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सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sankhya Darshana with Hindi Commentary

महर्षि कपिल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished81 पृष्ठ

हिन्दी सांख्य दर्शन ( ११ )
( घ ) समन्वय या भिन्न वस्तुओं की समान रूपता होने
से महत् आदिकों का कारण अव्यक्त है । जैसे घट कुण्डल आ-
दिकों के कारण मृत्तिका-पिण्ड, सुवर्ण-पिण्ड आदि अव्यक्त
हैं ॥ १५ ॥
अव्यक्त की प्रवृत्ति का प्रकार ।
अव्यक्त की प्रवृत्ति दो प्रकार से है। एक सृष्टिकाल की
और दूसरी प्रलयकाल की । सृष्टिकाल में अव्यक्त ( प्रकृति )
के तीनों गुण मिलकर प्रवृत्त होते हैं, और वे उस समय आपस
में कोई गौण और कोई मुख्य हो जाते हैं। क्योंकि-गौण
मुख्य भाव के विना अनेक पदार्थों की मिलकर प्रवृत्ति नहीं
हो सकती । तथा अपनी गौणता मुख्यता के लिये वे न्यून
अधिक हो जाते हैं, एवम् न्यूनाधिक भाव के लिये वे परस्पर
में कोई उपमर्दक और कोई उपमर्दनीय हो जाते हैं। इसी प्रकार
प्रलयकाल में अव्यक्त के तीनों गुण परस्पर से पृथक् होकर
स्वतन्त्रता से अपने २ स्वरूप से ही प्रवृत्त होते हैं, इसी से सब
कार्य जो अनेकतत्वों के मेल से बने हुये हैं, वे नष्ट हो जाते
हैं या अपने अव्यक्त कारण में लीन हो जाते हैं। मानों कि-
यह शरीर पांच भूतों से बना है, और पांचों पृथिवी आदि
भूत अलग २ हो जावें, तो यह शरीर नष्ट ही हो ।
एक अव्यक्त से विचित्र २ कार्यों की उत्पत्ति ।
एक २ गुण के भिन्न २ मात्राओं के संमेलन से जल के
समान नाना परिणाम होते हैं। जैसे मेघ का जल एक मधुर
रस वाला ही नारियल और बिल्व आदिकों में नाना रस
वाला हो जाता है ॥ १६ ॥
पुरुष या आत्मा की सिद्धि ।
संघातपरार्थत्वात् त्रिगुणादिविपर्ययादधिष्ठानात् ।
पुरुषोऽस्तिभोक्तृभावात् कैवल्यार्थप्रवृत्तेश्च ॥१७॥

( १३ ) हिन्दी सांख्य दर्शन
व्यक्त (शरीर आदि) और अव्यक्त (मूल प्रकृति) से भिन्न
पुरुष है। क्योंकि—
(क) जो २ वस्तु संघात रूप है, अर्थात् अनेक वस्तुओं
से मिल कर बनी है, जैसे शय्या आसन आदि, वह सब दूसरे
के अर्थ देखी जाती है, ऐसे ही ये महत् तत्त्व और शरीर
आदि हैं, इस लिये ये पर के अर्थ हैं। जो पर वस्तु है, वही
आत्मा ( पुरुष ) है।
संघात दूसरे संघात के लिये नहीं।
ऐसा प्रश्न हो सकता है कि-एक संघात रूप वस्तु दूसरे
संघात के लिये मान ली जावे, तो अन्य पुरुष वस्तु की कल्पना
न करना पड़े ? इस का उत्तर यह है कि-यदि एक संघात
दूसरे संघात के लिये माना जावेगा, तो वह भी संघात है,
उस की परार्थता के लिये तीसरा संघात मानना होगा, एवम्
उस की परार्थता के अर्थ ४था संघात कल्पित करना होगा।
सुतराम् संघात को दूसरे संघात की अपेक्षा रहने से उसकी
संख्या पूरी न होगी। इसे अनवस्था दोष कहते हैं। इसी के
कारण उक्त प्रश्न नहीं उठ सकता, अतः संघात असंघात रूप
पुरुष के अर्थ ही मानने से सुगति होती है।
दूसरा हेतु यह है कि जो २ त्रिगुण रथ आदि संघात
हैं, वे सब दूसरे से अधिष्ठित या दूसरे के वश में रहते हुये
देखे जाते हैं, अतः उन के समान त्रिगुण महत्तत्त्व और
शरीर आदि के लिये भी दूसरे अधिष्ठाता की अपेक्षा होती है
एवम् अधिष्ठित के अधिष्ठाता के रूप में पुरुष सिद्ध होता है।
तीसरा हेतु यह है कि-जो २ त्रिगुण संघात शय्या आसन
आदि हैं, वे सब भोग्य वस्तु हैं, अतः उन्हें अपनैं से विलक्षण
(अत्रिगुण) भोक्ता की अपेक्षा रहती है। एवम् उन भोग्य
वस्तुओं के भोक्तारूप से पुरुष की सिद्धि होती है।

हिन्दी सांख्य दर्शन ( १३ )
४ था हेतु यह है कि महत्‌तत्व और शरीर आदि, जितने
प्रकृति से उत्पन्न हुये संसार में पदार्थ हैं, वे सब सुख, दुःख
और मोह रूप हैं, अतः सुख को अनुकूलनीय या सुखी करने
के लिये, दुःख को प्रतिकूलनीय या दुःखित करने के लिये,
तथा मोह को मोहित करने के लिये दूसरे २ की अपेक्षा
होती है। क्योंकि-सुख आदि सुख आदि को ही सुखित
दुःखित तथा मोहित नहीं कर सकता । सुतराम् उन से
विलक्षण सुखी आदि होने वाला दूसरा पदार्थ (पुरुष)
सिद्ध होता है।
५वां हेतु सब से अधिक या बलवान यह है कि शास्त्र
कैवल्य या मोक्ष को प्रतिपादन करते हैं, और महापुरुष उस
के लिये यत्न करते आये हैं। यदि संघात ही संघात है, तो
फिर उस से अलग होने की इच्छा किस को हो और उससे
वह अलग हो भी कैसे सकता है। सुतराम्-आत्मा संघात से
अलग पदार्थ है ॥ १७ ॥
पुरुष (आत्मा) बहुत हैं।
पुरुष है,-यह प्रतिपादन किया गया, अब यह प्रश्न है
कि-क्या वह पुरुष सब शरीरों में एक है, या प्रति शरीर
अलग २ ? इस के उत्तर में प्रति शरीर पुरुष अलग २ है, यह
प्रतिपादन करने के लिये कहते हैं—
जननमरणकरणानां प्रतिनियमाद् युगपत्प्रवृत्तेश्च
पुरुषबहुत्वं सिद्धं त्रैगुण्यविपर्ययाच्चैव ॥ १८ ॥
पुरुष (आत्मा) बहुत हैं। क्योंकि-
(क) जन्म, मरण, और इन्द्रियें प्रति पुरुष अलग २ हैं।
(ख) सब पुरुष एक साथ एक कर्म में नहीं लगते।
(ग) और भिन्न २ पुरुषों में सत्व आदि तीनों गुण

