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सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 69, कुल 192 में से

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पृष्ठ 69

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अयोग्यता है कि जो दोष कपिलाचार्य को अपने कहे हुये विशेषणों
से दीखे, उनके दुरुस्त करने के लिये "साक्षात् सम्बन्धात्
साक्षित्त्वम्" यह सूत्र फिर कहा, इसी प्रकार "नित्य मुक्तत्वम्"
और "औदार्य सीत्वम्," यह दो तरह के दोष आवेंगे, उनका;
समाधान इस अध्याय के अन्तिम से सिद्ध कर दिया गया है,
इस ही कारण "नित्य मुक्तत्वम्" और "औदार्य सीन्यज्योति,"
यह दोनों सूत्र दोष के दिखानेवाले हैं।
औदासीन्यज्योति ॥ १६३ ॥
अर्थ—और पुरुष को वास्तव में मुक्त मानैं तो औदासीन्य
दोष होगा, क्योंकि पुरुष का किसी से सम्बन्ध ही नहीं है,
तो वह किसी कर्म का कर्त्ता क्यों होगा। जब किसी कर्म का कर्त्ता
तो रहा ही नहीं तो बन्धन आदि में क्यों पड़ेगा, तब उसमें
औदासीन्य दोष होगा। इस सूत्र का भाव और पुरुष को कर्त्तृत्व
अगले सूत्र से प्रतिपादन करेंगे।
प्र०—"औदासीन्यज्योति" इस सूत्र में 'इति' शब्द क्यों है ?
उ०—यह इस वास्ते है, कि पुरुष की सिद्धि में दोष आदि
का खण्डन कर चुके।
उपरागात्कर्त्तृत्वंचित्सान्निध्यात् चित्सान्नि-
ध्यात् ॥ १६४ ॥
अर्थ—पुरुष में जो कर्त्तृत्व है, सो मन के उपराग से है,
और मन में जो चित्-शक्ति है, वह पुरुष के संसर्ग से है। यहाँ-
पर जो "चित्सान्निध्यात्" यह दो बार कहा है सो अध्याय की
समाप्ति का जतानेवाला है और इस अध्याय में शास्त्र के मुख्य
चार ही अर्थ कहे गये हैं "हेय" त्यागने के लायक, "हान"
त्यागना। "हेय" और "हान" और इन दोनों के हेतु।
इति सांख्यदर्शने प्रथमोऽध्यायः समाप्तः।