सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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जो अग्नि है, उसकी ही शक्ति से धुंआँ उत्पन्न होता है, और वह
धुआँ आग की किसी विशेष शक्ति का रूप है । इसी तरह के
पदार्थ को व्याप्ति कहते हैं ; और जिस में यह बात नहीं है, वह
व्याप्ति किसी प्रकार नहीं हो सकती ।
प्र०—धुआँ आग की शक्ति से पैदा नहीं होता है, गीले ईंधन
की शक्ति से पैदा होता है ?
उ०—यह कहना ठीक नहीं है, यदि गीले ईंधन में ऐसी
शक्ति होती तो वायु ( हवा ) के संयोग होने से ईंधन में से धुआँ
क्यों नहीं उत्पन्न होता परन्तु ऐसा देखने में नहीं आता ; इससे
यह बात माननी पड़ेगी कि धुआँ अग्नि की शक्ति विशेष है ।
आधेयशक्तियोग इति पञ्चशिखः ॥ ३२ ॥
अर्थ—आधार में जो आधेय-शक्ति रहती है, उसको ही
पंचशिख नाम वाले आचार्य व्याप्ति मानते हैं । इसका आशय
भी इस दृष्टान्त से समझ लेना चाहिये, कि आधार जो आग है,
उसमें आधेय जो धुआँ, उसके रहने की जो शक्ति है, उसको
व्याप्ति कहते हैं ।
प्र०—जब आग में धुआँ नहीं दीखता है, तब उसमें व्याप्ति
का नाश हो जाता है क्या ?
उ०—नहीं ! क्योंकि धुएं का आविर्भावतिरोभाव होता रहता
है, अर्थात् धुआँ कभी उत्पन्न होता है कभी उसी के भीतर लय
हो जाता है ; किन्तु आग से धुआँ नाश नहीं होता है । इसवास्ते
व्याप्ति का नाश नहीं हो सकता, इसको पहले अध्याय में विस्तार-
पूर्वक कह आये हैं ।
प्र०—आधार में आधेय शक्तिमत्व क्यों कल्पना किया जाता
है, आधार की स्वरूपशक्ति को ही व्याप्ति क्यों नहीं मानते ?