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सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 172, कुल 192 में से

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पृष्ठ 172

( १७१ )
उ०—वृक्ष में जीव नहीं है किंतु यहां वृक्ष में रहने वाले
जीव से अभिप्राय है, क्योंकि गूलर आदि के फलों में जो जीव
रहते हैं उनको बाहर के पदार्थों से कुछ सम्बन्ध नहीं होता।
प्र०—यदि वृक्ष में जीव न हो तो वह बढ़ नहीं सकता ?
उ०—बढ़ना, घटना जीव का धर्म नहीं प्रकृति का धर्म है ;
क्योंकि संयोग से चीजें बढ़तीं और वियोग से घटती हैं, यहाँ
तक कि पत्थर और पहाड़ भी बढ़ते हैं।
प्र०—जिनमें जीव है वे अंदर से बढ़ते हैं और जिनमें नहीं
वे बाहर से बढ़ते हैं। चूँकि वृक्ष अंदर से बढ़ते हैं इसवास्ते इनमें
जीव मानना चाहिये ?
उ०—यह कोई नियम नहीं कि जो अंदर से बढ़ते हैं उनमें
अवश्य जीव हो, किन्तु जो चीज़ आग के सबब से बढ़ती है
वह अन्दर से बढ़ती है, और जो पानी के सबब से बढ़ती है वह
बाहर से बढ़ती है।
प्र०—अंदर से बढ़ने वाली चीज़ नज़र नहीं आती ?
उ०—चने जब उबाले जाते हैं तब अंदर से बढ़ते हैं, यहां-
तक कि पहले से दूने बढ़ जाते हैं।
प्र०—वृक्ष में जीव मानने से क्या सन्देह उत्पन्न होते हैं ?
उ०—पहले तो यह सन्देह होगा कि एक वृक्ष में जितने
फल हैं उन सब में एक जीव है या बहुत से जीव हैं। यदि कहो
कि एक जीव है तो बीज के टूटने से उससे वृक्ष पैदा नहीं हो
सकता और यदि बहुत जीव हैं तो एक शरीर के अभिमानी
बहुत से जीव नहीं हो सकते।
प्र०—जड़ पदार्थों के सदृश बाहरी ज्ञान से पृथक् हो जाता
है उसमें क्या प्रमाण है ?