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सर्वकोश
सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sankhya Darshana with Hindi Commentary

महर्षि कपिल द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished81 पृष्ठ

पृष्ठ 26, कुल 81 में से

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पृष्ठ 26

हिन्दी सांख्य दर्शन ( ११ )
( घ ) समन्वय या भिन्न वस्तुओं की समान रूपता होने
से महत् आदिकों का कारण अव्यक्त है । जैसे घट कुण्डल आ-
दिकों के कारण मृत्तिका-पिण्ड, सुवर्ण-पिण्ड आदि अव्यक्त
हैं ॥ १५ ॥
अव्यक्त की प्रवृत्ति का प्रकार ।
अव्यक्त की प्रवृत्ति दो प्रकार से है। एक सृष्टिकाल की
और दूसरी प्रलयकाल की । सृष्टिकाल में अव्यक्त ( प्रकृति )
के तीनों गुण मिलकर प्रवृत्त होते हैं, और वे उस समय आपस
में कोई गौण और कोई मुख्य हो जाते हैं। क्योंकि-गौण
मुख्य भाव के विना अनेक पदार्थों की मिलकर प्रवृत्ति नहीं
हो सकती । तथा अपनी गौणता मुख्यता के लिये वे न्यून
अधिक हो जाते हैं, एवम् न्यूनाधिक भाव के लिये वे परस्पर
में कोई उपमर्दक और कोई उपमर्दनीय हो जाते हैं। इसी प्रकार
प्रलयकाल में अव्यक्त के तीनों गुण परस्पर से पृथक् होकर
स्वतन्त्रता से अपने २ स्वरूप से ही प्रवृत्त होते हैं, इसी से सब
कार्य जो अनेकतत्वों के मेल से बने हुये हैं, वे नष्ट हो जाते
हैं या अपने अव्यक्त कारण में लीन हो जाते हैं। मानों कि-
यह शरीर पांच भूतों से बना है, और पांचों पृथिवी आदि
भूत अलग २ हो जावें, तो यह शरीर नष्ट ही हो ।
एक अव्यक्त से विचित्र २ कार्यों की उत्पत्ति ।
एक २ गुण के भिन्न २ मात्राओं के संमेलन से जल के
समान नाना परिणाम होते हैं। जैसे मेघ का जल एक मधुर
रस वाला ही नारियल और बिल्व आदिकों में नाना रस
वाला हो जाता है ॥ १६ ॥
पुरुष या आत्मा की सिद्धि ।
संघातपरार्थत्वात् त्रिगुणादिविपर्ययादधिष्ठानात् ।
पुरुषोऽस्तिभोक्तृभावात् कैवल्यार्थप्रवृत्तेश्च ॥१७॥