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सर्वकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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( ६६ )
द्वितीयोऽध्यायः
शास्त्र का तो विषय निरूपण कर चुके, अब पुरुष को अपरि-
माणित्व ठहराने के वास्ते प्रकृति से सृष्टि का होना, विस्तार से
द्वितीयोऽध्याय में कहेंगे और इसही दूसरे अध्याय में प्रधान के
जो कार्य हैं, उनके स्वरूप को भी विस्तार से कहना है ; क्योंकि
प्रकृति के कार्यों से पुरुष का ज्ञान अच्छी तरह से होता है।
कारण यह है, कि प्रकृति के कार्यों के बिना ज्ञान हुए मुक्ति
किसी प्रकार नहीं हो सकती, अर्थात् जब तक पुरुष, प्रकृति
और प्रकृति के कार्य, इन तीनों का अच्छी तरह ज्ञान नहीं हो
सकता तबतक मुक्ति भी न होगी; किन्तु उनके जानने ही से
मुक्ति होती है।
प्र०--अपरिमाणित्व किसको कहते हैं ?
उ०--जो परिमाण को प्राप्त न हो।
यदि अचेतन प्रकृति निष्प्रयोजन सृष्टि को उत्पन्न करती है,
तो मुक्त को भी बन्ध की प्राप्ति हो सकती है। इस आशय को
विचार करके सृष्टि के उत्पन्न होने का प्रयोजन इस सूत्र में
कहते हैं।
विमुक्तमोक्षार्थं स्वार्थं वाप्रधानस्य ॥ १ ॥
अर्थ—पुरुष में जो अहंकार के संबन्ध से दुःख मालूम
पड़ता है, उसकी मुक्ति के वास्ते अथवा स्वार्थ अर्थात् पुरुष के
सम्बन्ध से जो मन आदि को दुःख होते हैं, उनके दूर करने
के लिये प्रधान अर्थात् प्रकृति को कर्तृत्व है, और इस सूत्र में
कर्तृत्व शब्द पहिले सूत्र से लाया गया है।