सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 98, कुल 192 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 98

( ६७ )
हैं, और इनका होना ही बन्धन का हेतु है। अब बुद्धि को
बिगाड़नेवाली अशक्तियों के भेद कहते हैं—
अशक्तिरष्टाविंशतिधातु ॥३८॥
अर्थ—अशक्ति अट्ठाईस प्रकार की है, वह प्रकार अब कहते
हैं। ग्यारह इन्द्रियों के विघात होजाने से ग्यारह प्रकार की, और
नौ प्रकार की तुष्टि, तथा आठ प्रकार की सिद्धि से बुद्धि का प्रति-
कूल होना—यह सब मिलकर अट्ठाईस प्रकार की बुद्धि अशक्ति
बुद्धि में होती है। इन्द्रियों का विघात इस तरह होता है, कि कान
से सुनाई न देना, त्वचा में कोढ़ का होजाना, आँखों से अंधा हो
जाना इत्यादि ग्यारह इन्द्रियों का विषय होना तथा तुष्टि आदि
के जो भेद जिस प्रकार कहे हैं, उनसे बुद्धि का विपरीत होना,
अशक्ति का लक्षण है। जब तक बुद्धि में अशक्ति नहीं होती, तब-
तक अज्ञान भी नहीं होता। अब तुष्टि के भेद कहते हैं—
तुष्टिर्नवधा ॥३६॥
अर्थ—तुष्टि नौ प्रकार की है। इसका भिन्न-भिन्न प्रत्यक्ष
आचार्य आगे के सूत्रों में आप ही करेंगे। अतः यहाँ व्याख्या
लिखना व्यर्थ है।
सिद्धिरष्टधा ॥४०॥
अर्थ—सिद्धि आठ प्रकार की है, इसका प्रत्यक्ष भी आगे
लिखेंगे। अब पूर्व कहे हुए विपर्यय, अशक्ति, तुष्टि और सिद्धि
के भेदों की व्याख्या आगे के चार सूत्रों में करेंगे।
अवान्तरभेदाः पूर्ववत् ॥४१॥
अर्थ—विपर्यय अर्थात् मिथ्या ज्ञान के अवान्तर भेद जो
सामान्य रीति से पूर्वाचार्यों ने किये हैं, उनको उसी तरह समझना