सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 73, कुल 192 में से
संदर्भ में पढ़ें( ७२ )
कार्य प्रकृति के सिवाय और किसका हो सकता है ? यदि पुरुष
का कहें तो पुरुष में परिणामित्व की प्राप्ति आती है, और यदि
प्रकृति कान कहें तो किसका—यह सन्देह पैदा होता है ? इस
कारण प्रकृति ही को वास्तव में कारणत्व है और जो सृष्टि के
अनित्यत्व में स्वप्न का दृष्टान्त देते हैं, सो भी ठीक नहीं ; क्योंकि
स्वप्न भी अपनी अवस्था में सत्य ही होता है। इस कारण सृष्टि
नित्य है, और उसका कारण भी नित्य है ।
प्र०—प्रकृति अपने मोक्ष के वास्ते सृष्टि करने में क्यों
तैयार होती है ?
उ०—चेतनोद्देशान्नियमः कण्टकमोक्षवत् ॥ ७ ॥
अर्थ—विवेकी पुरुष के लिए प्रकृति का यह नियम है कि
वह प्रक्रित विवेकी पुरुष के द्वारा अपना मोक्ष करे, जैसे—
ज्ञानवान् पुरुष बड़ी बुद्धिमानी के साथ काँटे से काँटे को निकालता
है, उसका ही सहारा और अज्ञानी मनुष्य भी लेते हैं ; इस तरह
से प्रकृति को भी जानना चाहिये ।
प्र०—पुरुष में कारणत्व का होना गिनने ही मात्र कहा है
सो ठीक नहीं है, क्योंकि प्रकृति के मेल से पुरुष भी महदादिकों
के परिणाम को धारण कर लेता है, जैसे—काठ जमीन के ही
समान हो जाता है, उसी तरह पुरुष को भी होना चाहिये ?
उ०—अन्ययोगेऽपितत्सिद्धिर्नाञ्जस्ये नायोदा-
हवत् ॥ ८ ॥
अर्थ—प्रकृति के साथ पुरुष का योग होने पर भी पुरुष
वास्तव में सृष्टि का कारण नहीं हो सकता, यह प्रत्यक्ष ही है, जैसे—
लोहे और अग्नि के संयोग होने पर लोहा अग्नि नहीं हो
सकता । यद्यपि इस दृष्टांत से दोनों में परिणामित्व हो सकता