सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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चाहिये, यहाँ विस्तारभय से नहीं कहे गये। अविद्यादिकों के
जितने भेद हैं, उनकी विशेष व्याख्या विस्तारभय के कारण छोड़
दी है। यदि कहे जावें तो कारिकाकार ने अविद्या के बासठ
भेद माने हैं, जिसमें आठ-आठ प्रकार का तम और मोह, दश
प्रकार का महामोह, अठारह प्रकार का तामिस्र और अठारह ही
प्रकार का अन्धता मिश्र—यह सब मिलकर बासठ प्रकार के हुए।
यदि इतने प्रकार के भेदों की भिन्न-भिन्न व्याख्या की जावै, तो
बड़ा भारी दफ़्तर भरने को चाहिये, लेकिन हमारे विचार से इतने
भेद मानना और उनकी व्याख्या करना केवल झगड़ा ही है।
एवमितरस्याः ॥४२॥
इसी प्रकार अशक्ति के भेद भी पूर्वाचार्यों के कथना-
नुसार समझने चाहियें।
आध्यात्मिकादिभेदान्नवधा तुष्टिः ॥४३॥
अर्थ—प्रकृति, उपादान, काल, भाग्य—यह चार प्रकार के
भेद होने से आध्यात्मिक तुष्टि कहलाती है, और पाँच प्रकार
की बाह्य विषयों से उपराम को प्राप्त होनेवाली तुष्टि है।
एवम् आध्यात्मिकादि भेदों के होने से नौ प्रकार से है, कि
जो कुछ दीखता है, वह सब प्रकृति का ही परिणाम है, और
उसको प्रकृति ही करती है। मैं कूटस्थ हूँ—ऐसी प्रकृति के संबन्ध
में बुद्धि होने का नाम प्रकृति तुष्टि है, और जो संन्यासी
होकर आश्रम ग्रहण रूपी उपादान से तुष्ट मानते हैं, वह
उपादान तुष्टि है। जो संन्यासी होकर भी समाधि आदि
अनुष्ठानों से बहुत समय में तुष्टि मानते हैं उसे काल तुष्टि कहते
हैं, और उसके बाद धर्ममेघ समाधि में जो तुष्टि होती है, उसे भाग्य-
तुष्टि कहते हैं। बाह्य पांच प्रकार की तुष्टि इस तरह है कि माला,
चन्दन, वनिता ( स्त्री ) आदि के प्राप्त करने में दुःख उत्पन्न होगा,