पुरुष का बहुत्व सिद्ध करके अब विवेकज्ञान के लिये,

( १४ ) हिन्दी सांख्य दर्शन
भिन्न २ प्रकार से हैं। जैसे कोई अधिक सात्विक है, कोई
अधिक रजोगुणी है और कोई अधिक तमोगुणी है ।
पुरुष के धर्म ।
पुरुष का बहुत्व सिद्ध करके अब विवेकज्ञान के लिये,
उसके धर्मों को कहते हैं-
तस्माच्च विपर्यासात् सिद्धं साक्षित्वमस्य पुरुषस्य ।
कैवल्यमाध्यस्थ्यं द्रष्टृत्व मकर्त्तृभावश्च ॥ १९ ॥
पुरुष का बहुत्व तो सिद्ध हो ही चुका है, किन्तु उस
विपर्यास या विपरीत भाव, जो गत ११ वीं कारिका में दि-
खाया गया है, उससे इसके साक्षित्व (साक्षीपना) कैवल्य
(दुःखत्रय से रहित होना) माध्यस्थ्य (उदासीनता) द्रष्टृत्व
(दर्शन) और अकर्त्तृत्व (अकर्त्तापन) ये पांच धर्म भी सिद्ध
होते हैं। उक्त ११ वीं कारिका में कहा गया है कि- व्यक्त-
और प्रधान,–'त्रिगुण, अविवेकी, विषय,सामान्य,अचेतन और
प्रसवधर्मी हैं, और पुरुष इन दोनों से विरुद्ध धर्म वाला है'।
इस से कहागया होता है, कि- पुरुष, अत्रिगुण (तीनों गुणों
से रहित) विवेकी, अविषय असामान्य, चेतन, और अप्रसव-
धर्मी है। यही वहां का विपर्यास है। अब ध्यान देंगे, तो,
प्रतीत होगा कि-सच मुच ही उस विपर्यास से पुरुष में साक्षित्व
आदि ५ धर्म सिद्ध होते हैं। अर्थात्--चेतन और अविषय
होने से वह साक्षी और द्रष्टा होता है। क्योंकि- चेतन हीं
साक्षी हो सकता है, किन्तु अचेतन वस्तु नहीं। अर्थात् साक्षी
वह होता है, जिसे कोई विषय दिखाया जावे । लोक में जिस
प्रकार वादी प्रतिवादी दोनों अपने विवाद की बात को साक्षी
के लिये दिखाते हैं, ऐसे ही प्रकृति भी अपने आचरण किये
हुवे विषय को पुरुष के प्रति दिखाती है, अतः पुरुष उसका

हिन्दी सांख्य दर्शन (१५)

साक्षी है। क्योंकि अचेतन विषय को विषय नहीं दिखाया
जासकता। इस कारण चेतन और अविषय होने से पुरुष सा-
क्षी औरद्रष्टा होता है। एवम् त्रिगुण रहित होने से ही वह
दुःखत्रय से रहित है। अर्थात् सत्व आदि गुण ही सुख दुःख
आदि रूप हैं, और वे उसमें हैं नहीं अतएव वह दुःखमात्र
से रहित है तथा दुःखत्रय का अभाव ही कैवल्य या
मोक्ष का स्वरूप है, अतः अत्रिगुण होने से उस का कैवल्य
सिद्ध होता है। इसी प्रकार अत्रिगुण होने से ही यह मध्यस्थ
या उदासीन है। क्योंकि सुखी सुख से तृप्त होता हुवा और
दुःखी दुःख से द्वेष करताहुआ मित्रशत्रु की कक्षा में आजाता है,
किन्तु.मध्यस्थ नहीं होता। सुतराम् आत्मा सत्व आदि गुणों से
रहित होने के कारण सुख दुःख से भी रहित है, और अतएव
वह मध्यस्थ या उदासीन है। ऐसे ही विवेकी और अप्रसव-
धर्मी होने से वह अकर्ता है। प्रयोजन यह है कि- क्रिया जिस
में होती है, वह कारक होता है, और क्रिया सब परिच्छिन्न
(परिमित) वस्तु में होती है। परिमित वस्तु महत्तत्व से
आरम्भ करके प्रकृति के सकल कार्य हैं। आत्मवस्तु व्यापक
(विभु) है, उसमें क्रिया का संभव नहीं, अतः वह अकर्ता है
अकर्ता पद से कर्त्ताके साथ करण, सम्प्रदान आदि अन्य का-
रकों का भी निषेध समझना चाहिये। कारण वे कारक भी
क्रिया के सम्बन्धसे ही होते हैं। यहां 'प्रसव' नाम कार्य मात्र
का है। कार्य पद में प्रकृति और पुरुष दोनों से अतिरिक्त
सकल जड़समूहं आता है, उन्हीं में चलन आदि क्रियायें भी हैं
जबकि आत्मा अप्रकृति है, तो उससे कोई कार्य होना संभव
नहीं, अतः वह अप्रसवधर्मी होने से अकर्ता है, इसी प्रकार
'विवेकी' विशेषण भी उसे अकर्त्ताही सिद्ध करता है। क्योकि
हमारी समझ में 'विवेकी' नाम यहां विविक्त या अलग रहने

