सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sankhya Darshana with Hindi Commentary
महर्षि कपिल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
( २६ ) हिन्दी सांख्य दर्शन
( क ) कर्मेन्द्रियों का आहार्य ( आहरण करने योग्य ) विषय
१० प्रकार का है (१) दिव्य बचन (बोलना ) ( २ ) अदिव्य
बचन (३) दिव्य आदान ( लेना ) (४) अदिव्य आदान
( ५ ) दिव्य विहार ( चलना ) ( ६ ) अदिव्य विहार
( ७ ) दिव्य उत्सर्ग (छोड़ना) ( ८) अदिव्य उत्सर्ग (६)
दिव्य आनन्द (१०) अदिव्य आनन्द ।
(ख) तीनों अन्तः करणों का धार्य ( धारण करने योग्य )
विषय १० प्रकार का होता है—
(१) दिव्य प्राण ( २ ) अदिव्य प्राण ( ३ ) दिव्य अपान
( ४ ) अदिव्य अपान ( ५ ) दिव्य समान ( ६ ) अदिव्य
समान ( ७ ) दिव्य उदान ( ८ ) अदिव्य उदान (•६ )
दिव्य व्यान ( १० ) अदिव्य व्यान ।
(ग) ज्ञानेन्द्रियों का प्रकाश्य ( प्रकाश करने योग्य ) विषय
१० प्रकार का होता है-
(१) दिव्य शब्द ( २ ) 'अदिव्य शब्द ( ३ ) दिव्य स्पर्श
( ४ ) अदिव्य स्पर्श ( ५ ) दिव्यरूप ( ६ ) अदिव्य रूप
( ७ ) दिव्य रस ( ८ ) अदिव्य रस ( ६ ) दिव्य गन्ध
( १० ) अदिव्य गन्ध ॥ ३२ ॥
तेरह ( १३ ) प्रकार केकरण ।
अन्तःकरणंत्रिविधंदशधाबाह्यंत्रयस्यंविषयाख्यम् ।
साम्प्रतकालंवाह्यंत्रिकालमाभ्यन्तरंकरणम् ॥३३॥
अन्तःकरण तीन प्रकार का होता है बुद्धि, अहंकार,
और मन । बाह्य इन्द्रिय दश प्रकार का होता है-५ ज्ञाने-
न्द्रियें और ५ कर्मेन्द्रियें ।
ये दशों बाह्य इन्द्रियें अन्तःकरण के ही विषय को प्रकट
हिन्दी सांख्य दर्शन (२७)
करते हैं। अर्थात् जब ये तीनों अन्तःकरण विषय का संकल्प,
अभिमान और अध्यवसाय करना चाहते हैं, तब ये १०
इन्द्रियें द्वार रूप हो जाती हैं-ज्ञानेन्द्रियें आलोचन (सामा-
न्यज्ञान) से और कर्मेन्द्रियें अपनें यथायोग्य व्यापार से द्वार
भूत होती हैं।
विशेषान्तर-
बाह्य इन्द्रियों का सामर्थ्य केवल वर्त्तमान विषय में
रहता है, और बुद्धि आदि आभ्यन्तर करणों का सामर्थ्य
भूत, भविष्यत् और वर्त्तमान तीनों कालों में होता है ॥३३॥
बाह्य इन्द्रियों के विषय।
बुद्धीन्द्रियाणितेषां पञ्चविशेषाविशेषविषयाणि ।
वाग्भवतिशब्दविषया शेषाणितुपञ्चविषयाणि ।३४।
उन १० बाह्य इन्द्रियों में ५ ज्ञानेन्द्रियों के विशेष
(स्थूल शब्द आदि और पृथिवी आदि जो शान्त, घोर तथा
मूढ स्वभाव हैं) और अविशेष (तन्मात्र-सूक्ष्म शब्द आदि)
विषय हैं। इस में भी यह विशेष है, कि यागियों का श्रोत्र
(कान) सूक्ष्म शब्द और स्थूल (मोटा) शब्द दोनों को सुन
सकता है, किन्तु हम लोगों का कान केवल मोटे शब्द को ही
सुन सकता है। उन की त्वक् (चर्म) मोटे और सूक्ष्म दोनों
प्रकार के स्पर्श को ग्रहण कर सकती है और हमारी त्वक
(चर्म) मोटे ही स्पर्श को छू सकती है। एवम् उन के और
हमारे नेत्र आदि में भी भेद है। अर्थात् उन के नेत्र आदि
स्थूल व सूक्ष्म दोनों प्रकार के रूप आदि को ग्रहण कर सकते
हैं और हमारे केवल स्थूल ही विषय को ले सकते हैं।
ऐसे ही कर्मेन्द्रियों में वाक् (वाणी) हमारी या योगि-
यों की हो, स्थल शब्द को ही उच्चारण कर सकती है, किन्तु
( २८ ) हिन्दी सांख्य दर्शन
सूक्ष्म शब्द को नहीं। क्योंकि वाक् इन्द्रिय और सूक्ष्म शब्द
दोनों अहंकार रूप एक ही कारण से उत्पन्न हुये हैं। अर्थात्
एक साथ उत्पन्न होने वाला बराबर वाले को अनुभव नहीं
कर सकता। और शेष चार (गुदा, लिङ्ग या योनि, हाथ,
और पैर ) इन्द्रियों के रूप आदि ५ विषय हैं क्यों कि हस्त
आदि चार इन्द्रियें जिन घट आदि वस्तुओं से सम्बन्ध करते
हैं, वे सब शब्द आदि तन्मात्ररूप ही हैं, या उन्हीं से प्रकट
हुये हैं।
गौडपाद आचार्य यहां कहते हैं कि मनुष्यों की ज्ञा-
