रोगों की पहचान
Rogon Ki Pehchaan
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri Edition · Sahib Bandgi Sant Ashram Ranjri, Jammu (उद्गम)
रोगों के उपचार में जल-चिकित्सा का महत्व
रोगों के उपचार में जल-
चिकित्सा का महत्व
जल-चिकित्सा द्वारा मनुष्य के शरीर के भीतर मौजूद गंदे पदार्थ को निकाला जा सकता है। इसमें निम्नलिखित स्थानों का खास महत्व है—
मेहन स्नान (जन्म के बाद बच्चे का पहला स्नान)
- ❑ बड़ा-सा टब लें।
- ❑ टब में एक काठ या प्लास्टिक की चौकी रख लें, जो एक तरफ से चंद्रकार हो। (इसी पर आपको बैठना है)
- ❑ उस टब में ठंडा पानी भरें। पानी इतना भरें कि चौकी पर आधा इंच तक आ जाए, ज्यादा ऊपर न आए।
अथवा
(यदि टब न हो)
- ❑ बाल्टी में पानी भर लें और खुद किसी स्टूल पर बैठ जाएँ।
अब कपड़े खोलकर उस चौकी पर या स्टूल पर बैठें। फिर मूत्रेन्द्रिय की ऊपरी खाल को एक हाथ की उँगलियों से पकड़कर आगे खींच लें ताकि अंदर वाला भाग पूरी तरह ढक जाए और फिर अत्यन्त मुलायम कपड़े से बहुत धीरे-धीरे रगड़ें। यह क्रिया आप 20-25 मिनट तक कर लें। फिर पीठ में रीढ़ की हड्डी को ऊपर से नीचे तक लगभग दो मिनट तक गीले तौलिये से रगड़ें। ध्यान रहे कि बाकी अंग सूखे रहें और पानी मूत्रेन्द्रिय के अंदर न जाए।
अगर स्त्री है तो वो मेहन-स्नान के लिए एक हाथ से योनि के दोनों ओठों को पकड़कर अत्यन्त मुलायम कपड़े से योनि के दोनों तरफ
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के ओठों को धीरे-2 धोए। रीढ़ वैसे ही धोए।
नोट
- □ स्नान के बाद शरीर को गर्म करना चाहिए। इसके लिए कंबल लेकर सोने के बजाय व्यायाम कर लेना बेहतर है।
- □ साधारण स्नान डेढ़ घण्टे के अंतराल के बाद ही करना चाहिए, पहले नहीं।
- □ मेहन स्नान को शुरू में 5 मिनट से बढ़ाकर 20 मिनट तक पहुँचें।
मेहन स्नान निम्नलिखित रोगों के निदान में सहायक
नपुंसकता, स्वप्न-दोष, स्नायु-दुर्बलता, अनिद्रा, पागलपन आदि।
सावधानी: मासिक धर्म में मत करें।
कटि स्नान (जन्म के बाद बच्चे का दूसरा स्नान)
- □ एक बड़ा-सा ढलान वाला टब लें, जिसमें बैठकर आपके सिर और पीठ को पीछे सहारा मिल जाए।
- □ टब में ठंडा पानी इतना भरें कि बैठने पर पानी नाभि तक आ जाए।
- □ टब के बाहर एक चौकी रख लें जिसपर आप अपने पाँव रख सकें।
अब टब में बैठकर पैरों को बाहर चौकी पर रखें। एक खुरदरा तौलिया लें और पेट को दाएँ से बाएँ और बाएँ से दाएँ धीरे-धीरे मलते जाएँ। बाकी अंग सूखे ही रहने चाहिए। यह क्रिया 15 मिनट करें। बाद में सूखे तौलिये से उस स्थान को साफ़ कर लें।
अथवा
(टब न होने पर)
- □ एक चौकी पर गीला कपड़ा बिछाकर दीवार के पास रखें।
- □ एक अन्य चौकी उससे इतनी दूर रखें कि उसपर बैठने पर दूसरी
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चौकी पर पैर रखे जा सकें।
❑ पास में पानी से भरी बाल्टी रख लें।
अब उस गीले कपड़े वाली चौकी पर बैठें और पैरों को दूसरी चौकी पर रखें। अब कपड़े को पानी की बाल्टी में डालकर भिगोते जाएँ और पेट को वैसे ही दाएँ से बाएँ और बाएँ से दाएँ मलते जाएँ।
नोट
❑ पैर, टोंगें आदि अन्य अंग सूखे रहें।
❑ आप 5 मिनट से शुरू करके धीरे-धीरे बढ़ाकर 15 मिनट तक पहुँचें।
❑ बच्चे 5 मिनट ही करें।
❑ साधारण स्नान इसके डेढ़ घण्टे बाद ही करें। यदि पहले करना हो तो भी इतना समय ही पहले करें।
कटिस्नान निम्नलिखित रोगों के निदान में सहायक
ज्वर, बवासीर, मन्दगनि पागलपन, प्रदर, कैंसर, क्षय-रोग, सिर-दर्द, कब्ज, बाँझपन, लकवा आदि।