( १६ ) हिन्दी सांख्य दर्शन
वालेका है। वह क्रिया तथा विकार (प्रसव) वालों से अलग
है, इससे वह अकर्त्ता है ॥ १८ ॥
लिङ्ग चेतन के समान और पुरुष कर्त्ता के समान ।
तस्मात्तत्संयोगादचेतनं चेतनावदिव लिङ्गम् ।
गुणकर्त्तृत्वे च तथा कर्त्तेवभवत्युदासीनः ॥२०॥
यद्यपि पहिली कारिका में यह युक्तियों से सिद्ध होचुका
है कि-आत्मा अकर्त्ता है, किन्तु यह अनुभव के विरुद्ध है।
अर्थात् सर्व साधारण को ऐसा अनुभव होता है कि-'मैं चेतन
करने की इच्छा से क्रिया (कर्म) करता हूं' इस अनुभव में
चेतन और कर्त्ता एक ही प्रतीत होता है। इस से सांख्य के
उक्त मत में यह अनुभव नहीं घटता। क्योंकि-उसमें चेतनअकर्त्ता
और कर्त्ता अचेतन है। इसी प्रश्न का उत्तर यहां यह दिया
गया है, कि-उक्त अनुभव, जिसमें आत्मा अकर्त्ता प्रतीत होता है
भ्रान्ति रूप है। क्योंकि-आत्मा या पुरुष का अकर्त्तृत्व (अक-
र्त्तापन) युक्ति से सिद्ध होचुका। आत्मा में जो कर्त्तृत्व की
प्रतीति होती है, वह लिङ्ग शरीर, जो महत् तत्व आदि १८
तत्त्वों के संयोग से बताया जायगा, उसके सम्बन्ध से प्रतीत
होता है। अर्थात्-जैसे लाल पुष्प की लाली उसके संयोग से
काच में प्रतीत होती है, किन्तु वह लाली पुष्प ही की है,
काच की नहीं, ऐसे ही, लिङ्ग शरीरका कर्त्तृत्व पुरुष में प्रतीत
होता है, वह लिङ्ग शरीर का ही है, वास्तव में पुरुष का नहीं
अतः पुरुष कर्त्ता नहीं, कर्त्ता जैसा है। तथा कर्त्तृत्व का अनु-
भव भ्रान्तिरूप है। सर्वथा पुरुष उदासीन है।
जिस प्रकार लिङ्ग के संयोग से अकर्त्ता पुरुष कर्त्ता जैसा
प्रतीत होता है, वैसे ही पुरुष के संयोगसे अचेतन लिङ्ग चेतन
जैसा प्रतीत होता है, उस में भी चेतनत्व बुद्धि उसी प्रकार
भ्रान्ति है ॥ २० ॥

हिन्दी सांख्य दर्शन (१७)
पुरुष और लिङ्ग के संयोग का कारण ।
पुरुषस्य दर्शनार्थं कैवल्यार्थं तथा प्रधानस्य ।
पङ्ग्वन्धवदुभयोरपि संयोगस्तत्कृतःसर्गः ॥२१॥
पहिली कारिका के व्याख्यान में यह बात समझी गई
कि- पुरुष और प्रधान या लिङ्ग के संयोग से उनमें परस्पर के
कर्त्तृत्व और चेतनत्व धर्म भ्रान्ति से प्रतीत होते हैं। किन्तु
अभी यह बात समझ में नहीं आई, कि- इनका संयोग ही
पहिले कैसे हुआ ? इस प्रश्न के उत्तरके लिये ही यह कारिका
आई है। इसमें कहा गया है कि- भोक्ता और भोग्य की
योग्यता से ही इन दोनों का किसी अनादि काल में संयोग
होगया था, और उनके संयोग से ही यह महत् आदि तत्वों
या संसार की सृष्टि हुई। अर्थात्-जैसे-किसी भूखे आदमी
को कोई फल मोदक आदि भक्ष्य वस्तु मिले और
वह उसे खाने लगे । इस बात को ध्यान में देने से प्रतीत
होगा कि-आदमी में भोजन करने की योग्यता है और फल
आदि में भोग्यता की, वृक्षों से उस के संयोग होते ही भोजन
रूप क्रिया की सृष्टि होने लगती है यदि उनका संयोग न हो
अथवा भोक्ता का भोक्ता के साथ तथा भोग्य का भोग्यके साथ
संयोग हो भी जावे तो उनकी योग्यता वहां सृष्टि को प्रवृत्त
नहीं कर सकती, बल कि- वह व्यर्थ ही रहेगी। ऐसे ही पुरुष
की भोक्तृत्व योग्यता और प्रधान की भोग्यत्व योग्यता से
उनका कभी संयोग हुआ,और उसी से सृष्टिका आरम्भ हुआ
ऐसे ही कारिका में पंगु और अन्ध का दृष्टान्त भी है। इस
की व्याख्या यों है कि- जैसे कोई पंगु और अन्ध दो मनुष्य हैं,
और वे दोनों ही अपने संघ के साथ बनमें जाते हुये डाकुओंके
उपद्रव से अपने साथियों से अलग होगये, तथा वनमें कहीं २