नेन्द्रियें सुख, दुःख और मोह रूप विषयों से युक्त शब्द आदिकों
को प्रकाशित करती हैं और देवताओं की ज्ञानेन्द्रियें शब्द
आदि को प्रत्यक्ष करती हैं, किन्तु उन्हें उन में सुख दुःख
आदि की प्रतीति नहीं होती। कर्मेन्द्रियों में वाणी दोनों
की बराबर है। ( हमारी समझ में देवताओं की वाणी जैसे
शुद्ध शब्द को उच्चारण कर सकती है, वैसे मनुष्यों की नहीं)
और शेष इन्द्रियें (हाथ आदि) ५ विषयों को ग्रहण करती
हैं। अर्थात् हाथ में शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध पांचों विषय
हैं, इसी से वह उक्त पांचों गुण वाली पृथ्वी में चलता है।
ऐसे गुद आदि में भी योजना करना ॥ हमारी समझ में दोनों
व्याख्यानों का समुच्चय (मेल) हो सकता है। अर्थात् हमारी
देवताओं तथा योगियों की इन्द्रियों की शक्ति में दोनों ही
प्रकार से भेद का संभव है, अतः दोनों ही व्याख्यान स्वीकार
करने योग्य हैं ॥ ३४ ॥
करणों की परस्पर गौणता और प्रधानता
सान्तःकरणाबुद्धिःसर्व विषयमवगाहतेयस्मात् ।
तस्मात्तत्रिविधंकरणंद्वारि, द्वाराणिशेषाणि ॥३५॥
हिन्दी सांख्यदर्शन (२६)
अन्य दो अन्तःकरणों (मन, अहंकार) सहित बुद्धि
अर्थात् तीनों अन्तःकरण जिससे कि-भूत, भविष्यत् और
वर्त्तमान काल में शब्द आदि सब विषयों को अवगाहन
(ग्रहण) करते हैं, इससे उक्त तीनों अन्तःकरण द्वारि (प्रधान)
और शेष बाह्य इन्द्रियें द्वार (अप्रधान या गौण) हैं ॥ ३५ ॥
मन और अहंकार दोनों की अपेक्षा बुद्धि की प्रधानता
एते प्रदीपकल्पाः परस्परविलक्षणा गुणविशेषाः ।
कृत्स्नं पुरुषस्यार्थ प्रकाश्य बुद्धौ प्रयच्छन्ति ॥३६॥
ये सब बुद्धि के अतिरिक्त जितने करण हैं, अर्थात्-५ ज्ञा-
नेन्द्रियें ५ कर्मेन्द्रियें, अहंकार और मन (कुल १२) सब
दीपक के समान हैं। अपनें २ विषय को प्रकाश करने वाले
हैं। आपस में सब विलक्षण हैं, भिन्न २ विषय वाले हैं। और
गुण विशेष हैं, सत्व आदि गुणों से उत्पन्न हुये २ हैं। पुरुष
को जो २ कुछ विषय अपनें में भान होता हुआ प्रतीत होता
है, उस सब को ये करण (इन्द्रियें) अपनें २ विषय के अनु-
सार प्रकाशित करके बुद्धि में स्थापित करते हैं। प्रयोजन यह
है कि-जो विषय बाहरी इन्द्रियों में भासता है, वही भीतरी
इन्द्रिय मन में विशेष रूप से पड़ता है, फिर वही अहंकार-
में पहुंचता है, जिसका कि-उसे अभिमान होता है, और वही
विषय उस के द्वारा बुद्धि में चमकता है, जिसका कि-उसे
अध्यवसाय (निश्चय) होता है। बस इससे आगे वह विषय
कहीं नहीं जाता, अतः इनमें सर्व प्रधान बुद्धि ही है। इनके
मत में इन्द्रिय आदि संघात का अध्यक्ष बुद्धि तत्व ही है। नैया
यिकों के समान आत्मा अध्यक्ष नहीं है। अर्थात् उनके मतमें
सब पदार्थों का ज्ञान साक्षात् सम्बन्ध से आत्मा में ही उत्प-
न्न होता है, इन्द्रियें उसी के साधन हैं अतः वही अध्यक्ष
( ३० ) हिन्दीसांख्यदर्शन
( प्रधान ) है । इनके मत में सब ज्ञान बुद्धि में ही रहता है,
आत्मा या पुरुष में उसकी छायामात्र पड़ती है और साक्षात्
सम्बन्ध का ज्ञान भ्रान्ति रूप है । अतः बुद्धि ही प्रधान है ३६
फिर बुद्धि की प्रधानता ।
सर्वं प्रत्युपभोगं यस्मात् पुरुषस्य साधयति बुद्धिः ।
सैव च विशिनष्टि पुनः प्रधानपुरुषान्तरं सूक्ष्मम्३७
जिस कारण से कि-पुरुष के सब विषय के उपभोग को
बुद्धि साधन करती है, और वही फिर प्रधान और पुरुष के
सूक्ष्म (दुर्लक्ष्य) अन्तर को प्रकाशित करती है, अतः वही
(बुद्धि) प्रधान है। जिस प्रकार कि-सर्वाध्यक्ष या प्रधान मन्त्री
राजा के सब कार्यों का साक्षात् सम्पादन करने से प्रधान है,
और ग्रामाध्यक्ष आदि उसके प्रति गौण रहते हैं। अर्थात्-
बुद्धि पुरुष के साक्षात् सम्बन्ध से या ठीक उसी के साथ संयुक्त
होने से पुरुष की छाया ( छवि ) को धारण कर लेती है, जो २
