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सर्वकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 67, कुल 192 में से

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पृष्ठ 67

( ६६ )
वामदेवादिर्मुक्को नाद्वैतम् ॥ १५७ ॥
अर्थ—यद्यपि वामदेवादिक मुक्त होगये, लेकिन अद्वैत
स्वरूप तो नहीं हुये ; क्योंकि यदि मुक्त जीव सब ही अद्वैतस्वरूप
हो जाते तो आजतक सहज-सहज सब पुरुष अद्वैत होकर पुरुष
का नाममात्र भी न रहता ।
प्र०—वामदेवादिकों का परम मोक्ष नहीं हुआ ?
उ०—अनादावद्ययावदभावाद्भविष्यदप्येवम्।१५८
अर्थ—अनादि-काल से लेकर आजतक जो बात नहीं हुई
है वह भविष्यत्-काल में भी न होगी, यही नियम है। इससे यह
सिद्ध होता है, कि अनादि-काल से लेकर आजतक कोई भी
पुरुष मुक्त होकर ब्रह्म नहीं हुआ ; क्योंकि पुरुषों की संख्या
कमती देखने में नहीं आती, और नई पुरुषों की उत्पत्ति मानी
नहीं गई है, तो भविष्यत्-काल में भी ऐसा ही होगा। अब मोक्ष
के विषय में सांख्यकार अपना सिद्धान्त ( निश्चय ) कहते हैं।
इदानीमिव सर्वत्र नात्यन्तोच्छेदः ॥ १५६ ॥
अर्थ—इस वर्त्तमान-काल के दृष्टान्त से यह जानना चाहिये
कि पुरुष के बन्धन का किसी समय में भी अत्यन्त उच्छेद नहीं
हो सकता। इसका मतलब यह है, कि कोई भी पुरुष ऐसा मुक्त
नहीं है, कि फिर उसका कभी बन्धन न हो सके और इससे यह
भी मालूम होता है, कि मुक्त पुरुष का फिर भी जन्म होता है।
प्र०—मोक्ष का क्या स्वरूप है ?
उ०—व्यावृत्तोभयरूपः ॥ १६० ॥
अर्थ—मुक्ति संसार के दुःख-सुख दोनों ही से विलक्षण है,
अर्थात् मुक्ति में पुरुष को शान्त सुख होता है, यह स्वरूप है।
प्र०—जबकि पुरुष को साक्षी कह चुके वह साक्षीपन
मोक्ष समय में नहीं रह सकता ; क्योंकि वहां मनादि का