( १८ ) हिन्दी सांख्य दर्शन
टकराते हुये आपस में दैव योग से मिले और उनका परस्पर
में विश्वास हुआ । अन्धे में चलने की शक्ति है, और पंगु में
देखने की, इसीसे अब वे दोनों मिलकर गमन और दर्शन
क्रियाओं को कर सकते हैं, अतः पंगु अन्धे के कन्धे पर चढा,
तो अन्धा चला और पंगुने उसे राह बताई, सुखराम् वे अपने
घर पर पहुंचे और दोनों ने अपना सम्बन्ध छोड़ा अर्थात्
संयोग का त्याग किया । ऐसे ही चेतन पुरुष प्रकृति के साथ
मिलकर उसके संयोग से ज्ञान गुण को प्राप्त होकर उसे छोड़
देता है, और वह भी अपना कार्य पूरा करके उसे छोड़ देती
है । यही मोक्ष का स्थान है, तथा संयोग और उस से सृष्टि
क्रम है ॥ २१ ॥
सृष्टि का क्रम ।
प्रकृतेर्महांस्ततोऽहंकारस्तस्माद्गणश्चषोडशकः ।
तस्मादपि षोडशकात् पञ्चभ्यः पञ्चभूतानि ॥२२॥
प्रकृति से महत् तत्व, उससे अहंकार, इस से १६ तत्त्व
( ५ ज्ञानेन्द्रियें ५ कर्मेन्द्रियें १ मन ५ तन्मात्र ) और उनमें
से भी ५ तन्मात्रों से ५ महाभूत ( पृथिवी, जल, अग्नि, वायु
और आकाश ) उत्पन्न होते हैं ॥ अर्थात् शब्द तन्मात्रसे शब्द
गुण वाला आकाश, (१) शब्द तन्मात्र से सहित; स्पर्श तन्मात्र
से शब्द और स्पर्शगुणवाला वायु, (२) शब्द और स्पर्श तन्मात्र से
सहित रूप तन्मात्र से शब्द स्पर्श और रूप गुण वाला अग्नि
( ३ ) शब्द, स्पर्श, रूप तन्मात्र से संयुक्त रस तन्मात्र से
शब्द, स्पर्श, रूप, और रस गुण वाला जल (४) और शब्द,
स्पर्श, रूप, तथा रस तन्मात्र से युक्त गन्ध तन्मात्र से शब्द,
स्पर्श, रूप, गन्धगुण वाली पृथिवी ( ५ ) उत्पन्न होती है ॥

हिन्दी सांख्य दर्शन ( १६ )
प्रकृति, प्रधान, ब्रह्म, अव्यक्त, बहुधानक, और माया, ये शब्द पर्याय
(समान अर्थ के वाचक) हैं। महान्, बुद्धि, आसुरी, मति,
ख्याति और ज्ञान ये सब पर्याय हैं । ऐसे ही अहंकार,
भूतादि, वैकृत, तैजस और अभिमान, ये पर्याय हैं ॥ २२ ॥
बुद्धि का लक्षण और उस का धर्म ।
अध्यवसायोबुद्धिर्धर्मोज्ञानं विरागऐश्वर्यम् ।
सात्विकमेतद्रूपं तामसमस्माद्विपर्यस्तम् ॥२३॥
बुद्धि का लक्षण अध्यवसाय है। अर्थात् पुरुष मात्र ही
जब किसी कर्म में प्रवृत्त होता है, उस समय अन्तःकरण में
तीन वृत्तियें या क्रियाएं होती हैं, जैसे पहिले आलोचन
(वस्तु का ज्ञान) फिर ‘मैं इस में अधिकारी हूं’ ऐसा अभि-
मान, फिर ‘मुझे यह करना चाहिये’ ऐसा अध्यवसाय या
निश्चय ज्ञान होता है। इन में यह तीसरी वृत्ति या ज्ञान
जिस में होता है, वही बुद्धि है। बुद्धि में ( १ ) धर्म, ज्ञान,
वैराग्य और ऐश्वर्य्य ये चार सात्विक धर्म रहते हैं, और
अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य तथा अनैश्वर्य्य ये चार तामस
धर्म रहते हैं ।
वैराग्य की चार अवस्थाएं होती हैं, जिन के नाम—
( १ ) यतमानसंज्ज्ञा ( २ ) व्यतिरेकसंज्ज्ञा ( ३ ) एकेन्द्रिय-
संज्ज्ञा और ( ४ ) वशीकारसंज्ज्ञा हैं ॥ २३ ॥
अहंकार का लक्षण और उसका कार्य भेद ।
अभिमानोऽहंकारः तस्माद्द्विविधःप्रवर्त्ततेसर्गः ।
एकादशकश्चगणस्तन्मात्रपञ्चकश्चैव ॥ २४ ॥
अभिमान (मैं हूं यह ज्ञान) अहंकार है। उस से दो
प्रकार की सृष्टि होती है, ( १ ) ग्यारह इन्द्रियें और ( २ )

( १० ) हिन्दी सांख्य दर्शन
पांच तन्मात्र ( कुल १६ ) ॥ २४ ॥
एक अहंकार से जड़ और प्रकाश की उत्पत्ति
सात्विक एकादशकः प्रवर्त्ततेवैकृतादहंकारात् ।
भूतादेस्तन्मात्रः स तामसः, तैजसादुभयम् ॥२५॥
अहंकार में तीन गुण होते हैं-सत्व, रज, और तम ।
जब इन में सत्व गुण से रज और तम दब जाते हैं, उस
समय अहंकार की वैकृत संज्ञा (नाम) होती है । उस
वैकृत अहंकार से सत्वगुण की सहायता से ग्यारह इन्द्रियें
उत्पन्न होती हैं । इसी से ये इन्द्रियें सात्विक कही जाती हैं।
जिस समय तमोगुण से सत्व और रज तिरस्कृत हो जाते हैं,
उस समय जो अहंकार है, उस की भूतादि संज्ञा और तमो-
गुण के आधिक्य से 'तामस' संज्ञा भी हो जाती है, उस
भूतादि या तामस नाम अहंकार से उस के समान स्वभाव
वाले शब्द आदि ५ तन्मात्र उत्पन्न होते हैं । एवम्-जब रजो
गुण से सत्व और तम दब जाते हैं, या जित हो जाते हैं,
उस समय उस की तैजस संज्ञा हो जाती है । उस तैजस
अहंकार से दोनों ( इन्द्रियें और तन्मात्र ) उत्पन्न होते हैं ।
क्योंकि-वैकृत अहंकार विकृत हो कर जब ११ इन्द्रियों को
उत्पन्न करना चाहता है, तो वह निष्क्रिय होने के कारण
अपने कार्य को कर नहीं सकता, अतः वह तैजस अहंकार जो
क्रिया स्वभाव है, उस की सहायता लेता है, तथा तामस
अहंकार भी निष्क्रिय होने से तन्मात्र रूप अपने कार्य को
नहीं कर सकता अतः उसे भी तैजस अहंकार की सहायता
लेनी पड़ती है । इस प्रकार वैकृत और भूतादि दोनों अहं-
कारों के साथ उनके कार्य में सहायक होने के कारण यह
दोनों प्रकार के कार्यों का कारण बनता है ॥ २५ ॥

