प्त होतृ॑भिः। त आ॑दि॒त्या अभ॑यं॒ शर्म॑ यच्छत सु॒गा
नः॑ कर्त सु॒पथा॑ स्व॒स्तये॑ ॥१३॥
य ईशि॑रे॒ भुव॑नस्य॒ प्रचे॑तसो॒ विश्व॑स्य स्था॒तुर्जग॑तश्च
मन्त॑वः। ते नः॑ कृ॒तादकृ॑ता॒देन॑स॒स्पर्र्य॒द्या दे॑वासः
पिपृता स्व॒स्तये॑ ॥१४॥

स्वस्तिवाचनम् १५
भरे॑ष्विन्द्रं॑ सु॒हवं॑ हवामहे॒ऽहो॒मुचं॑ सु॒कृतं॑ दैव्यं॑
जन॑म्। अ॒ग्निं मित्रं वरु॑णं सा॒तये॒ भगं॒ द्यावा॑पृथि॒वी
म॒रुतः॑ स्व॒स्तये॑ ॥ १५ ॥
सु॒त्रामा॑णं पृथि॒वीं द्यार्मनेहसं॑ सु॒शर्मा॑ण॒मदि॑तिं
सु॒प्रणी॑तिम्। दैवीं नावं॑ स्वरि॒त्रामना॑ग॒समस्र॑वन्ती॒मा
रु॑हेमा स्व॒स्तये॑ ॥ १६ ॥
विश्वे॑ यजत्रा॒ अधि॑ वोचतो॒तये॒ त्राय॑ध्वं नो दु॒रेवा॑या
अ॒भि॒ह्रुतः॑। स॒त्ययां॑ वो दे॒वहू॑त्या हुवेम शृण्व॒तो दे॑वा॒
अव॑से स्व॒स्तये॑ ॥ १७ ॥
अ॒पामी॑वा॒मप॒ विश्वा॒मना॑हुति॒मपारा॑तिं दु॒र्विद॑त्रा॒म-
घायु॒तः। आ॒रे दे॑वा॒ द्वेषो॑ अ॒स्मद् यु॑योतनो॒रु णः॒ शर्म॑
यच्छता स्व॒स्तये॑ ॥ १८ ॥
अ॒रि॒ष्टः स मत्तॊ॒ विश्व॒ एध॑ते॒ प्र प्र॒जाभि॑र्जायते॒
धर्म॑ण॒स्परि॑। यमा॑दित्यासो॒ नय॑था सु॒नी॒तिभि॒रति॒
विश्वा॑नि दु॒रिता स्व॒स्तये॑ ॥ १९ ॥
यं दे॑वा॒सोऽव॑थ॒ वाज॑सातौ॒ यं शूर॑साता मरुतो हि॒ते
धने॑। प्रात॒र्यावा॑णं॒ रथ॑मिन्द्र सा॒नुसि॑मरि॒ष्यन्त॒मा
रु॑हेमा स्व॒स्तये॑ ॥ २० ॥
स्व॒स्ति नः॑ प॒थ्या॑सु॒ धन्व॑सु स्व॒स्त्य१॑प्सु वृ॒जने॑
स्व॑र्वति। स्व॒स्ति नः॑ पु॒त्रकृ॒थेषु॒ योनि॑षु स्व॒स्ति रा॒ये
म॑रुतो दधातन ॥ २१ ॥

१६ संस्कारविधिः
स्व॒स्तिरिद्धि प्रप॒थे श्रेष्ठ॒ा रेक्ण॑स्वत्य॒भि या वा॒ममेति॑ ।
सा नौ अमा॒ सो अर॑णे॒ नि पा॑तु स्वावे॒शा भ॑वतु
दे॒वगो॑पा ॥ २२ ॥
—ऋ० मं० १० । सू० ६३ । [ मं० ३-१६ ]
इ॒षे त्वो॒र्जे त्वा॑ वा॒यव॑ स्थ दे॒वो व॑ः सवि॒ता प्रार्प॑यतु
श्रेष्ठ॑तमाय॒ कर्म॑ण॒ऽआप्या॑यध्वमघ्न्या॒ऽइन्द्रा॑य भा॒गं
प्र॒जाव॑तीरनमी॒वाऽअ॑य॒क्ष्मा मा व॑ स्ते॒नऽई॑शत॒
माघश॑ꣳसो ध्रुवाऽअ॒स्मिन् गोप॑तौ स्यात ब॒ह्वीर्यज॑मा-
नस्य प॒शून् पाहि॑ ॥ २३ ॥
—यजुः० अ० १ । मं० १
आ नो॑ भ॒द्राः क्रत॑वो यन्तु वि॒श्वतो॒ऽदब्धा॑सो॒ऽ-
अप॑रीतास॒ऽउद्भिदः॑ । दे॒वा नो॒ यथा॒ सद॒मिद् वृ॒धेऽ-
अस॒न्नप्रायुवो रक्षि॒तारो॑ दि॒वेदि॑वे ॥ २४ ॥
दे॒वानां॑ भ॒द्रा सु॑म॒तिर्ऋ॑जूय॒तां दे॒वाना॑ꣳ रा॒तिर॒भि नो॒
नि व॑र्तताम् । दे॒वाना॑ꣳ स॒ख्यमुप॑सेदिमा व॒यं दे॒वा
न॒ऽआयुः॒ प्रति॑रन्तु जी॒वसे॑ ॥ २५ ॥
तमीशा॑नं॒ जग॑तस्त॒स्थुष॒स्पतिं॑ धियञ्जि॒न्वमव॑से
हूमहे व॒यम् । पू॒षा नो॒ यथा॒ वेद॑सा॒मस॑द्वृ॒धे र॑क्षि॒ता
पा॒युरद॑ब्धः स्व॒स्तये॑ ॥ २६ ॥
स्व॒स्ति न॒ऽइन्द्रो॑ वृ॒द्धश्र॑वाः स्व॒स्ति नः॑ पू॒षा वि॒श्व-
वे॑दाः । स्व॒स्ति न॒स्तार्क्ष्यो॒ऽअरि॑ष्टनेमिः स्व॒स्ति नो॒
बृह॒स्पति॑र्दधातु ॥ २७ ॥