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सर्वकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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पृष्ठ 171

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उस जीव के प्राण धारणरूपी क्रिया को दूर कर देता है वा जुदी-
जुदी क्रियाओं के वास्ते जुदे-जुदे संस्कार होते हैं ?
उ०—एकः संस्कारः क्रियानिर्वर्तको नतु
प्रतिक्रियं संस्कारभेदा बहुकल्पनाप्रसक्तेः ॥१२०॥
अर्थ—जिस संस्कार से शरीर का कार्य चल रहा है वह
एक ही संस्कार निवृत्त होकर शारीरिक क्रियाओं को भी दूर कर
देता है। हर एक क्रिया के वास्ते अलग-अलग संस्कार नहीं
मानने चाहियें, क्योंकि बहुत से संस्कार हो जायेंगे और उन
बहुत से संस्कारों का होना व्यर्थ है।
प्र०—सुषुप्ति अवस्था में बाह्य पदार्थों का ज्ञान नहीं होता,
इस कारण उस दशा में शरीर को भोगायतन मानना ठीक नहीं।
उ०—न बाह्यबुद्धिनियमो वृक्षगुल्मलताौषधि-
वनस्पतितृणवीरुधादीनामपि भोक्तृभोगायतनत्वं
पूर्ववत् ॥१२१॥
अर्थ—जिसमें बाह्य बुद्धि होती है उसको शरीर कहते हैं,
यह नियम भी नहीं है ; क्योंकि मृतक शरीर में बाह्य बुद्धि नहीं
होती है तो क्या उसको शरीर नहीं कह सकते हैं। और
वृक्ष, गुल्म, ओषधि, वनस्पति, तृण, वीरुध आदिकों में बहुत से
जीव भोग के निमित्त रहते हैं और उनका बाहर के पदार्थों से
कुछ भी सम्बन्ध नहीं रहता, यदि बाहर के पदार्थों के ज्ञान
से ही शरीर माना जावे तो उनके शरीर को शरोर न मानना
चाहिये।
प्र०—क्या वृक्ष में जीव है कि नहीं ?