वाक्पाणिपादपायूपस्थाः कर्मेन्द्रियाण्याहुः ॥२६॥

हिन्दी सांख्य दर्शनं ( २१ )
ज्ञानेन्द्रियें और कर्मेन्द्रियें ।
बुद्धीन्द्रियाणि चक्षुःश्रोत्रघ्राणरसनत्वगाख्यानि ।
वाक्पाणिपादपायूपस्थाः कर्मेन्द्रियाण्याहुः ॥२६॥
( क ) ज्ञानेन्द्रियें-चक्षु ( नेत्र ) श्रोत्र ( कान ) घ्राण
( नाक ) रसन ( जिह्वा ) त्वक् ( त्वचा या चर्म ) ।
( ख ) कर्मेन्द्रियें-वाक् ( वाणी ) हस्त, पाद, पायु (गुद)
उपस्थ ( लिङ्ग या योनि ) ॥
इन्द्र नाम आत्मा ( पुरुष ) का है, उसके जनाने वाले
होने से या उसके सम्बन्ध से ये ( इन्द्रिय ) कहलाते हैं ।
इन इन्द्रियों के पृथक् २ लक्षण इनके कार्य से ही हैं। जैसे-
रूपका ग्रहण कराने वाला इन्द्रिय चक्षु है । शब्द का ग्रहण
कराने वाला श्रोत्र, गन्धका ग्रहण कराने वाला घ्राण, रस का
ग्रहण कराने वाला रसन, और स्पर्शका ग्रहण कराने वाला
त्वक् इन्द्रिय है। कर्मेन्द्रियों के लक्षण उनके कार्यों से जानने
चाहियें, जो २८ वीं कारिका में कहे जावेंगे ॥ २६ ॥
ग्यारहवां इन्द्रिय ( मन ) ।
उभयात्मकमत्रमनः संकल्पकमिन्द्रियं च साधर्म्यात्
गुणपरिणामविशेषात्नानात्वं बाह्यभेदाश्च ॥ २७ ॥
(क) इन इन्द्रियोंमें मन उभयात्मक अर्थात्-ज्ञानेन्द्रियं
और कर्मेन्द्रियरूप है । क्योंकि-वह दोनों प्रकार की इन्द्रियों
की प्रवृत्तिको कल्पित करता है ।
(ख) संकल्प मनका असाधारण धर्म या लक्षण है। संकल्प,
नाम समीचीन कल्पना या विशेष कल्पना का है। अर्थात्-पहिले
अन्य इन्द्रियोंसे सामान्यरूप से ज्ञान होना है, जैसे 'यह कुछ
बस्तु है' फिर उसी में विशेषण की कल्पना होती है, कि-यह

( २२ ) हिन्दी सांख्य दर्शन
इसमें जाति है, यह गुण तथा यह क्रिया इत्यादि । यही विशेष
कल्पना और संकल्प है। यही क्रिया जिस में होती है, वह.
मन है ।
(ग) मन की गणना इन्द्रियों में इस लिये है, कि-वह
भी अन्य इन्द्रियों के समान सात्विक अहंकार से उत्पन्न
हुआ है ।
एक अहंकार से नाना इन्द्रियों की उत्पत्ति ।
(घ) गुणों के परिणाम के भेद से एक ही अहंकार से
नाना इन्द्रियें हो जाती हैं। जैसे कि- और भी बाह्य वस्तु-
रूप रस आदि हो जाती हैं ॥ २७ ॥
दश इन्द्रियों की असाधारणवृत्तियें ।
शब्दादिषु पञ्चानामालोचनमात्रमिष्यते वृत्तिः ।
वचनादानविहरणोत्सर्गानन्दाश्च पञ्चानाम् ॥२८॥
श्रोत्र आदि पांच ज्ञानेन्द्रियों की शब्द आदि पांच
विषयोंमें आलोचन मात्र (संमुग्धज्ञान = सामान्यज्ञान) वृत्ति
मानी जाती है । जैसा कि- मनके लक्षण में समझायागया है ।
और ५ कर्मेन्द्रियों की क्रम से वचन, आदान, (लेना) वि-
हरण, (चलना) उत्सर्ग, (छोड़ना बहाना = निकालना)
और आनन्द, ये पांच वृत्तियें हैं ॥ २८ ॥
तीनों अन्तः करणों की वृत्तियें ।
स्वालक्षण्यं वृत्तिस्त्रयस्य सैषा भवत्यसामान्या ।
सामान्यकरणवृत्तिः प्राणाद्यावायवः पञ्च ॥ २९॥
तीनों अन्तः करणों की वृत्तियें या क्रियाएं अपनें २
लक्षण के रूप से हैं। जैसे—बुद्धि की वृत्तिअध्यवसाय,अहंकार
की अभिमान और मनकी संकल्प रूप वृत्ति है । ये इनकी

