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सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 68, कुल 192 में से

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अभाव है, तो पुरुष सदा एक रूप रहता है, यह कहना भी
असंगत हुआ ?
उ०—साक्षात् संबंधात् साक्षित्त्वम् ॥ १६१ ॥
अर्थ—पुरुष को जो साक्षित्व कहा है, वह मन आदि के
साथ साक्षात् सम्बन्ध में कहा है, किन्तु वास्तव में पुरुष साक्षी
नहीं है ; क्योंकि पाणिनिमुनि ने साक्षी शब्द का ऐसा अर्थ किया
है “साक्षाद्द्रष्टिर संज्ञायाम्” । इस सूत्र से साक्षी शब्द निपातन
किया है, कि जितने समय में निरन्तर देखता है उतने ही समय
में उसकी साक्षी संज्ञा है। इससे यह सिद्ध होता है, कि जितने
समय तक पुरुष का मन से सम्बन्ध रहता है, उतने ही समय
तक पुरुष की साक्षी संज्ञा रहती है, अथवा मन के संसर्ग ( मेल )
से पुरुष में दुःख-सुख आदि को माना जाय, तो पुरुष को वास्तव
में दुःखादि से मुक्त होने में यह दोष होगा कि—
नित्यमुक्तत्वम् ॥ १६२ ॥
अर्थ—यदि पुरुष को नित्यमुक्त मानें, तो मुक्ति का साधन
करना व्यर्थ होता है, और मुक्ति प्रतिपादक जो श्रुतियाँ हैं उन-
में भी दोषारोपण होगा, और इस सूत्र के अर्थ में जो विज्ञान-
भिक्षु ने ( नित्यमुक्तत्वम् ) यह पुरुष को विशेषण दिया है,
अर्थात् पुरुष को नित्य मुक्त माना है । यह कथन इस कारण
अयोग्य है, कि “इदानीमिव सर्वत्र नात्यन्तोच्छेदः” । इस सूत्र से
पुरुष का अनित्य मुक्त कपिलाचार्य ने मानी है । इससे यहाँ विरोध
होगा । उन टीकाकारों ने यह न सोचा, क्या उन ऋषियों की
बुद्धि मनुष्यों की बुद्धि की तरह क्षणिक होती है, कि कभी कुछ
कहें, कभी कुछ कहें, जबकि उक्त सूत्र “इदानीमित्यादि” से पुरुष
को अनित्य मुक्त प्रतिपादन कर चुके, फिर नित्य-मुक्त कैसे कह
सकते हैं और पूर्वोक्त टीकाकार के कथन में इस कारण से भी