सावधानी : हृदय रोग, गठिया, निमोनिया, मासिक धर्म में यह स्नान मत करें।
पूर्ण टब का गर्म स्नान
एक बड़े सीमेंट के टब में गर्म पानी डालें और कपड़े खोलकर उसमें लेट जाएं, पर सिर बाहर की तरफ रहे। एक अन्य आदमी सिर पर गीला तौलिया रखकर उसपर थोड़ा-2 ठंडा पानी समय-2 पर डालता जाए। यह भी ध्यान रहे कि टब का गर्म पानी ठंडा होने पर और गर्म पानी भी डालता जाए। 10-12 मिनट रोगी उस टब में लेटा रहे। फिर अपने शरीर को रगड़े और बाहर आ जाए। अब ठंडे पानी से अच्छी तरह स्नान करे और वस्त्र ओढ़कर कुछ समय तक के लिए लेट जाए।
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पूर्ण टब स्नान निम्नलिखित रोगों में लाभदायक है—
गठिया, लकवा, कमर दर्द, दमा आदि।
भाप स्नान
❑ दो चूल्हों पर दो बर्तनों में पानी उबालें।
रोगी को एक गिलास गर्म पानी पिलाएँ और उसके कपड़े उतारकर बेंत की बुनी किसी कुर्सी पर बिठाएँ। रोगी के ऊपर कंबल इस तरह डाल दें कि वो कुर्सी सहित ढक जाए, केवल सिर नंगा रहे।
अब उबले हुए पानी का बर्तन लाकर उस कुर्सी के नीचे रख दें और बर्तन का ढक्कन थोड़ा खुला रखें। जब लगे कि भाप निकलना बंद हो रही है तो दूसरा उबलते हुए पानी का पतीला लाकर वहाँ रखें और उसे उठाकर पुनः उबलने को रखें। 10 से 15 मिनट तक भाप स्नान ले सकते हैं। बाद में ठंडे पानी से नहा लें।
नोट
❑ यह स्नान बेंत की बुनी चारपाई पर लिटाकर भी लिया जा सकता है। पर नीचे बर्तन कम-से-कम दो रखें—एक टाँगों के नीचे और दूसरा पीठ के नीचे।
❑ यदि बीच में अधिक घबराहट होने लगे तो उसी समय यह स्नान बंद कर दें।
❑ इस स्नान से आई गर्मी को दूर करने के लिए 5 मिनट का कटि-स्नान लें, जिसमें पेड़ स्थान को न मलें।
❑ हफ्ते-हफ्ते ही यह स्नान करें।
भाप स्नान से रोगों का निदान
हैजा, गठिया, पथरी, गुर्दे की खराबी, दमा, मोटापा, मूत्र-रोग आदि
सावधानी: कुछ रोगी, गर्भवती स्त्री, स्नायु दुर्बलता से पीड़ित
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व्यक्ति, क्षय रोगी, हृदय रोगी, तीव्र ज्वर से पीड़ित, रक्तचाप से पीड़ित लोग यह स्नान मत लें।
नेत्र स्नान
सुबह-शाम ठण्डे पानी से मुख भरकर ठण्डे पानी से ही आँखों में छीटे मारें।
नेत्र स्नान से मिलने वाला लाभ
आँखों की ज्योति बढ़ती है।
नासिका स्नान
❑ एक टॉंटीदार लोटा लें।
❑ लोटे में गुनगुना या शीतल जल डालें।
अब घुटनों के बल बैठ जाएँ और लोटे की टॉंटी नासिका के एक तरफ डालें। गर्दन को एक तरफ घुमा लें ताकि पानी आसानी से नाक में चला जाए। साथ ही पानी को दूसरी नासिका से बाहर निकालते जाएँ। यदि शुरू में ऐसा न हो सके तो मुँह से ही निकाल लें।
नोट
❑ यह स्नान आप रोज कर सकते हैं।
नासिका स्नान से मिलने वाला लाभ
नेत्र ज्योति बढ़ती है, याददाश्त में वृद्धि होती है, जुकाम ठीक होता है।
पैर का गर्म स्नान
❑ एक पतीले में गर्म पानी उबालें।
❑ एक बाल्टी में इतना गर्म पानी डालें, जिसमें आपके पैर पूरी तरह से डूब जाएँ। पानी इतना गर्म हो कि आपके पैर सह सकें।
अब एक कुर्सी पर बैठ बाल्टी सहित अपने को किसी कम्बल
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से लपेट लें। और पैरों को बाल्टी में डाल दें। सिर पर ठंडे पानी में भिगोया हुआ तौलिया रख दें और समय-समय पर ठंडक कम होने से साथ-2 उसे बदलते रहना चाहिए। जैसे ही लगे कि पानी की गर्मी कम हो गयी है तो थोड़ा गर्म पानी और डाल लें। विशेष ध्यान रहे कि पानी पैरों पर सीधा न पड़े, जिससे पाँव न जलने पाएँ। 15 मिनट यह स्नान लेने के बाद पावों को ठण्डे पानी से धोकर पोछ लें।
