सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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प्र०—सृष्टि कितने प्रकार की है ?
उ०—छः प्रकार की, देखो—
ऊष्मजाण्डजजरायुजोद्भिज्जसांकल्पिक सांसि-
द्धिकंचेति न नियमः ॥ १११ ॥
अर्थ—( १ ) ऊष्मज (जो पसीने से पैदा होते हैं, जैसे लीख
आदि ) ; अण्डज ( जो अण्डे से पैदा होते हैं, जैसे मुर्गी आदि );
( ३ ) जरायुज (जो झिल्ली से पैदा होते हैं, मनुष्य आदि); ( ४ )
उद्भिज (जो जमीन को फोड़कर पैदा होते हैं, पेड़ आदि) ; ( ५ )
सांकल्पिक ( जैसे सृष्टि के आदि में बिना माता-पिता के देवऋषि
पैदा होते हैं ; ( ६ ) सांसिद्धिक ( जैसे खान में धातु बनते हैं ) ।
आचार्य ( कपिलजी ) ने यही छः प्रकार की सृष्टि मानी है ;
लेकिन इन छः प्रकार के सिवाय और किसी तरह की सृष्टि नहीं
है, ऐसा नियम भी नहीं ; क्योंकि शायद किसी दशा में भूतों की
सृष्टि इनसे अन्य प्रकार की हो । आचार्य के निश्चय ( तहक़ी-
क़ात से तो छः ही प्रकार की सृष्टि देखने में आती है ।
सर्वेषु पृथिव्युपादानमसाधारणत्वात् तद्व्यप-
देशः पूर्ववत् ॥ ११२ ॥
अर्थ—इन सब प्रकार की सृष्टियों का साधारण उपादान
कारण पृथिवी है, इसलिये इनको पार्थिव कहना योग्य है, और
जो पांचभूतों का व्यपदेश ( नाम ) सुना जाता है वह पूर्व-
कथन ( पहिले कहा हुआ ) के समान समझना चाहिये अर्थात्
मुख्य उपादान कारण पृथिवी है और सब गौण हैं ।
प्र०—इस शरीर में प्राण ही प्रधान (मुख्य ) है, इसलिये
प्राण को ही देह का कर्त्ता मानना चाहिये ?