कुछ सुख, दुःख आदि बुद्धिमें होता है वही पुरुषमें दिखाई देता
है, और सब पुरुष से दूर रहते हैं, जैसे अहंकार और पुरुष के
बीच में बुद्धि पड़ जाती है, तथा और इन्द्रियों के बीच में
अहंकार और बुद्धि पड़ती है । इसी से उनपर पुरुष की और
पुरुष पर उनकी छाया नहीं पड़ती । सुतराम् उक्त प्रकार बुद्धि
ही पुरुष के सब उपभोगों का साक्षात् साधन है, और वही
प्रधान ॥ ३७ ॥
विशेष अविशेषों का विभाग ।
तन्मात्राण्यविशेषाः, तेभ्यो भूतानि पञ्चपञ्चभ्यः
एतेस्मृता विशेषाः, शान्ता घोराश्चमूढाश्च ॥३८॥
शब्द आदि ५ तन्मात्र अविशेष कहलाते हैं, और उन
हिन्दी सांख्य दर्शन ( ३१ )
शब्द आदि पांच तन्मात्रों से आकाश आदि ५ महाभूत होते
हैं। ये ५ महाभूत विशेष कहलाते हैं। क्योंकि-ये कोई शान्त
कोई घोर, और कोई मूढ़ होते हैं। अर्थात्-सूक्ष्म शब्द आदि
तन्मात्र उपभोग योग्य नहीं होते हैं, इसी से उनके शान्तत्व
आदि धर्मों का अस्मदादिकों को अनुभव नहीं होता, अतएव ये
‘अविशेष’ पद के वाच्य होते हैं। और आकाश आदि ५ भूत
स्थूल होने से उनके शान्तत्व आदि धर्मों को हम अनुभव करते
हैं, इसी से वे विशेष कहे जाते हैं ॥ ३ ॥
विशेषों के अवान्तर विशेष ।
सूक्ष्मा मातापितृजाः सहप्रभूतैस्त्रिधा विशेषाः स्युः ।
सूक्ष्मांस्तेषां नियता मातापितृजानिवर्त्तन्ते ॥३९॥
प्रकृति से उत्पन्न होने वाले २४ तत्वों में से अनेक २
तत्वों के मेल से तीन विशेष वस्तुएं होती हैं, जिन से पुरुष
का उपभोग सिद्ध होता है। जैसे १ सूक्ष्म शरीर जो १८ तत्वों
से संग्रह किया हुआ होता है, २ रा माता पिता से उत्पन्न
होने वाला स्थूल शरीर और ३ रा विशेष महाभूत हैं । इन्हीं
तीन विभागों में बटे हुये सब प्राकृत पदार्थों का पुरुष उपभोग
करता है। इनमें सूक्ष्म शरीर की स्थिति तत्वज्ञान के उत्पन्न
होने तक रहती है, और माता पिता से होने वाले नष्ट हो
जाते हैं, तथा उसके तत्व अपनें २ समान तत्व में मरण के
अनन्तर मिल जाते हैं। इसी प्रकार महाभूत भी प्रलय काल
में अपनें २ अव्यक्त कारण में मिल ही जाते हैं ॥ ३६ ॥
सूक्ष्म शरीर का निरूपण ।
पूर्वोत्पन्नमसक्तं नियतं महदादि सूक्ष्मपर्यन्तम्।
संसरति निरुपभोगं भावैरधिवासितं लिङ्गम् ॥४०॥
( ३२ ) हिन्दी सांख्य दर्शन
लिङ्ग शरीर सृष्टि के आदि काल में प्रधान से प्रतिपुरुष
अलग २ उत्पन्न किया गया है । असक्त है, अर्थात्-शिलामें भी
प्रवेश कर जाता है । नियत या महाप्रलय तक ठहरने वाला है
१-महत्तत्व १-अहंकार १-मन ५-ज्ञानेन्द्रियें ५-कर्मेन्द्रियें और
५ तन्मात्र कुल १८ तत्वों का समूहरूप है । षाट्कौशिक ( ६
कोशों के समूहरूप ) स्थूल शरीरके बिना अकेला भोगका स्थान
नहीं बन सकता, और धर्म अधर्म आदि ८ भावों की वासना
से युक्त होनेके कारण संसरण करता है ( पूर्व २ शरीरको छोड़र
कर नये २ शरीरकी धारण करता है) ॥ ४० ॥
लिङ्ग शरीर को स्थूल शरीर की अपेक्षा ।
चित्रंयथाश्रयमृते स्थाण्वादिभ्योविनायथाच्छाया।
तद्वद् विना विशेषैर्न तिष्ठति निराश्रयं लिङ्गम् ॥४१॥
जिस प्रकार आश्रय (दीवार आदि) के बिना और छाया
वृक्ष आदि के बिना नहीं रह सकती, उसी प्रकार स्थूल शरीर
के विना लिङ्ग शरीर नहीं रहता ( यहां तक कि-मृत्युके पश्चात्
दूसरे शरीर के ग्रहण करने से पहिले उस अवान्तर में भी
तात्कालिक अदृष्टनिर्मित एक पाञ्चभौतिक शरीर उसे मिल
जाता है सर्वथा वह निराश्रय नहीं रहता) ॥४१॥
लिङ्ग शरीर की संसृति का प्रकार और कारण ।
पुरुषार्थहेतुकमिदं निमित्तनैमित्तिकप्रसंगेन ।
प्रकृतेर्विभुत्वयोगान्नटवद्व्यवतिष्ठतेलिङ्गम् ॥४२॥
पुरुषार्थ (जीवों के अदृष्ट) की प्रेरणा से युक्त होकर यह
लिङ्ग शरीर धर्म, अधर्म और षाट्कौशिक शरीर के सम्बन्धसे
नटके समान नानारूप ( मनुष्यदेव तिर्यक्रूप) से व्यव-
