सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 165, कुल 192 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 165

( १६४ )
द्रव्य माना है उसी विषय पर द्रव्य है, और जगह जैसा अर्थ
हो वैसा ही करना चाहिये । इस बात को भी पहिले कह चुके
हैं कि पाँच भौतिक शरीर सिर्फ़ नाममात्र ही हैं वास्तव में तो
पार्थिव हैं । अब इस बात का विचार किया जाता है कि जिन
इन्द्रियों के आश्रय से शरीर है वे इन्द्रियां जैसे कि हम लोगों की
अहंकार से पैदा हैं वैसे ही और देशों के मनुष्यों की भी अहंकार
से ही पैदा होती हैं, पंचभूत से नहीं पैदा होतीं ।
न देशभेदेऽप्यन्योपादानतास्मदा दिवन्नि-
यमः ॥ १०६ ॥
अर्थ—देश के भेद होने पर भी वस्तु का दूसरा उपादान
नहीं हो सकता, क्योंकि जैसे हम लोग और देशों में जाकर वास
करने लगते हैं, परन्तु इन्द्रियां नहीं बदलतीं वे ज्यों की त्यों रहती
हैं, हमारा देश ही तो पलट जाता है । यदि देश-भेद ही इन्द्रियों
के बदलने में वा और उपादान कारण करने में हेतु होता है तो
हम लोंगों की इन्द्रियां भी वहां जाकर जरूर बदल जातीं, लेकिन
ऐसा देखने में नहीं आता, इससे सिद्ध होता है कि इन्द्रियां
पांचभौतिक नहीं, किन्तु अहंकार से पैदा हैं ।
प्र०—जबकि इन्द्रियों की अहंकार से उत्पत्ति है तो उनको
भौतिक क्यों प्रतिपादन किया है ?
उ०—निमित्तव्यपदेशात् तद्व्यपदेशः ॥ ११० ॥
अर्थ—इन्द्रियों का निमित्त जो अहंकार है उस से ही
पञ्चभूतों में भी इन्द्रियों का कारणत्व स्थापन किया जाता है,
जैसे—आग यद्यपि काष्ठादि रूप नहीं है तथापि उसको लकड़ी,
आग इत्यादि रूपों से पुकारते हैं; इसी तरह इद्रियां भौतिक भी
नहीं हैं, तौ भी उनको भौतिक कहते हैं ।