सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sankhya Darshana with Hindi Commentary
महर्षि कपिल द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 31, कुल 81 में से
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वालेका है। वह क्रिया तथा विकार (प्रसव) वालों से अलग
है, इससे वह अकर्त्ता है ॥ १८ ॥
लिङ्ग चेतन के समान और पुरुष कर्त्ता के समान ।
तस्मात्तत्संयोगादचेतनं चेतनावदिव लिङ्गम् ।
गुणकर्त्तृत्वे च तथा कर्त्तेवभवत्युदासीनः ॥२०॥
यद्यपि पहिली कारिका में यह युक्तियों से सिद्ध होचुका
है कि-आत्मा अकर्त्ता है, किन्तु यह अनुभव के विरुद्ध है।
अर्थात् सर्व साधारण को ऐसा अनुभव होता है कि-'मैं चेतन
करने की इच्छा से क्रिया (कर्म) करता हूं' इस अनुभव में
चेतन और कर्त्ता एक ही प्रतीत होता है। इस से सांख्य के
उक्त मत में यह अनुभव नहीं घटता। क्योंकि-उसमें चेतनअकर्त्ता
और कर्त्ता अचेतन है। इसी प्रश्न का उत्तर यहां यह दिया
गया है, कि-उक्त अनुभव, जिसमें आत्मा अकर्त्ता प्रतीत होता है
भ्रान्ति रूप है। क्योंकि-आत्मा या पुरुष का अकर्त्तृत्व (अक-
र्त्तापन) युक्ति से सिद्ध होचुका। आत्मा में जो कर्त्तृत्व की
प्रतीति होती है, वह लिङ्ग शरीर, जो महत् तत्व आदि १८
तत्त्वों के संयोग से बताया जायगा, उसके सम्बन्ध से प्रतीत
होता है। अर्थात्-जैसे लाल पुष्प की लाली उसके संयोग से
काच में प्रतीत होती है, किन्तु वह लाली पुष्प ही की है,
काच की नहीं, ऐसे ही, लिङ्ग शरीरका कर्त्तृत्व पुरुष में प्रतीत
होता है, वह लिङ्ग शरीर का ही है, वास्तव में पुरुष का नहीं
अतः पुरुष कर्त्ता नहीं, कर्त्ता जैसा है। तथा कर्त्तृत्व का अनु-
भव भ्रान्तिरूप है। सर्वथा पुरुष उदासीन है।
जिस प्रकार लिङ्ग के संयोग से अकर्त्ता पुरुष कर्त्ता जैसा
प्रतीत होता है, वैसे ही पुरुष के संयोगसे अचेतन लिङ्ग चेतन
जैसा प्रतीत होता है, उस में भी चेतनत्व बुद्धि उसी प्रकार
भ्रान्ति है ॥ २० ॥