स्थित होता है । प्रकृतिके विभुत्व (महिमा) से उसे विलक्ष-
हिन्दी सांख्य दर्शन ( ३३ )
कार शरीरों की दुर्लभता नहीं है ॥४२॥
निमित्त और नैमित्तिक का विभाग ।
सांसिद्धिकाश्चभावाःप्राकृतिकावैकृताश्चधर्माद्या ।
दृष्टाःकरणाश्रयिणः कार्याश्रयिणश्चकललाद्याः॥४३॥
धर्म आदि भाव दो प्रकार के होते हैं, प्राकृतिक और
वैकृतिक । प्राकृतिक सांसिद्धिक या स्वाभाविक कहे जाते हैं
जैसे-सृष्टिके आदि कालमें भगवान् कपिलदेव महामुनि जन्म
से ही धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य युक्त प्रकट हुये । इन
में धर्म आदि जो भाव थे वे स्वाभाविक थे । और जो किसी
देवता के आराधन आदि उपाय से उत्पन्न होते हैं, वे वैकृ-
तिक असांसिद्धिक या अस्वाभाविक कहे जाते हैं । जैसे-प्राचेतस
आदि महर्षियोंको धर्म आदिकी प्राप्तिहुई । ये भाव करणों में
या इन्द्रियसम्मूहरूप लिङ्ग शरीर में रहते हैं ॥ षाट्कौशिक
शरीर की गर्भ में कलल, बुद्बुद, मांस-पेशी, अङ्ग प्रत्यङ्ग व्यूह
आदि अवस्थायें होतीहैं । तथा गर्भसे बाहर निकले हुये स्थल
शरीर की बाल्य, कौमार, यौवन और बुढापा अवस्थाएं होती
हैं । ( भावोंका विभाग निमित्त विभाग है और शरीरों का
विभाग नैमित्तिक विभाग है )
गौड़पाद यहां भावों के तीन भेद मानते हैं-सांसिद्धिक,
प्राकृत, और वैकृत । इनके उदाहरण में आदि विद्वान् कपिल
सनकादि और अस्मदादि हैं इस मतमें सांसिद्धिक स्वाभाविक
प्राकृत देवता के आराधन आदि उपाय से उत्पन्न और वैकृत
अध्ययन से उत्पन्न हैं ॥४३॥
किस निमित्त का कौन नैमित्तिक है ।
धर्मेणगमनमूर्ध्वंगमनमधस्ताद्भवत्यधर्मेण ।
( ३४ ) हिन्दी सांख्य दर्शन
ज्ञानेनचापवर्गो विपर्ययादिष्यतेबन्धः ॥४४॥
धर्म से ऊर्ध्वगमन ( स्वर्ग आदि की प्राप्ति ) अधर्म से
अधोगति ( नरक आदि दुःख की प्राप्ति ) ज्ञान से अपवर्ग
( मोक्ष ) और अज्ञान से बन्धन ( संसार ) माना . गया
है ॥ ४४ ॥
वैराग्यात्प्रकृतिलयःसंसारो भवति राजसाद्रागात्।
ऐश्वर्यादविघातो विपर्ययात्तद्विपर्यासः ॥४५॥
जिनको आत्मज्ञान नहीं हुआ और उन्हें पहिले ही इस
लोक तथा परलोक के सुख में वितृष्णा ( अनिच्छा ) हो गई
तथा वे प्रकृति या उसके कार्य महत्तत्त्व आदि में ही आत्म
बुद्धि करके उनकी उपासना करते हैं, उनका उनकी उपासना
के अनुसार प्रकृति आदिमें लय हो जाता है और फिर संसार
में आगमन होजाता है राजस राग से संसार होता है। ऐश्वर्य
से इच्छा का अविघात होता है, अर्थात् जिस वस्तु की इच्छा
करता है उसे वही मिल जाती है । एवम् अनैश्वर्य से इच्छा
का विघात होता है, जिस वस्तु की इच्छा करता है वह उसे
नहीं मिलती ॥ ४५ ॥
फल सहित आठ भाव ।
( का० ४४-४५ )
निमित्त नैमित्तिक निमित्त नैमित्तिक
१ धर्म से ऊर्ध्वगमन ५ वैराग्यसे प्रकृतिलय ।
२ अधर्म से अधोगति । ६ अवैराग्य से संसार
३ ज्ञान से मोक्ष ७ ऐश्वर्य से इच्छानभि
४ अज्ञान से बन्धन । घात
हिन्दी सांख्य दर्शन ( ३५ )
निमित्त नैमित्तिक
अनैश्वर्य से सर्वत्र इच्छा का विघात
बन्ध चित्र का० ४४-४५
| बन्ध | अधिकारी | फल | काल | व्यवस्था |
|---|---|---|---|---|
| प्राकृत | ॐ प्रकृति का उपासक | प्रकृतिलय | एककल्प | ॐ प्रकृति को आत्म बुद्धि से उपासना करने वाला |
| वै | इन्द्रिय में आत्मबुद्धि से चिन्तन करने वाला | विगतज्वरता | दश मन्वन्तर | |
| का | बुद्धिको आत्मबुद्धि से उपासना करनेवाला | बुद्धिमेंलय | १० सहस्र | |
| रि | अहंकार को आत्मबुद्धि से उपासना करने वाला | अहंकार में लय | १ सहस्र | |
| क | पृथिवीआदि भूतोंमें आत्मबुद्धि सेउपासक | भूतलय | १०० | |
| दाक्षिणिक | इष्टापूर्तकारी (यज्ञानुष्ठानकारी) | स्वर्ग | विधि कहा गयाकाल | |
