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सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

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प्रकार के दुःखों के विवरण को शास्त्र के आदि में हम वर्णन कर
चुके हैं।
प्र०-ऊह आदिकों से ही सिद्धि क्यों मानी जाती है ?
क्योंकि बहुतेरे मनुष्य मन्त्रों से अणिमादिक आठ सिद्धि मानते
हैं, तब क्या उनका सिद्धान्त मिथ्या होसकता है ?
उ०-नेतरादितरहानेन विना ॥ ४५ ॥
अर्थ-ऊहादि पञ्चक के विना मन्त्र आदिकों से तत्व की
सिद्धि प्राप्त नहीं होती, क्योंकि वह सिद्धि इतर अर्थात् विपर्य्यय ज्ञान
के विना भी प्राप्त होती है; अतएव सांसारिकी सिद्धि होने के
कारण यह पारमार्थिकी नहीं कहला सकती। बस यहाँ तक
समष्टिसर्ग और प्रत्ययसर्ग समाप्त होगया, इस से आगे “व्य-
क्तिभेदः कर्मविशेषात्” इस संक्षेप से कहे हुए सूत्र को विशेष
रूप से प्रतिपादन करेंगे।
दैवादिप्रभेदा ॥४६॥
अर्थ-दैव आदि सृष्टि के प्रभेद हैं, अर्थात् एक दैवी सृष्टि,
दूसरी मनुष्यों की सृष्टि है। यहाँ पर दैव और मनुष्यों के कहने
से यह न समझना चाहिये, कि देवता जैसे और साधारण मनुष्य
मानते हैं, वही हैं, किन्तु विद्वानों का नाम देव है और जो मिथ्या
बोलते हैं वे मनुष्य हैं। किन्नर, गन्धर्व, पिशाच आदि यह
सब मनुष्यों के ही भेद हैं, जैसा कि श्रुतियाँ कहती हैं।
“सत्यं वै देवा अनृतं मनुष्याः, विद्वां ꣳ सो हि देवाः”
इत्यादि। और महर्षि कपिलजी को भी यही बात अभीष्ट
(मंजूर) है, जैसाकि उन्होंने आगे ५३ वें सूत्र में प्रतिपादन
किया है। अब सृष्टि का प्रयोग कहते हैं-
आब्रह्मस्तम्भपर्यन्तं तत्कृते सृष्टिरविवेकात् ॥४७

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