हिन्दी सांख्य दर्शन ( २३ )
असाधारण या न्यारी २ वृत्तियें हैं, और ५ प्राण आदि वायु
इनकी साधारण ( सामान्या साझे की ) वृत्तियें हैं ॥ ६ ॥
तीनों अन्तः करणों की असाधारण वृत्तियोंमें
प्रकार सहित क्रम और अक्रम ।
युगपच्चतुष्टयस्यतु वृत्तिः क्रमशःश्च तस्यानिर्दिष्टा ।
दृष्टे तथाऽप्यदृष्टे त्रयस्य तत्पूर्विका वृत्तिः ॥३०॥
उस अन्तःकरणचतुष्टय ( इन्द्रिय सहित मन, केवल मन,
अहंकार और बुद्धि ) की वृत्तियें दृष्ट ( प्रत्यक्ष ) विषय में एक
साथ और क्रम से ही होती हैं । ऐसे ही अदृष्ट (परोक्ष) विषय
में भी बाह्य इन्द्रिय के बिना तीनों अन्तःकरणों ( मन अहँ-
कार और बुद्धि ) की वृत्तियें दर्शन पूर्वक एक साथ तथा क्रम
पूर्वक होती हैं। यह वाचस्पति मिश्रका मत है। गौडपाद मानते
हैं, कि-वर्त्तमान विषय में क्रम से और एक साथ भी चारों की
प्रवृत्तियें होती हैं, किन्तु परोक्ष या भूत तथा भविष्यत् विषय
में क्रम से ही वृत्तियें होती हैं।
यह बात कही गई है कि-बाह्य इन्द्रिय चक्षु आदि से
सामान्य ज्ञान होता है, कि-'यह कुछ है, मनसे विशेष ज्ञान
होता है' जैसे 'यह घड़ा है' या 'वस्त्र है' इत्यादि, अहंकार से
अभिमान होता है, जो एक अपनी योग्यता का ज्ञानस्वरूप
है, जैसे कि 'मैं इस वस्तु से ऐसा सम्बन्ध कर सकता हूं' या
मैं इस में ऐसी योग्यता रखता हूं, अर्थात्-'मैं इसे उठा सकता
हूं, छू सकता हूं, ले सक्ताहूं' इत्यादि और बुद्धि से अध्यव-
साय ज्ञान होता है, जिसका स्वरूप यह है, कि-'मैं यह करूं,
या 'ऐसा करूं' सुतराम् ज्ञान की चार अवस्थाएं हुईं, किन्तु
इनके क्रमके सम्बन्ध में अभी तक कुछ निर्णय नहीं किया
गया, उसी के लिये यह कारिका है। इससे यह स्थिर किया

(२४) हिन्दी सांख्य दर्शन
गया है कि-संयोगवंश प्रत्यक्ष विषय में कभी चारों ज्ञान एक
साथ होजाते हैं और कभी क्रमसे ही। जैसे-गाढ़ी अँधियारी
रात्रि में कोई मनुष्य वन में जाता है, और उसे बिजली के
प्रकाश के साथ साम्ने ने कोई व्याघ्र अचानक दिखाई दे, वहां
उसे सामान्य, विशेष, अभिमान और अध्यवसाय चारों ज्ञान
एक ही साथ हो जाते हैं और वह एक साथ ही पीछे हटता
है। ऐसे ही क्रमका उदाहरण मन्द अन्धकारमें लीजिये। पहिले
मनुष्य को उसमें 'कुछ है '-ऐसा सामान्य ज्ञान होता है जो
नेत्ररूप बाह्यइन्द्रिय का व्यापार है। और फिर टकटकी
लगाकर देखने से 'धनुषबाण साधे हुये कोई चोर है, मुझे मा-
रना ही चाहता है,-ऐसा प्रतीत होता है, यह विशेष ज्ञान
मनका व्यापार है। फिर उसे अभिमान होता है कि-मैं यहां
से हट सकता हूं, यह अहंकारका व्यापार है। और फिर इसी
प्रकार वह अध्यवसाय करता है कि-मैं यहांसे हटू, यह बुद्धि
का व्यापार है ॥ यह प्रत्यक्ष विषय में चारों इन्द्रियोंकी वृत्ति
का क्रम और अक्रम हुआ । और जहां बाह्यइन्द्रिय नेत्र आदि
का वस्तु से उचित सम्बन्ध नहीं है, अर्थात् जानने योग्य वस्तु
भूतकाल में है, या भविष्यत् कालमें है,या अतिदूर आदि होने
के कारण वह दुर्ज्ञेय है, वहां तीन अन्तःकरणों (भीतरी-
इन्द्रिय मन आदिकों) का ही व्यापार होता है किन्तु नेत्र
आदि का नहीं । विशेष यह है कि-जिस विषय पर मन
आदिको जाना है वह पहिले बाह्य इन्द्रियसे कभी अनुभव कर
लिया गया हो, तभी उस विषय का उन से ज्ञान होता है,
अन्यथा नहीं । जैसे किसी ने पहिले राजा का दर्शन किया है,
उसी को कालान्तर में उसका मनसे स्मरण होता है। जिसने
राजा को देखा नहीं उसे उसका स्मरण भी होता नहीं। इस

हिन्दी सांख्य दर्शन ( २५ )
आभ्यन्तर इन्द्रियों के द्वारा होने वाला ज्ञान बाह्यविषय में
स्मरणरूप और आभ्यन्तर सुख दुःख आदि विषय में प्रत्यक्ष
रूप होता है ॥ ३० ॥
इन्द्रियों तथा तीनों अन्तःकरणों की परिचालना ।
यद्यपि इन्द्रियों की प्रवृत्ति का क्रम समझा गया, तथापि
यह नहीं जाना गया कि-इनका प्रेरक कौन है या किस से ये
परिचालित होती हैं? इसी के उत्तर में यह कारिका है—
स्वां स्वां प्रतिपद्यन्ते परस्पराकूतहेतुकां वृत्तिम् ।
पुरुषार्थ एव हेतु र्न केनचित् कार्यते करणम् ॥ ३१ ॥
जिस प्रकार अनेक चोर आपस में संकेत करके चोरी के
स्थान में परस्पर के संकेत वश अपनी२ क्रियाओं को यथाक्रम
करते हैं, उसी प्रकार सब इन्द्रियें भी अपनी२ वृत्तियों (क्रिया
ओं ) में प्रवृत्त होती हैं, इनकी प्रवृत्तियों में पुरुषार्थ ( पुरुष
का अदृष्ट ) ही कारण है । सुतराम् इन्द्रियें किसी चेतन अधि
ष्ठाता से परिचालित नहीं होतीं ॥ ३१ ॥
करण के भेद ।
करणंत्रयोदशविधम्, तदाहरणधारणप्रकाशकरम् ।
कार्यं च तस्य दशधाऽऽहार्यं धार्यं प्रकाश्यं च ॥३२
करण १३ प्रकार का होता है ( ११ इन्द्रियें १ बुद्धि
१ अहंकार ) । उनमें—
१-कर्मेन्द्रियों ( वाणी आदिकों ) का आहरण ( लाना ) कर्म
है ।
२-अन्तःकरणों ( बुद्धि अहंकार और मन ) का प्राणादिका
अपनी वृत्तियों से धारण करना कर्म है ।
३-ज्ञानेन्द्रियों का प्रकाश करना कर्म है ।

