सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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अर्थ—जैसे औषधियों की सिद्धि होती है अर्थात् एक-एक
औषध से अनेक रोगों की शान्ति होती है, इसी तरह योग की
सिद्धियों को भी जानना चाहिये । कपिलाचार्य पुरुष को चैतन्य
मानते हैं, अतएव जो पृथिवी आदि भूतों को चैतन्य मानते हैं
उनके मत को दोषयुक्त ठहरा कर अध्याय को समाप्त करते हैं ।
न भूतचैतन्यं प्रत्येकादृष्टेः सांहत्येऽपि च सांह-
त्येऽपि च ॥ १२६ ॥
अर्थ—मिलने पर भी भूतों में चैतन्य नहीं हो सकता । यदि
उनमें चेतनता होती तो उनके अलग-अलग होने पर भी दीखती ;
किन्तु पृथक् होने पर उनको जड़ दीखते हैं तो चेतन कैसे मानें ?
“सांहत्येपि च” ऐसा दो बार कहना अध्याय की समाप्ति का
सूचक है ।
इति सांख्यदर्शने पञ्चमोऽध्यायः समाप्तः ।
षष्ठोऽध्याय
पहिले पांच अध्यायों में महर्षि कपिलजी ने अनेक प्रकार
के प्रमाण और युक्तियों से अनेक मत का प्रतिपादन और अन्य
मतों का खण्डन किया । अब इस अन्त के छठे अध्याय में अपने
सिद्धान्त को बहुत सरल रीति पर कहेंगे कि जिससे इस दर्शन-
शास्त्र का सार बिना प्रयास अर्थात् थोड़ी मेहनत से ही समझ
में आसके और जो बातें पहिले अध्यायों में कह आये हैं अब