सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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अतिरिक्त और सब उपभोग-देह अर्थात् भोग्य योनि हैं ; इसलिये
उनको धर्म्माधर्म का विधान नहीं है ।
न किञ्चिदप्यनुशयिनः ॥ १२५ ॥
अर्थ—जो मुक्त हो गया है उसके वास्ते कोई भी विधान
नहीं है, और न उसको किसी विशेष नाम से कह सकते हैं ।
प्र०—जीव को इस शास्त्र में नित्य माना है तो उस जीव
के आश्रय में रहनेवाली बुद्धि को भी नित्य मानना चाहिये ?
उ०—न बुद्ध्यादि नित्यत्वमाश्रय विशेषेऽपि-
वहित् ॥ १२६ ॥
अर्थ—यद्यपि बुद्धियादि का आश्रय जीव नित्य है तो भी
बुद्धि आदि नित्य नहीं हैं ; जैसे चंदन का काठ शीत प्रकृतिवाला
होता है परन्तु आग के संयोग होने पर उसकी शीतलता आग
में नहीं हो सकती ।
आश्रयासिद्धेश्च ॥ १२७ ॥
अर्थ—जीव बुद्धि का आश्रय हो ही नहीं सकता। इनका
संबंध इस तरह है, जैसे स्फटिक और फूल का है ; इसवास्ते
प्रतिविम्ब कहना चाहिये, आश्रय नहीं । इस विषय पर यह सन्देह
होता है कि आचार्य योग की सिद्धियों को सच्ची मानते हैं और
उनके द्वारा मुक्ति को भी मानते हैं ; परन्तु योग की ऐसी भी
सैकड़ों सिद्धियाँ हैं जो समझ में नहीं आतीं । इस विषय पर
आचार्य आप ही कहते हैं ।
योगसिद्धयोऽप्यौषधादि सिद्धिवन्नापलप-
नीयाः ॥ १२८ ॥