| (८) | ईश्वरापर्ण बुद्धि से इष्टापूर्तकारी | क्रममुक्ति | क्रम यह है कि- पहिले निष्काम कर्म, फिर उससे अन्तःकरणशुद्धि, फिर तत्त्वज्ञान, फिर मोक्ष । |
( ३६ ) हिन्दी सांख्य दर्शन
बुद्धि का संक्षिप्त सर्ग ।
एषप्रत्ययसर्गोविपर्ययाशक्तितुष्टिसिद्ध्याख्यः ।
गुणवैषम्यविमर्दात्तस्यचभेदास्तुपंचाशत् ॥४६॥
विपर्यय, अशक्ति, तुष्टि, और सिद्धि-यह बुद्धि का
संक्षिप्त सर्ग ( सृष्टि ) है । गुणों के न्यून अधिक होने से जो
उन का आपस में विमर्द्द होता है, या आपस में एक को
दूसरा दबा कर प्रधान हो जाता है, उससे उसके ५० भेद
होते हैं ॥ ४६ ॥
संक्षिप्त सर्ग—चित्र ( का० ४६ )
कारण कार्य
बुद्धि ( १ ) विपर्यय ( २ ) अशक्ति ( ३ ) तुष्टि ( ४ )
सिद्धि ।
अन्तर्भाव चित्र ( का० ४६ )
जिसमें अन्तर्भाव जिसका अन्तर्भाव
(१) विपर्यय (१) अज्ञान ।
(२) अशक्ति (२) अनैश्वर्य (३) अवैराग्य (४) अधर्म ।
(३) तुष्टि (५) धर्म (६) वैराग्य (७) ऐश्वर्य ।
(४) सिद्धि (८) ज्ञान ।
संक्षिप्त सर्ग के ५० भेदों की गणना ।
पञ्चविपर्ययभेदा भवन्त्यशक्तिश्च करणवैकल्यात् ।
अष्टाविंशतिभेदा, तुष्टिर्नवधा,ऽष्टधासिद्धिः ॥४७॥
विपर्यय के ५ भेद होते हैं, अशक्ति,-बुद्धि आदि १३
करणों के वैकल्य ( विकल हो जाने ) से २८ प्रकार की, तुष्टि
९ प्रकार की और सिद्धि ८ प्रकार की होती है । इन सब का
योग करने से ५० भेद होते हैं ॥
हिन्दी सांख्यदर्शन ( ३७ )
५० भेदों के नाम ।
( विपर्यय के भेदों के नाम )
( १ ) विपर्यय- ( १ ) अविद्या ( तमः ) ( २ ) अस्मिता
( मोह ) ( ३ ) राग ( महामोह ) ( ४ ) द्वेष ( तामिस्र )
( ५ ) अभिनिवेश ( अन्धतामिस्र ) ॥ ७७ ।
विपर्यय के भेदों के भेद ।
भेदस्तमसोऽष्टविधो मोहस्य च दशविधोमहामोहः ।
तामिस्रोऽष्टादशधा तथाभवत्यन्धतामिस्रः ॥ ४८ ॥
तम या अविद्या के ८ भेद हैं । मोह ( अस्मिता ) के ८
हैं । महामोह ( राग ) के १० भेद हैं । तामिस्र (द्वेष) के १८
भेद हैं । अन्धतामिस्र ( अभिनिवेश ) के १८ भेद हैं ।
कुल ६२ भेद हैं ) ॥
व्याख्या ।
( १ ) तम या अविद्या अव्यक्त, महत्तत्व, अहंकार और शब्द
आदि ५ तन्मात्रों में आत्म-बुद्धिरूप ८ प्रकार की
होती है ।
( २ ) अस्मिता या मोह । देवताओंको ८ प्रकार के ऐश्वर्य की
प्राप्तिसे "यह अणिमा आदि हमारा शाश्वतिक (सदाका)
ऐश्वर्य है" ऐसा अभिमान होता है, तद्रूप अस्मिता ८
प्रकार की होती है ।
( ३ ) राग या महामोह-दिव्य अदिव्य शब्द आदि दशविध
रञ्जनीय ( जिन में राग हो ) विषयों में आसक्तिरूप
दश प्रकार का महामोह होता है ।
( ४ ) द्वेष ( तामिस्र ) दिव्य अदिव्य भेद से १० प्रकार के
शब्द आदि विषय परस्पर से उपघात किये जाते हुये
द्वेष के विषय होते हैं और अणिमा आदि ८ सिद्धियें
( ३८ ) हिन्दी सांख्य दर्शन
स्वरूप से ही कोपनीय होती हैं, अतः १० शब्द आदि
और ८ अणिमा आदि मिलकर १८ क्रोध के विषय
होने से क्रोध या द्वेष १८ प्रकार का होता है ।
( ५ ) अभिनिवेश (अन्धतामिस्र) । अणिमा आदि ८ ऐश्वर्य
और शब्द आदि १०, कुल १८ विषयों या उपायों को
प्राप्त होकर देवताओं को भय होता है, कि-इन्हें असुर
न छीन लें। इस प्रकार भयका विषय १८ प्रकारका होनेसे
भय या अन्धतामिस्र भी १८ प्रकार का होता है ॥४८॥
२८ प्रकार की अशक्ति ।
( ११ इन्द्रिय बध, ६ अतुष्टियें और ८ असिद्धियें )
एकादशेन्द्रियबधाः सहबुद्धिबधैरशक्तिरुद्दिष्टा ।
सप्तदशबधा बुद्धे र्विपर्ययात्तुष्टिसिद्धीनाम् ॥४९॥
१७ बुद्धि बधों के सहित ११ इन्द्रियों के बधरूप २८
प्रकार की अतुष्टि कही गई है । तुष्टियों और सिद्धियोंके वि-
परीत रूप सेअर्थात्-६ अतुष्टियों और ८असिद्धियों के रूप से
बुद्धि-बध १७ होते हैं ॥ ४६ ॥
नवधा ( ६ ) तुष्टि ।
आध्यात्मिक्यश्चतस्रःप्रकृत्युपादानकालभाग्याख्याः
बाह्याविषयोपरमात्पञ्च, नवतुष्टयोऽभिमताः ।५०।
