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सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 71, कुल 192 में से

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पृष्ठ 71

( ७० )
प्र०—यदि मोक्ष के वास्ते ही सृष्टि होती है, तो एक बार की
ही सृष्टि से सब पुरुषों को मोक्ष हो जाता, बारम्बार सृष्टि के
होने का क्या कारण है ?
उ०—विरक्तस्य तत्सिद्धेः ॥ २ ॥
अर्थ—एक बार की सृष्टि से मोक्ष नहीं होता, किन्तु बहुत
से जन्म, मरण, व्याधि आदि नाना प्रकार के [ सैकड़ों ] दुःखों से
अत्यन्त [ बहुत ] तप्त [ दुःखित ] होने पर जब प्रकृति पुरुष
का ज्ञान पैदा होता है तब वैराग्य द्वारा मोक्ष होता है और वह
वैराग्य एक बार की सृष्टि से आजतक किसी को उत्पन्न नहीं
हुआ। इसमें यह सूत्र प्रमाण है—
न श्रवणमात्रात् तत्सिद्धिरनादिवासनाया बल-
वत्वात् ॥ ३ ॥
अर्थ—मुक्ति श्रवणमात्र से भी नहीं हो सकती । यद्यपि
श्रवण भी बहुत जन्मों के पुण्यों से होता है तथापि श्रवणमात्र
से वैराग्य की सिद्धि भी नहीं होती है, किन्तु विवेक के साक्षात्कार
से मुक्ति होती है और साक्षात्कार शीघ्र नहीं होता । अनादि
मिथ्यावासना के बलवान् होने से और उस वासना के रहते हुए
पुरुष मुक्त नहीं हो सकता, किन्तु योग से जो विवेक साक्षात्कार
होता है। उसके ही द्वारा मुक्त होता है और इस योग में सैकड़ों
विघ्न पैदा हो जाते हैं। इस कारण यह योग भी बहुत जन्मों
में सिद्ध होता है। इस कारण जन्मान्तर में वैराग्य को प्राप्त
होकर किसी समय में कोई-कोई पुरुष मोक्ष को प्राप्त हो जाते
हैं, किन्तु सब मोक्ष को नहीं प्राप्त होते।
प्र०—सृष्टि का प्रवाह (जन्म, मरण आदि) किस तरह
चल रहा है ?