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सर्वकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 176, कुल 192 में से

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पृष्ठ 176

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उन बातों को ही साररूप से कहेंगे कि जिससे इस दर्शन का
सम्पूर्ण सार साधारण मनुष्यों की समझ में भी आजाया करे
( या आजावे ) ; इसलिये उन बातों का पुनः कहना पुनरुक्ति
नहीं हो सकता है ।
अस्त्यात्मा नास्तित्वसाधनाभावात् ॥ १ ॥
अर्थ—आत्मा कोई पदार्थ अवश्य है, क्योंकि न होने में कोई
प्रमाण नहीं दीखता ।
देहादिव्यतिरिक्तोऽसौ वैचित्र्यात् ॥ २ ॥
अर्थ—आत्मा देहादिकों से भिन्न पदार्थ है, क्योंकि उस
आत्मा में विचित्रता है ।
षष्ठीव्यपदेशादपि ॥ ३ ॥
अर्थ—मेरा यह शरीर है, इस षष्ठीव्यपदेश से भी आत्मा
का देह से भिन्न पदार्थ होना सिद्ध है । यदि देहादिक ही आत्मा
होते तो मेरा यह शरीर है ऐसा कहना नहीं हो सकता था । ऐसे
कहने से ही प्रतीत होता है कि 'मेरा यह' कोई और वस्तु है, यह
शरीर कोई और पदार्थ है, एक नहीं ।
न शिलापुत्रवद्धर्मिग्राहकमानबाधात् ॥ ४ ॥
अर्थ—शिला के पुत्र का शरीर है, इस प्रकार यदि षष्ठी का
अर्थ किया जावे तो भी ठीक नहीं हो सकता, क्योंकि धर्मिग्राहक
अनुमान से बाध की प्राप्ति आती है । ( भाव इसका यह है कि )
यदि ऐसा कहा जाय कि पत्थर का पुत्र अर्थात् जो पत्थर है वही
पत्थर का पुत्र है, इसमें कोई भी भेद नहीं दीखता । इसी
प्रकार जो आत्मा है वही शरीर है, ऐसा यदि षष्ठी का अर्थ किया
जावे तो भी ठीक नहीं हो सकता ; क्योंकि ऐसा कोई प्रमाण