चार अध्यात्मिकी (भीतरी) तुष्टियें होती हैं। जिनके
प्रकृति उपादानकाल और भाग्य ये नाम हैं'विषयों से उपरति
( निवृत्ति) के कारण बाह्य ( बांहरी ) तुष्टियें ५ होती हैं ।
सब मिलकर ६ तुष्टियें हैं ।
व्याख्या ।
'प्रकृति से आत्मा भिन्न वस्तु है'-ऐसा निश्चय करके फिर
इसके श्रवण, मनन और निदिध्यासन के द्वारा विवेक साक्षा-
हिन्दी सांख्य दर्शन ( ३६ )
त्कार के लिये असत् उपदेश से सन्तुष्ट होकर जो पुरुष यत्न
• नहीं करता, उसको ये चार आध्यात्मिक्री तुष्टियें होती हैं ।
क्योंकि-ये तुष्टियें प्रकृति से भिन्न आत्मा को लेकर होती हैं
इसी से ये आध्यात्मिक्री हैं। इन की विशेष व्याख्या इस
प्रकार है कि-
(क) किसी ने किसी को उपदेश दिया कि- विवेक साक्षा-
त्कार ( प्रकृति और आत्माके भेद को अपने अनुभवमें लाना )
प्रकृति का ही परिणाम विशेष है, अतः उसे प्रकृति स्वयम् ही
करदेगी इससे तुझे ध्यान का अभ्यास नहीं करना चाहिये
हे वत्स ! तू इसी प्रकार रह । सो यह उस शिष्यको जो प्राकृ-
ती (प्रकृति पर निर्भरता ) तुष्टि होती है उसका नाम 'प्रकृति'
( अम्भः ) ही है ।
(ख) [ दूसरा उपदेश ] यद्यपि वह विवेकख्याति प्रकृति
से होती है, तथापि केवल प्रकृति से ही नहीं । क्योंकि-यदि
प्रकृति से ही विवेक-ख्याति या तत्वज्ञान हो तो उस को सब
के प्रति समान होनेके कारण सबको सब कालमें विवेकख्याति
होना चाहिये? इस कारण हे वत्स ! तू संन्यास धारण कर ।
संन्यास से तुझे वह ख्याति प्राप्त होगी। इस उपदेश से जो
शिष्य को तुष्टि होती है, वह उपादान ( सलिल ) कह-
लाती है ।
(ग) [ तीसरा उपदेश ] यद्यपि संन्याससे निर्वाण (मुक्ति)
होती है, किन्तु तत्काल नहीं, अर्थात् वही संन्यास तुझे काल
पाकर सिद्धि देगा, अतः तू उतावला मत हो, इस उपदेश से
जो काल में तुष्टि होती है वह काल कहलाती है, दूसरा नाम
इसका मेघ है ।
• (घ) [ चौथा उपदेश ] विवेक-ख्याति को न काल कर
सकता है, और न उपादान ही, किन्तु वह भाग्य से ही होती
( ४० ) हिन्दी सांख्य दर्शन
सकता है, और न उपादान ही, किन्तु वह भाग्य से ही होती
है इसीसे मदालसा के पुत्र अति बालक होने पर भी माता के
उपदेश मात्र से ही विवेक-ख्यातिको प्राप्त हुये और मुक्त भी।
उस में भाग्य ही कारण था, किन्तु और कुछ नहीं। इस उप-
देश से जो भाग्य में तुष्टि है वह भाग्य (वृष्टि) कहलाती है।
जो तुष्टियें प्रकृति, महत्तत्व, अहंकार आदि अनात्म
वस्तुओं को आत्मा समझ कर वैराग्य से होजाती हैं, वे सब
बाह्य तुष्टियें हैं। क्योंकि-आत्म-ज्ञान के न होने की अवस्था
ही में वे अनात्म ( बाह्य ) वस्तु के अवलम्बन से होती हैं।
इन तुष्टियों का कारण वैराग्य है, और वह वैराग्य ५ कारणों
से होता है, अतः वह पांच प्रकार का समझा जाता है; तथा
उसके कारण ही उस से होने वाली तुष्टियें भी ५ ही मानी
जाती हैं। अर्थात्-भोग्य विषय शब्द आदि ५ हैं, और उनके
उपरम (वैराग्य) भी ५ हैं। विषय की संख्या के समान इस
के कारण भी (१) अर्जन (२) रक्षण (३) क्षय (४) भोग
(५) हिंसा, ये पांच हैं, इससे भी वैराग्य या उपरम ५ हैं।
इनकी विशेष व्याख्या इस प्रकार है—
(क) [ अर्जन ] धनके अर्जन या संग्रह करनेके उपाय सेवा
आदि हैं, जो सेवक आदि को दुःखित करने वाले हैं। क्यों
कि-सेवा में क्रोधी स्वामी से कभी २ थप्पड़ या गर्दना
आदि भी खाना पड़ता है। सुतराम् इन दुःखों को अनुभव
करने वाले बुद्धिमान् उसमें प्रवृत्त नहीं होते। इसी प्रकार अन्य
उपायों में भी दोष हैं, इस प्रकार जो विषयसे उपरम तुष्टि है
वह 'पार' कहलाती है।
(ख) [ रक्षण ] धन किसी प्रकार इकट्ठा हो भी गया, तो
उसके राजा, चोर, अग्नि जलप्रवाह आदि से नांश होजाने की
हिन्दी सांख्य दर्शन ( ४१)
संभावना है, अतः उसकी रक्षा में महादुःख है, ऐसी भावना
