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सर्वकोश
सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sankhya Darshana with Hindi Commentary

महर्षि कपिल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished81 पृष्ठ

पृष्ठ 49, कुल 81 में से

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पृष्ठ 49

( ३४ ) हिन्दी सांख्य दर्शन
ज्ञानेनचापवर्गो विपर्ययादिष्यतेबन्धः ॥४४॥
धर्म से ऊर्ध्वगमन ( स्वर्ग आदि की प्राप्ति ) अधर्म से
अधोगति ( नरक आदि दुःख की प्राप्ति ) ज्ञान से अपवर्ग
( मोक्ष ) और अज्ञान से बन्धन ( संसार ) माना . गया
है ॥ ४४ ॥
वैराग्यात्प्रकृतिलयःसंसारो भवति राजसाद्रागात्।
ऐश्वर्यादविघातो विपर्ययात्तद्विपर्यासः ॥४५॥
जिनको आत्मज्ञान नहीं हुआ और उन्हें पहिले ही इस
लोक तथा परलोक के सुख में वितृष्णा ( अनिच्छा ) हो गई
तथा वे प्रकृति या उसके कार्य महत्तत्त्व आदि में ही आत्म
बुद्धि करके उनकी उपासना करते हैं, उनका उनकी उपासना
के अनुसार प्रकृति आदिमें लय हो जाता है और फिर संसार
में आगमन होजाता है राजस राग से संसार होता है। ऐश्वर्य
से इच्छा का अविघात होता है, अर्थात् जिस वस्तु की इच्छा
करता है उसे वही मिल जाती है । एवम् अनैश्वर्य से इच्छा
का विघात होता है, जिस वस्तु की इच्छा करता है वह उसे
नहीं मिलती ॥ ४५ ॥
फल सहित आठ भाव ।
( का० ४४-४५ )
निमित्त नैमित्तिक निमित्त नैमित्तिक
१ धर्म से ऊर्ध्वगमन ५ वैराग्यसे प्रकृतिलय ।
२ अधर्म से अधोगति । ६ अवैराग्य से संसार
३ ज्ञान से मोक्ष ७ ऐश्वर्य से इच्छानभि
४ अज्ञान से बन्धन । घात