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सर्वकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 97, कुल 192 में से

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पृष्ठ 97

( ६६ )
प्र०- यम किसको कहते हैं ?
उ०- अहिंसा ( जीव का न मारना ) सत्य, अस्तेय ( चोरी
न करना ), ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह ( विषयों से बचना ); इनका
नाम यम है ।
प्र०- नियम किसको कहते हैं ?
उ०- शुद्धि, सन्तुष्ट रहना, अपने कर्मों का अनुष्ठान करना,
वेदादि का पढ़ना, ईश्वरभक्ति; इसको नियम कहते हैं ।
प्र०- प्रत्याहार किसको कहते हैं ?
उ०- जिसमें चित्त इन्द्रियों सहित अपने विषय को त्याग कर
ध्यानावस्थित होजाय, उसको प्रत्याहार कहते हैं ॥
वैराग्यादभ्यासाच्च ॥३६॥
अर्थ- सांसारिक पदार्थों के विराग अथवा धारणादि
पूर्वोक्त तीन साधनों के अभ्यास से ज्ञान प्राप्त होता है । यहाँ चकार
का अर्थ पूर्वार्थ का समुच्चय और आरम्भित जो "ज्ञानान्मुक्तिः"
इस विषय के प्रतिपादन की समाप्ति के वास्ते है । इससे आगे
"बन्धो विपर्ययात्" इसपर विचार आरम्भ करते हैं—
विपर्ययभेदाः पंच ॥३७॥
अर्थ- अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश, यह
पाँच योगशास्त्रों में कहे हुए बन्ध के हेतु विपर्यय ( मिथ्या
ज्ञान ) के अवान्तर भेद हैं । अनित्य, अशुचि, दुःख और अनात्म
में नित्य, शुचि, सुख और आत्मबुद्धि करने का नाम अविद्या है।
जिसमें आत्मा और अनात्मा की एकता मालूम होवे, जैसे—शरीर
के अतिरिक्त और कोई आत्मा नहीं, ऐसी बुद्धि का होना
अस्मिता है—राग और द्वेष के तो लक्षण प्रसिद्ध ही हैं । मृत्यु से
डरने का नाम अभिनिवेश है, यह पाँचों बातें बद्ध जीव में होती