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सर्वकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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पृष्ठ 173

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उ०—स्मृतेश्च ॥ १२२ ॥
अर्थ—"शरीरजैः कर्म दोषैर्याति स्थावरतां नरः” शरीर से
पैदा हुए कर्म के दोषों से मनुष्य स्थावर योनि को प्राप्त होता
है, इस बात को स्मृतियां कहती हैं। इससे सिद्ध होता है कि स्थावर
भी शरीर है ?
प्र०—जब कि वृक्षादिकों को भी शरीरधारी मानते हो तो
उनमें धर्माधर्म मानने चाहियें ?
उ०—न देहमात्रतः कर्माधिकारित्वं वैशिष्ट्य-
श्रुतेः ॥ १२३ ॥
अर्थ—देहधारी-मात्र को शुभाशुभ कर्मों का अधिकार नहीं
दिया गया है, किन्तु श्रुतिओं ने मनुष्य जाति को ही धर्माधर्म का
अधिकार प्रतिपादन किया है। देह के भेद से ही कर्म-भेद है,
इस बात को आगे के सूत्र से सिद्ध करते हैं।
त्रिधा त्रयाणां व्यवस्था कर्मदेहोपभोगदेहो-
भयदेहाः ॥ १२४ ॥
अर्थ—उत्तम, मध्यम, अधम, इन तीन तरह के शरीरों की
तीन व्यवस्था हैं और उनके वास्ते ही धर्म आदि अधिकार हैं।
एक कर्म-देह जो सिर्फ कर्मों के करते-करते ही पूरा हो जाय,
जैसे अनेक ऋषि-मुनियों का जन्म तप के करने ही में पूरा
हो जाता है। दूसरा उपभोग-देह, जैसे अनेक पशु-पक्षि, कीटादि
का शरीर कर्मफल भोगते-भोगते ही पूरा हो जाता है । तीसरा
उभय-देह है, जिसने कर्म भी किये हों और भोग भी भोगे हों,
जैसे सामान्य मनुष्यों का शरीर। केवल दो प्रकार के देहों के
लिये कर्म की विधि है, भोग्य-योनि के वास्ते नहीं। मनुष्य के