पैर स्नान निम्नलिखित रोगों में लाभदायक है—
हृदय-रोग, दमा, अनिद्रा, रक्तचाप, मासिक धर्म, जुकाम, लकवा, सिर दर्द आदि।
स्थानीय भाप स्नान
- □ एक पतीले में पानी उबालें।
- □ एक टॉंटीदार बर्तन में पानी को डालें। बर्तन का ढक्कन पूरी तरह से ढका हुआ हो।
अब जिस अंग में सूजन है, उसी अंग को भाप का यह स्नान दें। बाद में गीले कपड़े से पोंछ लें। फिर कोई गर्म कपड़ा 5 मिनट के लिए लपेट दें।
नोट
- □ यह स्नान रोज़ लिया जा सकता है।
स्थानीय भाप स्नान निम्नलिखित रोगों में लाभकारी है—
छाती, पेट, पीठ, मुँह, हाथ, पाँव आदि अंगों में सूजन हो तो उन अंगों को यह स्नान देना लाभकारी सिद्ध होता है।
गर्म-ठंडा पूर्ण स्नान
नहाते समय आपके पास एक गर्म पानी की बाल्टी और दूसरी ठण्डे पानी की बाल्टी होनी चाहिए। अब अपने सिर पर थोड़ा ठण्डा जल फेंककर तौलिया बाँधें दें ताकि सिर पर गर्म पानी न गिरने पाए। फिर गर्म
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पानी के दो लोटे शरीर पर डालकर रगड़ें। इसके बाद ठण्डे जल का एक लोटा डालें और रगड़ें। ऐसा बार-बार करें। कोई 5 बार कर लें। अंत में जब ठण्डे पानी का लोटा डालें तो स्नान बंद कर दें और तौलिये से शरीर को पौछ लें। सिर पर बाँधा तौलिया भी उतार दें।
गर्म-ठंडा पूर्ण स्नान निम्नलिखित रोगों में लाभदायक है—
कमर दर्द, पीठ में दर्द, कंधों में दर्द, टाँगों में दर्द और अन्य दर्दों में लाभकारी है।
गर्म सेंक
एक पतली में गर्म पानी करके रख लें। अब जिस अंग में रोग हो, उसपर नारियल का पानी लगाकर एक सूखा कपड़ा रख दें। फिर एक तौलिये को उस गर्म पानी में डालकर बाहर निकालें और निचोड़ लें। अब उस अंग पर रखें और ऊपर से कोई मोटा या ऊनी कपड़ा डाल दें। जब लगे कि कपड़े की गर्मी कम हो गयी है तो पुनः गर्म पानी में डालकर वैसा ही करें। बाद में ठंडे गीले तौलिये से उस अंग को मलें और कोई ऊनी कपड़ा लपेट दें।
नोट
□ यह सेंक 20-30 मिनट दें।
यह सेंक निम्नलिखित रोगों में लाभकारी है—
मोच, जिगर में पीड़ा, किसी भी अंग में दर्द।
धूप स्नान
सारे कपड़े खोलकर किसी एकांत स्थान में, जहाँ धूप पड़ती हो, बैठकर धूप-स्नान लिया जा सकता है। इसका समय सूर्य निकलने के बाद एक-डेढ़ घण्टे के अंदर ही होता है। कम-से-कम 15 मिनट तक यह स्नान लें।
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नोट
यदि एकांत स्थान न मिले तो सफेद कपड़ा पहन लें।
साधारण स्नान
साधारण स्नान की भी वास्तव में एक विधि है। जब भी आप नहाएँ, पहले हाथों से या किसी तौलिये से अपने शरीर को अच्छी तरह रगड़ लें। यह रगड़ना ऊपर से शुरू करें और नीचे पैरों में ख़त्म।
नोट
साधारणतया ठण्डे पानी से नहाएँ, ताकि रक्त का संचालन ठीक रहे और चुस्ती बनी रहे।
हफ्ते में एक बार गर्म पानी से नहाएँ, ताकि आपके रोम छिद्र खुल जाएँ और गंदगी भी अच्छी तरह से साफ़ हो।
अधिक ठण्ड होने पर गुनगुने पानी का इस्तेमाल कर सकते हैं।
रोज़ गर्म पानी से मत नहाएँ। इससे पाचन-क्रिया कमजोरी होती है, शरीर में सुस्ती बढ़ती है।
साधारण स्नान भोजन के बाद करना हो तो कम-से-कम ढाई घण्टे बाद करें। अन्यथा साधारणतया भोजन के आधे से एक घण्टा पहले ही करें।
व्यायाम या शारीरिक श्रम से आई हुई थकान को दूर करने के बाद ही स्नान करना चाहिए।
सत्यनाम निज औषधि, सतगुरु देइ बताय।
औषध खाय अरू पथ रहै, ताकी वेदन जाये॥