( २६ ) हिन्दी सांख्य दर्शन
( क ) कर्मेन्द्रियों का आहार्य ( आहरण करने योग्य ) विषय
१० प्रकार का है (१) दिव्य बचन (बोलना ) ( २ ) अदिव्य
बचन (३) दिव्य आदान ( लेना ) (४) अदिव्य आदान
( ५ ) दिव्य विहार ( चलना ) ( ६ ) अदिव्य विहार
( ७ ) दिव्य उत्सर्ग (छोड़ना) ( ८) अदिव्य उत्सर्ग (६)
दिव्य आनन्द (१०) अदिव्य आनन्द ।
(ख) तीनों अन्तः करणों का धार्य ( धारण करने योग्य )
विषय १० प्रकार का होता है—
(१) दिव्य प्राण ( २ ) अदिव्य प्राण ( ३ ) दिव्य अपान
( ४ ) अदिव्य अपान ( ५ ) दिव्य समान ( ६ ) अदिव्य
समान ( ७ ) दिव्य उदान ( ८ ) अदिव्य उदान (•६ )
दिव्य व्यान ( १० ) अदिव्य व्यान ।
(ग) ज्ञानेन्द्रियों का प्रकाश्य ( प्रकाश करने योग्य ) विषय
१० प्रकार का होता है-
(१) दिव्य शब्द ( २ ) 'अदिव्य शब्द ( ३ ) दिव्य स्पर्श
( ४ ) अदिव्य स्पर्श ( ५ ) दिव्यरूप ( ६ ) अदिव्य रूप
( ७ ) दिव्य रस ( ८ ) अदिव्य रस ( ६ ) दिव्य गन्ध
( १० ) अदिव्य गन्ध ॥ ३२ ॥
तेरह ( १३ ) प्रकार केकरण ।
अन्तःकरणंत्रिविधंदशधाबाह्यंत्रयस्यंविषयाख्यम् ।
साम्प्रतकालंवाह्यंत्रिकालमाभ्यन्तरंकरणम् ॥३३॥
अन्तःकरण तीन प्रकार का होता है बुद्धि, अहंकार,
और मन । बाह्य इन्द्रिय दश प्रकार का होता है-५ ज्ञाने-
न्द्रियें और ५ कर्मेन्द्रियें ।
ये दशों बाह्य इन्द्रियें अन्तःकरण के ही विषय को प्रकट

हिन्दी सांख्य दर्शन (२७)
करते हैं। अर्थात् जब ये तीनों अन्तःकरण विषय का संकल्प,
अभिमान और अध्यवसाय करना चाहते हैं, तब ये १०
इन्द्रियें द्वार रूप हो जाती हैं-ज्ञानेन्द्रियें आलोचन (सामा-
न्यज्ञान) से और कर्मेन्द्रियें अपनें यथायोग्य व्यापार से द्वार
भूत होती हैं।
विशेषान्तर-
बाह्य इन्द्रियों का सामर्थ्य केवल वर्त्तमान विषय में
रहता है, और बुद्धि आदि आभ्यन्तर करणों का सामर्थ्य
भूत, भविष्यत् और वर्त्तमान तीनों कालों में होता है ॥३३॥
बाह्य इन्द्रियों के विषय।
बुद्धीन्द्रियाणितेषां पञ्चविशेषाविशेषविषयाणि ।
वाग्भवतिशब्दविषया शेषाणितुपञ्चविषयाणि ।३४।
उन १० बाह्य इन्द्रियों में ५ ज्ञानेन्द्रियों के विशेष
(स्थूल शब्द आदि और पृथिवी आदि जो शान्त, घोर तथा
मूढ स्वभाव हैं) और अविशेष (तन्मात्र-सूक्ष्म शब्द आदि)
विषय हैं। इस में भी यह विशेष है, कि यागियों का श्रोत्र
(कान) सूक्ष्म शब्द और स्थूल (मोटा) शब्द दोनों को सुन
सकता है, किन्तु हम लोगों का कान केवल मोटे शब्द को ही
सुन सकता है। उन की त्वक् (चर्म) मोटे और सूक्ष्म दोनों
प्रकार के स्पर्श को ग्रहण कर सकती है और हमारी त्वक
(चर्म) मोटे ही स्पर्श को छू सकती है। एवम् उन के और
हमारे नेत्र आदि में भी भेद है। अर्थात् उन के नेत्र आदि
स्थूल व सूक्ष्म दोनों प्रकार के रूप आदि को ग्रहण कर सकते
हैं और हमारे केवल स्थूल ही विषय को ले सकते हैं।
ऐसे ही कर्मेन्द्रियों में वाक् (वाणी) हमारी या योगि-
यों की हो, स्थल शब्द को ही उच्चारण कर सकती है, किन्तु

( २८ ) हिन्दी सांख्य दर्शन
सूक्ष्म शब्द को नहीं। क्योंकि वाक् इन्द्रिय और सूक्ष्म शब्द
दोनों अहंकार रूप एक ही कारण से उत्पन्न हुये हैं। अर्थात्
एक साथ उत्पन्न होने वाला बराबर वाले को अनुभव नहीं
कर सकता। और शेष चार (गुदा, लिङ्ग या योनि, हाथ,
और पैर ) इन्द्रियों के रूप आदि ५ विषय हैं क्यों कि हस्त
आदि चार इन्द्रियें जिन घट आदि वस्तुओं से सम्बन्ध करते
हैं, वे सब शब्द आदि तन्मात्ररूप ही हैं, या उन्हीं से प्रकट
हुये हैं।
गौडपाद आचार्य यहां कहते हैं कि मनुष्यों की ज्ञा-
नेन्द्रियें सुख, दुःख और मोह रूप विषयों से युक्त शब्द आदिकों
को प्रकाशित करती हैं और देवताओं की ज्ञानेन्द्रियें शब्द
आदि को प्रत्यक्ष करती हैं, किन्तु उन्हें उन में सुख दुःख
आदि की प्रतीति नहीं होती। कर्मेन्द्रियों में वाणी दोनों
की बराबर है। ( हमारी समझ में देवताओं की वाणी जैसे
शुद्ध शब्द को उच्चारण कर सकती है, वैसे मनुष्यों की नहीं)
और शेष इन्द्रियें (हाथ आदि) ५ विषयों को ग्रहण करती
हैं। अर्थात् हाथ में शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध पांचों विषय
हैं, इसी से वह उक्त पांचों गुण वाली पृथ्वी में चलता है।
ऐसे गुद आदि में भी योजना करना ॥ हमारी समझ में दोनों
व्याख्यानों का समुच्चय (मेल) हो सकता है। अर्थात् हमारी
देवताओं तथा योगियों की इन्द्रियों की शक्ति में दोनों ही
प्रकार से भेद का संभव है, अतः दोनों ही व्याख्यान स्वीकार
करने योग्य हैं ॥ ३४ ॥
करणों की परस्पर गौणता और प्रधानता
सान्तःकरणाबुद्धिःसर्व विषयमवगाहतेयस्मात् ।
तस्मात्तत्रिविधंकरणंद्वारि, द्वाराणिशेषाणि ॥३५॥