वाले को जो विषय से उपरम में तुष्टि है, वह दूसरी 'सुपार'
'तुष्टि है।
(ग) [क्षय] ऐसे ही बड़े परिश्रम से इकट्ठा किया हुआ
धन भोग करने से क्षीण होजाता है, इस प्रकार उसके क्षय हो
जाने की भावना करने वाले को जो विषय के उपरम में तुष्टि
होती है, वह तीसरी 'पारापार' कहलाती है।
(घ) इसी प्रकार शब्द आदि विषयों के भोगाभ्यास से
काम (मनोरथ) बढ़ते हैं, और वे विषय की प्राप्ति न होने
पर कामी पुरुषको दुःखित करते हैं इससे भोग दोषको जानने
वालेको जो विषयसे उपरम में तुष्टि होती है, वह चौथी 'अनु-
त्तमाम्भ' कहलाती है।
(ङ) ऐसे ही दसरे प्राणियों की हानि किये बिना या
सताये बिना विषयों का उपभोग नहीं हो सकता, इस हिंसा
दोष को देख कर जो विषय से उपरम में तुष्टि होती है, वह
५ वीं 'उत्तमाम्भ' कहलाती है।
ऐसे चार आध्यात्मिकौ और ५ बाह्य तुष्टियों को
मिलाकर ६ तुष्टियें होती हैं ॥ ५० ॥
गौण और मुख्य सिद्धियें ॥
ऊहः शब्दोऽध्ययनं दुःखविघातास्त्रयः सुहृत्प्राप्तिः ।
दानंचसिद्धयोऽष्टौसिद्धेपूर्वोऽङ्कुशस्त्रिविधः ॥५१॥
तीन दुःखों के नाश तीन मुख्य सिद्धियें हैं। और सब
(१) अध्ययन (२) शब्द (३) ऊह (४) सुहृत्प्राप्ति और
(५) दान ये ५ सिद्धियें गौण हैं।
सिद्धिके पूर्व जो विपर्यय अशक्ति और तुष्टि के भेद से
तीन प्रकार की बुद्धि की सृष्टि (का० ४६ में) देखी गई है,
दित) (विवेकज्ञान की शुद्धि)
( ४० ) हिन्दीसांख्यदर्शन
उसको अंकुश संज्ञा है। क्योंकि वह सिद्धि को रोकती है।
गौणसिद्धियें-(१) अध्ययन (तार) (२) शब्द (सुतार)
(शब्दसे अर्थ का ज्ञान) (३) ऊह (तर्क) (तारतार) (४)
सुहृत्प्राप्ति (मित्र मिलन) (रम्यक) और (५) दान (मुदामु-
दित) (विवेकज्ञान की शुद्धि)
मुख्यसिद्धियें-(१) आध्यात्मिक दुःख का नाश (प्रमोद)
(२) आधिभौतिक दुःख का नाश (मुदित) और (३) आधि-
दैविक दुःख का नाश (मोदमान) (कुल ८ सिद्धियें)॥५१॥
प्रकारान्तर से सिद्धियें ।
(१) ऊह--जिस में पूर्व जन्म के अभ्यास से आप से
आप तत्व ज्ञान हो जावे।
(२) शब्द-जिस में दूसरे के सांख्य शास्त्रीय अध्ययन
को सुन कर तत्वों का ज्ञान उत्पन्न हो।
(३) अध्ययन-जिस में गुरु और शिष्य के सम्बन्ध से
संवाद पूर्वक ग्रन्थ और अर्थ दोनों प्रकार से सांख्य शास्त्र को
अध्ययन करने से ज्ञान उत्पन्न हो।
(४) सुहृत्प्राप्ति--जिस में तत्वों के ज्ञाता मित्र की
प्राप्ति से ज्ञान उत्पन्न हो।
(५) दान-जिस में धन के दान से सन्तुष्ट हो कर
गुरु ज्ञान देवे, वह सिद्धि धन दान के कारण होने से 'दान'
कहलाती है॥ ५१॥
प्रत्यय (बुद्धि) और तन्मात्र या भूत सर्ग का प्रयोजन
नविनाभावैर्लिङ्गं नविनालिङ्गेन भावनिर्वृत्तिः ।
लिङ्गाख्योभावाख्यस्तस्माद्द्विविधःप्रवर्त्ततेसर्गः।५२।
बुद्धि तत्व से दो प्रकार की सृष्टि होती है, एक सृष्टि
भाव-सृष्टि है और दूसरी लिङ्ग-सृष्टि है। पहिली भावसृष्टि
हिन्दी सांख्यदर्शन (४३)
का संक्षेप धर्म आदि ८भेदों में और विस्तार ५० भेदों में कहा
गया है। तथा दूसरी लिङ्ग सृष्टि, अहंकार के द्वारा ११ इन्द्रि-
यों और ५ तन्मात्रों के रूप में है, जिस का विस्तार
स्थूल देह आदि स्थावर जङ्गम सभी है। इन दोनों सृष्टियों
के सम्बन्ध में यह प्रश्न होता है, कि बुद्धि ने दो सृष्टियें क्यों
कीं, एक ही सृष्टि से भी उस की चरितार्थता हो जाती ? इसी
के उत्तर के अर्थ यह कारिका है।
इस का भाव यह है, कि-धर्म, अधर्म आदि भावों के
विना लिङ्ग या तन्मात्र की सृष्टि का सम्भव नहीं । क्यों कि
पूर्व २ संस्कारों ( धर्म अधर्म आदिकों ) के अनुसार ही
पिछले २ या अपूर्व २ शरीरों की प्राप्ति होती है। एवम् लिङ्ग
आदि के विना धर्म आदि भी नहीं हो सकते । क्योंकि धर्म
अधर्म आदि सब स्थूल सूक्ष्म देह के ही साध्य हैं। इस प्रकार
