सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sankhya Darshana with Hindi Commentary
महर्षि कपिल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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उसको अंकुश संज्ञा है। क्योंकि वह सिद्धि को रोकती है।
गौणसिद्धियें-(१) अध्ययन (तार) (२) शब्द (सुतार)
(शब्दसे अर्थ का ज्ञान) (३) ऊह (तर्क) (तारतार) (४)
सुहृत्प्राप्ति (मित्र मिलन) (रम्यक) और (५) दान (मुदामु-
दित) (विवेकज्ञान की शुद्धि)
मुख्यसिद्धियें-(१) आध्यात्मिक दुःख का नाश (प्रमोद)
(२) आधिभौतिक दुःख का नाश (मुदित) और (३) आधि-
दैविक दुःख का नाश (मोदमान) (कुल ८ सिद्धियें)॥५१॥
प्रकारान्तर से सिद्धियें ।
(१) ऊह--जिस में पूर्व जन्म के अभ्यास से आप से
आप तत्व ज्ञान हो जावे।
(२) शब्द-जिस में दूसरे के सांख्य शास्त्रीय अध्ययन
को सुन कर तत्वों का ज्ञान उत्पन्न हो।
(३) अध्ययन-जिस में गुरु और शिष्य के सम्बन्ध से
संवाद पूर्वक ग्रन्थ और अर्थ दोनों प्रकार से सांख्य शास्त्र को
अध्ययन करने से ज्ञान उत्पन्न हो।
(४) सुहृत्प्राप्ति--जिस में तत्वों के ज्ञाता मित्र की
प्राप्ति से ज्ञान उत्पन्न हो।
(५) दान-जिस में धन के दान से सन्तुष्ट हो कर
गुरु ज्ञान देवे, वह सिद्धि धन दान के कारण होने से 'दान'
कहलाती है॥ ५१॥
प्रत्यय (बुद्धि) और तन्मात्र या भूत सर्ग का प्रयोजन
नविनाभावैर्लिङ्गं नविनालिङ्गेन भावनिर्वृत्तिः ।
लिङ्गाख्योभावाख्यस्तस्माद्द्विविधःप्रवर्त्ततेसर्गः।५२।
बुद्धि तत्व से दो प्रकार की सृष्टि होती है, एक सृष्टि
भाव-सृष्टि है और दूसरी लिङ्ग-सृष्टि है। पहिली भावसृष्टि