सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 167, कुल 192 में से
संदर्भ में पढ़ें( १६६ )
उ०—न देहारम्भकस्य प्राणत्वमिन्द्रिय-
शक्तितस्तत्सिद्धेः ॥ ११३ ॥
अर्थ—शरीर का कर्त्ता प्राण नहीं हो सकता, क्योंकि प्राण
इन्द्रियों की शक्ति से अपने कार्य को करता है और इन्द्रियों के
साथ प्राण का अन्वय व्यतिरेक दृष्टान्त भी हो सकता है, कि जब-
तक इन्द्रियाँ हैं तब तक प्राण हैं, जब इन्द्रियों नाश होगईं तब
प्राण भी नाश होगया, इसलिये प्राण को देह का कारण नहीं
कह सकते ।
प्र०—जबकि शरीर के बनने में प्राण नहीं है तो बिना प्राण
के भी शरीर की उत्पत्ति होनी चाहिये ?
उ०—भोक्तुरधिष्ठानाद्भोगायतन निर्माणम-
न्यथा पूर्ति'भावप्रसंगात् ॥ ११४ ॥
अर्थ—भोक्ता ( पुरुष ) के व्यापार से शरीर का बनना
हो सकता है। यदि वह प्राणों को अपने-अपने स्थान न लगावै तो
प्राण-वायु कभी भी ठीक-ठीक रसों को नहीं पका सकता। जब रस
ठीक तरह से न पकेंगे तो शरीर में सैकड़ों तरह के रोग पैदा
हो जायेंगे और दुर्गन्धि आने लगेगी। अतएव, यद्यपि प्राण
कारण है लेकिन मुख्य कारण पुरुष को ही मानना चाहिये ।
प्र०—जो अधिष्ठानत्व ( बनानेवालापन ) पुरुष में माना
जाता है वह अधिष्ठानत्व यदि प्राण में ही माना जावै तो क्या
हानि है ?
उ०—भृत्यद्वारा स्वाम्यधिष्ठितिर्नैकान्तात् ॥११५॥
अर्थ—इस प्रकार हम भी पुरुष को अधिष्ठाता मानते हैं।
जैसे राजा अपने भृत्यों ( नौकरों ) के द्वाराsrc/मकानादिकों को बन-