हिन्दी सांख्यदर्शन (२६)
अन्य दो अन्तःकरणों (मन, अहंकार) सहित बुद्धि
अर्थात् तीनों अन्तःकरण जिससे कि-भूत, भविष्यत् और
वर्त्तमान काल में शब्द आदि सब विषयों को अवगाहन
(ग्रहण) करते हैं, इससे उक्त तीनों अन्तःकरण द्वारि (प्रधान)
और शेष बाह्य इन्द्रियें द्वार (अप्रधान या गौण) हैं ॥ ३५ ॥
मन और अहंकार दोनों की अपेक्षा बुद्धि की प्रधानता
एते प्रदीपकल्पाः परस्परविलक्षणा गुणविशेषाः ।
कृत्स्नं पुरुषस्यार्थ प्रकाश्य बुद्धौ प्रयच्छन्ति ॥३६॥
ये सब बुद्धि के अतिरिक्त जितने करण हैं, अर्थात्-५ ज्ञा-
नेन्द्रियें ५ कर्मेन्द्रियें, अहंकार और मन (कुल १२) सब
दीपक के समान हैं। अपनें २ विषय को प्रकाश करने वाले
हैं। आपस में सब विलक्षण हैं, भिन्न २ विषय वाले हैं। और
गुण विशेष हैं, सत्व आदि गुणों से उत्पन्न हुये २ हैं। पुरुष
को जो २ कुछ विषय अपनें में भान होता हुआ प्रतीत होता
है, उस सब को ये करण (इन्द्रियें) अपनें २ विषय के अनु-
सार प्रकाशित करके बुद्धि में स्थापित करते हैं। प्रयोजन यह
है कि-जो विषय बाहरी इन्द्रियों में भासता है, वही भीतरी
इन्द्रिय मन में विशेष रूप से पड़ता है, फिर वही अहंकार-
में पहुंचता है, जिसका कि-उसे अभिमान होता है, और वही
विषय उस के द्वारा बुद्धि में चमकता है, जिसका कि-उसे
अध्यवसाय (निश्चय) होता है। बस इससे आगे वह विषय
कहीं नहीं जाता, अतः इनमें सर्व प्रधान बुद्धि ही है। इनके
मत में इन्द्रिय आदि संघात का अध्यक्ष बुद्धि तत्व ही है। नैया
यिकों के समान आत्मा अध्यक्ष नहीं है। अर्थात् उनके मतमें
सब पदार्थों का ज्ञान साक्षात् सम्बन्ध से आत्मा में ही उत्प-
न्न होता है, इन्द्रियें उसी के साधन हैं अतः वही अध्यक्ष

( ३० ) हिन्दीसांख्यदर्शन
( प्रधान ) है । इनके मत में सब ज्ञान बुद्धि में ही रहता है,
आत्मा या पुरुष में उसकी छायामात्र पड़ती है और साक्षात्
सम्बन्ध का ज्ञान भ्रान्ति रूप है । अतः बुद्धि ही प्रधान है ३६
फिर बुद्धि की प्रधानता ।
सर्वं प्रत्युपभोगं यस्मात् पुरुषस्य साधयति बुद्धिः ।
सैव च विशिनष्टि पुनः प्रधानपुरुषान्तरं सूक्ष्मम्३७
जिस कारण से कि-पुरुष के सब विषय के उपभोग को
बुद्धि साधन करती है, और वही फिर प्रधान और पुरुष के
सूक्ष्म (दुर्लक्ष्य) अन्तर को प्रकाशित करती है, अतः वही
(बुद्धि) प्रधान है। जिस प्रकार कि-सर्वाध्यक्ष या प्रधान मन्त्री
राजा के सब कार्यों का साक्षात् सम्पादन करने से प्रधान है,
और ग्रामाध्यक्ष आदि उसके प्रति गौण रहते हैं। अर्थात्-
बुद्धि पुरुष के साक्षात् सम्बन्ध से या ठीक उसी के साथ संयुक्त
होने से पुरुष की छाया ( छवि ) को धारण कर लेती है, जो २
कुछ सुख, दुःख आदि बुद्धिमें होता है वही पुरुषमें दिखाई देता
है, और सब पुरुष से दूर रहते हैं, जैसे अहंकार और पुरुष के
बीच में बुद्धि पड़ जाती है, तथा और इन्द्रियों के बीच में
अहंकार और बुद्धि पड़ती है । इसी से उनपर पुरुष की और
पुरुष पर उनकी छाया नहीं पड़ती । सुतराम् उक्त प्रकार बुद्धि
ही पुरुष के सब उपभोगों का साक्षात् साधन है, और वही
प्रधान ॥ ३७ ॥
विशेष अविशेषों का विभाग ।
तन्मात्राण्यविशेषाः, तेभ्यो भूतानि पञ्चपञ्चभ्यः
एतेस्मृता विशेषाः, शान्ता घोराश्चमूढाश्च ॥३८॥
शब्द आदि ५ तन्मात्र अविशेष कहलाते हैं, और उन