बीज अंकुर के दृष्टान्त पर दोनों सृष्टियों का प्रयोजन है।
इसे अन्योऽन्याश्रय दोष भी न समझना चाहिये, क्योंकि जो
बीज जिस अंकुर से होता है, वह अंकुर उसी बीज से नहीं
होता, बल्कि-वह किसी दूसरे बीज से हुआ है। ऐसे ही
अंकुर पक्ष को भी समझना चाहिये ॥ ५२ ॥
१४ प्रकार का भूत सर्ग ।
अष्टविकल्पो दैवस्तैर्यग्योनश्च पञ्चधा भवति ।
मानुषकश्चैकविधः, समासतो भौतिकः सर्गः ॥५३॥
( क ) ८ प्रकार का देव सर्ग ( सृष्टि ) है—( १ ) ब्रह्मा
( २ ) प्रजापति ( ३ ) इन्द्र ( ४ ) पितर ( ५ ) गन्धर्व ( ६ )
यक्ष ( ७ ) राक्षस ( ८ ) पिशाच ।
( ख ) तिर्यग्योनि-सर्ग ५ प्रकार का-( १ ) पशु ( २ )
मृग (३) पक्षी (४) सरीसृप (सर्पादि) (५) स्थावर (वृक्षादि) ।
( ४४ ) हिन्दी सांख्य दर्शन
( ग ) मनुष्य-सर्ग १ प्रकार का है । यहसंक्षेप से १४ प्रकार
का भूतसर्ग है ॥ ५३ ॥
तीन प्रकार से भूत सर्ग
ऊर्ध्वंसत्वविशालस्तमोविशालश्चमूलतःसर्गः ।
मध्येरजोविशालो, ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तः ॥५४॥
पहिला ऊर्ध्व सर्ग है, जिस में सत्वगुण की प्रधानता
रहती है, एवम् उसकी परिस्थिति द्य लोक से सत्यलोक पर्यन्त
है । २रा सर्ग मूलसर्ग या जीव की नीच गति का सर्ग है ।
इस में तमोगुण की प्रधानता है, इसी से यह मोहमय होता
है, इस की गणना पशु से वृक्ष पर्यन्त है । और तीसरा मध्य
( बीच ) का सर्ग है, इस में रजोगुण की प्रधानता है, अतएव
यह दुःख बहुल है, इस की गणना में सम्पूर्ण भूलोक है, जिस
में सातों द्वीप और सातों समुद्र आजाते हैं ॥५४ ॥
सर्ग ( सृष्टि ) की दुःख रूपता ।
तत्रजरामरणकृतं दुःखम्प्राप्नोतिचेतनःपुरुषः ।
लिङ्गस्याविनिवृत्तेस्तस्माद्दुःखंस्वभावेन ॥५५॥
उस पूर्वोक्त सृष्टि में सब स्थानों में जरा ( बुढापा )
और मरण के दुःख को चेतन पुरुष, लिङ्ग शरीर की निवृत्ति
से पहिले प्राप्त होता रहता है । इस से संसार में दुःख स्वाभा-
विक है ।
यद्यपि भिन्न २ शरीरों में भिन्न २ प्रकार का सुख
भोग भी है, तथापि जरा मरण का दुःख सर्वत्र समान है ।
जो बुद्धि के ( प्राकृत ) गुण हैं, वे सब लिङ्ग शरीर में
रहते हैं, और लिङ्ग शरीर पुरुष का सम्बन्धी है । क्योंकि
पुर ( लिङ्ग ) में शयन करने से ही वह पुरुष है । अतः लिङ्ग
हिन्दी सांख्य दर्शन ( ४५ )
के द्वारा अध्यासवश पुरुष में भी दुःखों का सम्बन्ध हो
जाता है ॥ ५५ ॥
निःसन्देह उक्त सब सर्ग प्रकृति से ही हुआ है ।
इत्येषप्रकृतिकृतो महदादिविशेषभूतपर्यन्तः ।
प्रतिपुरुषविमोक्षार्थं स्वार्थइवपरार्थआरम्भः ॥५६॥
( क ) यह सब महत् तत्व आदि विशेष ( स्थूल ) भूत
पर्यन्त जितना सर्ग है, वह सब प्रकृति का किया हुआ है।
क्योंकि-
( १ ) सर्ग को अकारण मानने में सर्ग का अत्यन्त भाव
( होता ही रहे कभी रुके नहीं ) अथवा अत्यन्त अभाव ही
हो ( कभी सृष्टि हो ही नहीं ) ।
( २ ) ब्रह्म से भी सृष्टि नहीं। क्योंकि-चिति शक्ति में
परिणाम का अभाव है ।
( ३ ) ईश्वर से अधिष्ठित प्रकृति से भी सृष्टि नहीं ।
क्योंकि-निर्व्यापार ( व्यापार रहित ) ईश्वर का अधिष्ठातृत्व
हो नहीं सकता, अर्थात् - जब वह कुछ करता ही नहीं, तो
वह अधिष्ठाता कैसे हो सकता या अधिष्ठाता उसे मान भी
लिया जावे तो उससे क्या लाभ ? क्योंकि जैसे-क्रियाशून्य
खाती की कुल्हाड़ी कुछ नहीं कर सकती ।
( ख ) प्रकृति का जो महत् तत्व ( बुद्धि ) आदि २३
तत्वों के रूप में आरम्भ या कार्य है, वही प्रत्येक पुरुष को
क्रम प्राप्त ( संयोगवश ) मोक्ष का भी कारण हो जाता है । उस
का आरम्भ ऐसा है, जैसा-कोई स्वार्थ के समान अपने मित्र
के कार्य को बिना अपने प्रयोजन के ही करे । हमें इसमें यह
प्रतीति होती है, कि-इनके मतमें ईश्वर नहीं और न पुरुष में
कोई क्रिया और ज्ञान आदि गुण ही है, जो कुछ है, वह